चुनाव आयोग की जरूरत खत्म: हलफनामे में झूठी जानकारी छिपाने वाले विधायकों के खिलाफ अब आम आदमी भी कर सकेगा केस

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि चुनावी हलफनामे में गलत जानकारी या तथ्य छिपाने पर कोई भी नागरिक आपराधिक शिकायत दर्ज करा सकता है, इसके लिए चुनाव आयोग की मंजूरी जरूरी नहीं।

Updated : 20 October 2026, 11:28 AM IST
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New Delhi: नई दिल्ली में एक महत्वपूर्ण कानूनी फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई निर्वाचित उम्मीदवार अपने चुनावी हलफनामे में गलत जानकारी देता है या फिर महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाता है, तो उसके खिलाफ देश का कोई भी आम नागरिक आपराधिक शिकायत दर्ज कराने का अधिकारी है। इस तरह की शिकायत दर्ज कराने के लिए किसी सरकारी अधिकारी या चुनाव आयोग की पूर्व अनुमति या शिकायत का होना अब अनिवार्य नहीं है।

यह अहम फैसला जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने सुनाया। अदालत ने अपने आदेश में साफ किया है कि जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 की धारा 125ए के तहत आने वाले अपराधों को दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 195(1) के दायरे में शामिल नहीं किया गया है। इसका मतलब यह है कि इन मामलों में कानूनी कार्रवाई का दायरा केवल सरकारी तंत्र तक ही सीमित नहीं है। हालांकि, अदालत ने यह भी जोड़ा कि हर एक शिकायत पर स्वतः ही आपराधिक कार्यवाही आगे बढ़ाई जाए, यह जरूरी नहीं है।

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क्या था पूरा मामला और विवाद?

इस पूरे कानूनी विवाद की शुरुआत कर्नाटक के बीदर विधानसभा क्षेत्र से हुई थी। साल 2023 के विधानसभा चुनाव में डॉ. शैलेंद्र बेलदाले विधायक चुने गए थे। उनके खिलाफ राजकुमार मड़की नाम के एक व्यक्ति ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था।

शिकायतकर्ता राजकुमार मड़की का मुख्य आरोप यह था कि विधायक डॉ. शैलेंद्र बेलदाले ने अपने नामांकन के दौरान जो चुनावी हलफनामा दाखिल किया था, उसमें अपने घर के पते को लेकर गलत जानकारी दी थी और तथ्यों को छुपाया था। इस मामले को लेकर शुरुआती दौर में मामला कर्नाटक हाई कोर्ट पहुंचा था। कर्नाटक हाई कोर्ट ने मड़की की शिकायत को खारिज करते हुए यह कानूनी व्याख्या दी थी कि चुनावी हलफनामे से जुड़ी ऐसी शिकायतें केवल चुनाव आयोग या कोई संबंधित अधिकृत सरकारी अधिकारी ही दर्ज करा सकता है, कोई आम व्यक्ति नहीं।

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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और वर्तमान स्थिति

सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाई कोर्ट की इस कानूनी व्याख्या को सिरे से खारिज करते हुए गलत बताया। शीर्ष अदालत ने तर्क दिया कि यदि विधायिका की मंशा यह होती कि विधायकों के हलफनामे में गलत जानकारी देने से जुड़े मामलों में केवल सरकारी अधिकारी ही शिकायत कर सकते हैं, तो वह सीआरपीसी की धारा 195 में संशोधन कर इसके लिए स्पष्ट प्रावधान कर सकती थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया है।

Location :  New Delhi

Published :  20 October 2026, 11:28 AM IST

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