क्या मालदा आम बिक्री अभियान से बदल जाएगी ग्रामीण महिलाओं की किस्मत? जानिये पूरी कहानी

देवघर में मालदा आम बिक्री अभियान के जरिए JSLPS दीदियों को बाजार से जोड़ने की कोशिश शुरू हुई है। उद्देश्य महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह पहल स्थायी रोजगार दे पाएगी या सिर्फ एक मौसमी सरकारी कार्यक्रम बनकर रह जाएगी।

Updated : 10 June 2026, 11:30 AM IST
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Deoghar: देवघर में उप विकास आयुक्त (DDC) द्वारा मालदा आम बिक्री के लिए जागरूकता वाहन को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया गया। यह शुरुआत केवल एक फल बिक्री अभियान नहीं बल्कि ग्रामीण महिलाओं को बाजार से सीधे जोड़ने की कोशिश के रूप में देखी जा रही है। इस पहल के जरिए स्वयं सहायता समूहों (SHG) से जुड़ी महिलाओं को उत्पादन से आगे बढ़ाकर सीधे विपणन की जिम्मेदारी दी जा रही है। हालांकि बड़ा सवाल यह है कि क्या यह प्रयास ग्रामीण अर्थव्यवस्था में स्थायी बदलाव ला पाएगा या फिर यह अन्य योजनाओं की तरह कुछ दिनों की गतिविधि बनकर रह जाएगा।

JSLPS और स्वयं सहायता समूहों की बढ़ती भूमिका

झारखंड राज्य में झारखंड राज्य आजीविका संवर्धन सोसाइटी (JSLPS) के माध्यम से स्वयं सहायता समूहों का एक बड़ा नेटवर्क तैयार किया गया है। राज्य में लाखों महिलाएं सखी मंडल और SHG से जुड़ी हुई हैं। बताया जाता है कि 32 लाख से अधिक महिलाएं स्वयं सहायता समूहों का हिस्सा हैं, जबकि लगभग 34 लाख ग्रामीण परिवारों तक JSLPS की पहुंच है।

इन समूहों का उद्देश्य केवल बचत और ऋण तक सीमित नहीं है, बल्कि महिलाओं को उत्पादन, प्रसंस्करण और अब विपणन से भी जोड़ना है। “पलाश” ब्रांड के तहत महिलाओं द्वारा बनाए गए उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने की कोशिश भी इसी रणनीति का हिस्सा है।

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मालदा आम: सिर्फ फल नहीं, रोजगार का अवसर

मालदा आम बिक्री अभियान को केवल एक फल विपणन योजना के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह ग्रामीण महिलाओं को सीधे उपभोक्ताओं से जोड़ने की एक कोशिश है, जिससे बिचौलियों की भूमिका कम हो सके और महिलाओं को उनके उत्पाद का बेहतर मूल्य मिल सके।

ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती उत्पादन नहीं बल्कि बाजार तक पहुंच रही है। बिचौलियों के कारण उन्हें अक्सर उचित लाभ नहीं मिल पाता। यदि यह मॉडल सफल होता है, तो महिलाओं को अपने उत्पादों का पूरा लाभ मिलने की संभावना बढ़ जाएगी और वे आर्थिक रूप से अधिक सशक्त बन सकेंगी।

सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच सवाल

सरकार और JSLPS लगातार यह दावा करते रहे हैं कि स्वयं सहायता समूहों के जरिए लाखों परिवारों को आजीविका से जोड़ा गया है और उन्हें वित्तीय सहायता भी दी गई है। लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति पूरी तरह समान नहीं दिखती।

कई सवाल अब भी बने हुए हैं- क्या सभी समूह नियमित रूप से लाभ कमा रहे हैं? क्या हर महिला को स्थायी आय मिल रही है? क्या उत्पादों के लिए स्थायी बाजार उपलब्ध है? कई जगहों पर शुरुआती उत्साह के बाद समूह निष्क्रिय भी हो जाते हैं। इसका कारण प्रशिक्षण की कमी, कमजोर विपणन व्यवस्था और बाजार तक सीमित पहुंच को माना जाता है।

जागरूकता वाहन से आगे की चुनौती बाजार की

देवघर से रवाना हुआ जागरूकता वाहन अभियान की शुरुआत जरूर है, लेकिन इसकी वास्तविक सफलता बिक्री पर निर्भर करेगी। बाजार में पहले से मौजूद बड़े विक्रेताओं के बीच SHG की महिलाओं को गुणवत्ता, मूल्य और भरोसे के आधार पर अपनी जगह बनानी होगी।

यदि प्रशासनिक सहयोग केवल औपचारिकता तक सीमित रहा तो यह योजना कुछ दिनों की चर्चा बनकर रह जाएगी। लेकिन यदि बिक्री केंद्र, परिवहन, भंडारण और डिजिटल भुगतान जैसी व्यवस्थाएं मजबूत की गईं, तो यह ग्रामीण महिलाओं के लिए बड़ा आर्थिक अवसर बन सकता है।

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देवघर में शुरू हुआ यह मालदा आम बिक्री अभियान सिर्फ एक बाजार गतिविधि नहीं, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक भविष्य से जुड़ा प्रयोग है। यदि यह सफल होता है तो आने वाले समय में अन्य कृषि उत्पाद भी महिलाओं के नेतृत्व में सीधे बाजार तक पहुंच सकते हैं।

Location :  Deoghar

Published :  10 June 2026, 11:30 AM IST

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