CRPF ने सेवा के दौरान आंख गंवाने वाले ड्राइवर को निकाला, सुप्रीम कोर्ट ने लगाया 1.25 करोड़ का जुर्माना

सेवा के दौरान दृष्टिहीन हुए सीआरपीएफ के पूर्व जवान को नौकरी से हटाने पर सुप्रीम कोर्ट ने सीआरपीएफ को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने कहा कि वैकल्पिक पद देना कानूनी जिम्मेदारी थी। केंद्र सरकार की अपील खारिज करते हुए पूर्व जवान को 1.25 करोड़ रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया।

Updated : 14 July 2026, 10:54 AM IST
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New Delhi: केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) को अपने ही एक घायल जवान को सेवा से बाहर करना भारी पड़ गया है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक ऐतिहासिक सुनवाई के दौरान सीआरपीएफ की कार्यप्रणाली पर गहरी नाराजगी व्यक्त की। देश की शीर्ष अदालत ने बल की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि सीआरपीएफ एक मॉडल एम्प्लॉयर के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह विफल रहा है। कोर्ट ने यह टिप्पणी उस मामले में की, जिसमें सेवा के दौरान अपनी आंखों की रोशनी खो देने वाले एक ड्राइवर को दूसरा काम देने के बजाय बल ने उसे चिकित्सकीय रूप से अयोग्य घोषित कर नौकरी से निकाल दिया था।

पूर्व जवान को मिलेगा 1.25 करोड़ रुपये का मुआवजा

न्यायालय ने पीड़ित पूर्व जवान के हक में फैसला सुनाते हुए उन्हें 1.25 करोड़ रुपये का भारी मुआवजा देने का आदेश दिया है। इस बड़ी राशि में जवान का बकाया वेतन, ब्याज और मुकदमे का खर्च शामिल है। चूंकि पीड़ित जवान अब सेवानिवृत्ति की उम्र पार कर चुके हैं, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें वापस सेवा में बहाल करने के हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के पुराने निर्देश में संशोधन किया और मुआवजे का रास्ता चुना।

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केंद्र सरकार की अपील खारिज, कोर्ट ने याद दिलाए नियम

न्यायमूर्ति दीपंकर दत्ता और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने इस मामले में केंद्र सरकार द्वारा दायर की गई अपील को सिरे से खारिज कर दिया। यह अपील हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ की गई थी, जिसमें सीआरपीएफ को दोषी पाया गया था। कोर्ट ने साफ किया कि सीआरपीएफ ने 'दिव्यांगजन (समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995' की धारा 47 का स्पष्ट उल्लंघन किया है। कानून के अनुसार, सरकारी विभागों का यह कर्तव्य है कि वे दिव्यांग हुए कर्मचारी को नौकरी से निकालने के बजाय उसे किसी अन्य वैकल्पिक पद पर समायोजित करें।

क्या कहती है दिव्यांगजन अधिनियम की धारा 47?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि दिव्यांगजन अधिनियम की धारा 47 अनिवार्य श्रेणी में आती है। यह धारा किसी भी कर्मचारी को कार्यस्थल पर उचित समायोजन का अधिकार देती है। कोर्ट के अनुसार, यदि कोई कर्मचारी सेवा के दौरान शारीरिक रूप से दिव्यांग हो जाता है, तो उसे समान वेतन और समान सेवा लाभों के साथ किसी दूसरे सुरक्षित पद पर भेजा जाना चाहिए। यदि ऐसा कोई पद खाली नहीं है, तो नियोक्ता की जिम्मेदारी है कि वह एक नया अतिरिक्त पद बनाकर उसे नौकरी पर रखे।

पूर्वव्यापी रूप से लागू नहीं हो सकती छूट की अधिसूचना

सुनवाई के दौरान सीआरपीएफ ने खुद को बचाने के लिए साल 2002 की एक सरकारी अधिसूचना का हवाला दिया, जिसके तहत सीआरपीएफ के लड़ाकू सैनिकों को इस अधिनियम की धारा 47 से छूट दी गई थी। कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि यह अधिसूचना 2002 में आई थी, जबकि पीड़ित जवान को 11 मार्च 1998 को ही सेवा से हटाया गया था। अदालत ने कानून स्पष्ट करते हुए कहा कि कोई भी सरकारी नियम या अधिसूचना अपने जारी होने की तारीख से पहले के मामलों पर लागू नहीं की जा सकती।

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क्या है पूरा घटनाक्रम?

यह पूरा मामला साल 1985 से शुरू होता है, जब पीड़ित व्यक्ति ने सीआरपीएफ में बतौर ड्राइवर अपनी सेवाएं शुरू की थीं। साल 1996 में उन्हें आंखों की एक गंभीर बीमारी हो गई। चिकित्सकीय जांच में पाया गया कि उनकी बाईं आंख की रोशनी पूरी तरह जा चुकी है और दाहिनी आंख से भी धुंधला दिखाई देता है। इसके बाद, सीआरपीएफ के मेडिकल बोर्ड ने उन्हें स्थायी रूप से अयोग्य घोषित कर दिया और 11 मार्च 1998 को सेवा से बर्खास्त कर दिया। जवान ने अपने पूरे वित्तीय लाभों की मांग की थी, जिसे विभाग ने ठुकरा दिया था, जिसके बाद यह लंबी कानूनी लड़ाई शुरू हुई।

Location :  New Delhi

Published :  14 July 2026, 10:54 AM IST

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