वोटरों को जागरूक करने की अनुमति क्यों नहीं? अरुणा रॉय-निखिल डे के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा निर्देश

राजस्थान में स्थानीय निकाय चुनाव से पहले मतदाता जागरूकता अभियान चलाने की अनुमति नहीं मिलने पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम आदेश दिया है। अरुणा रॉय और निखिल डे की अर्जी पर सुनवाई करते हुए अदालत ने राजस्थान राज्य चुनाव आयोग का आदेश रद्द कर दिया और तीन दिनों में दोबारा विचार करने को कहा। जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि मतदाता जागरूकता अभियान पर चुनाव आयोग का एकाधिकार नहीं हो सकता।

Post Published By: Asmita Patel
Updated : 2 November 2026, 3:49 PM IST
google-preferred

New Delhi: चुनाव से ठीक पहले मतदाताओं को जागरूक करने की कोशिश कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं को राजस्थान राज्य चुनाव आयोग ने अनुमति देने से इनकार कर दिया। वजह बताई गई कि चुनाव नजदीक हैं और इस दौरान ऐसे अभियान के जरिए किसी खास उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार किए जाने की आशंका हो सकती है। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो अदालत ने चुनाव आयोग के इस रवैये पर सवाल उठाए। अदालत ने साफ किया कि मतदाता जागरूकता अभियान चलाने का अधिकार सिर्फ चुनाव आयोग के पास नहीं है। कोई दूसरी संस्था या सामाजिक संगठन भी लोगों को उनके मतदान के अधिकार और जिम्मेदारियों के बारे में जागरूक कर सकता है।

दो बार अनुमति मांगी

यह मामला राजस्थान में होने वाले स्थानीय निकाय चुनावों से पहले मतदाता जागरूकता अभियान चलाने से जुड़ा है। सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय और निखिल डे ने चुनाव आयोग से अभियान आयोजित करने की अनुमति मांगी थी। उनकी ओर से अधिवक्ता प्रशांत भूषण सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए। अदालत को बताया गया कि आवेदकों ने दो बार राजस्थान राज्य चुनाव आयोग के सामने अनुमति के लिए आवेदन किया, लेकिन दोनों बार उनकी मांग खारिज कर दी गई।

इस पर प्रशांत भूषण ने सवाल उठाया कि मतदाता जागरूकता अभियान को चुनाव के करीब होने के कारण कैसे रोका जा सकता है? उनका कहना था कि ऐसे अभियान का उद्देश्य लोगों को मतदान के प्रति जागरूक करना है न कि किसी राजनीतिक दल या उम्मीदवार का प्रचार करना। उन्होंने अदालत में कहा कि मतदाताओं को उनके अधिकारों और चुनाव में उनकी भूमिका के बारे में जानकारी देना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अहम हिस्सा है।

चुनाव के बेहद करीब अभियान से पैदा हो सकता है भ्रम

इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ कर रही थी। सुनवाई के दौरान CJI सूर्य कांत ने कहा कि साल 2024 में सुप्रीम कोर्ट की ओर से दिया गया आदेश संसदीय चुनावों के संदर्भ में था। ऐसे में मौजूदा मामले को उसी याचिका में आवेदन के तौर पर उठाने के बजाय अलग रिट याचिका दायर की जानी चाहिए थी। हालांकि, प्रशांत भूषण ने दलील दी कि दोनों मामलों का मूल मुद्दा एक जैसा है।

NOTA के बारे में देते हैं जानकारी

प्रशांत भूषण ने अदालत को बताया कि उनके अभियान का मकसद मतदाताओं को चुनाव से जुड़ी बुनियादी जानकारियां देना है। इसमें लोगों को समझाया जाता है कि वे वोट देने के बदले किसी तरह की रिश्वत या लालच स्वीकार न करें। इसके साथ ही मतदाताओं को NOTA यानी इनमें से कोई नहीं का विकल्प भी समझाया जाता है। उनका कहना था कि इस तरह के अभियान का किसी राजनीतिक दल या उम्मीदवार से कोई लेना-देना नहीं है।

एकाधिकार पर जस्टिस बागची ने उठाए सवाल

राजस्थान राज्य चुनाव आयोग की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि आवेदकों के आवेदन की जांच की गई थी। आयोग ने अनुमति देने से इसलिए इनकार किया क्योंकि उसे आशंका थी कि यह अभियान किसी अन्य व्यक्ति या संस्था के इशारे पर चलाया जा सकता है। आयोग की ओर से यह भी कहा गया कि मतदाता जागरूकता के लिए वह खुद कार्यक्रम आयोजित कर रहा है। इस दलील पर न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग मतदाता जागरूकता अभियान को पूरी तरह अपने नियंत्रण में नहीं रख सकता और न ही इस पर अपना एकाधिकार जता सकता है।

जस्टिस बागची ने कहा कि अगर चुनाव आयोग खुद ऐसे कार्यक्रम चला रहा है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि दूसरी संस्थाएं या सामाजिक संगठन मतदाताओं को जागरूक नहीं कर सकते। आयोग किसी को केवल इस आधार पर अभियान चलाने से नहीं रोक सकता कि वह खुद भी ऐसा काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि अगर मतदाता जागरूकता के नाम पर कोई गलत गतिविधि होती है, तो उसे नियंत्रित करने के लिए चुनाव आयोग के पास अधिकार हैं। लेकिन जागरूकता अभियान चलाने की पूरी प्रक्रिया पर एकाधिकार रखना उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।

कार्यक्रम की जगह और समय बताना होगा

हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मतदाता जागरूकता अभियान के नाम पर किसी को भी बिना शर्त या असीमित अनुमति नहीं दी जा सकती। जस्टिस बागची ने प्रशांत भूषण से कहा कि प्रस्तावित कार्यक्रमों की जगह और समय पहले से तय होना चाहिए। केवल सामान्य अनुमति मांगने के बजाय आयोजकों को यह बताना होगा कि अभियान कहां और कब चलाया जाएगा। सुनवाई के दौरान प्रशांत भूषण ने चुनाव के समय लागू होने वाले प्रतिबंधों का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि BNSS की धारा 163 के तहत लगाए जाने वाले प्रतिबंधों को चुनाव के दौरान पूरी तरह और बिना किसी अपवाद के लागू नहीं किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया आदेश

सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान राज्य चुनाव आयोग को इस मामले में पक्षकार बनाया। अदालत ने अनुमति देने से इनकार करने वाले आयोग के आदेश को रद्द कर दिया और निर्देश दिया कि आवेदकों के आवेदन पर तीन दिनों के भीतर दोबारा विचार किया जाए। गौरतलब है कि यह मामला उस याचिका से जुड़ा है, जिसमें चुनाव से पहले CrPC की धारा 144 के तहत सार्वजनिक सभाओं और अन्य गतिविधियों पर लगाए जाने वाले व्यापक प्रतिबंधों को चुनौती दी गई थी।

Location :  New Delhi

Published :  2 November 2026, 3:49 PM IST

Related News

Advertisement