हीर-रांझा की स्टोरी भी पड़ जाएगी फीकी! जब सुनेंगे कुमाऊं के राजा मालूशाही के प्यार और त्याग की प्रेम कहानी

पंजाब की हीर-रांझा और राजस्थान की ढोला-मारू की तरह उत्तराखंड की 'राजुला-मालूशाही' लोकगाथा अमर प्रेम का अनूठा प्रतीक है।

Post Published By: Priyam Kashyap
Updated : 31 August 2026, 4:36 PM IST
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New Delhi: भारतीय लोककथाओं में प्रेम की कहानियां भरी पड़ी हैं। जहां पंजाब की हीर-रांझा और राजस्थान की ढोला-मारू की कहानियां बहुत मशहूर हैं, वहीं उत्तराखंड की राजुला-मालूशाही की कहानी का अपना एक खास स्थान है। यह कोई पौराणिक कथा नहीं, बल्कि कुमाऊं क्षेत्र की एक प्रेम-भरी लोकगाथा है एक ऐसी कहानी जिसमें प्यार, परिवार, समाज और सत्ता की बंदिशों के बीच उलझा हुआ है।

संतान की चाहत ने दो परिवारों को एक साथ किया ला खड़ा

स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, कत्यूरी वंश के राजा दुलाशाह अपनी कोई संतान न होने के कारण परेशान थे। वे भगवान शिव की पूजा करने बागेश्वर गए। वहां उनकी मुलाकात भोट क्षेत्र के व्यापारी सुनपत शौका से हुई, जो भी संतान प्राप्ति की प्रार्थना लेकर ही वहां आए थे।

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दोनों ने तय किया कि अगर एक को बेटा और दूसरे को बेटी हुई, तो वे उन दोनों की शादी करवा देंगे। समय के साथ, दुलाशाह के घर मालूशाही और सुनपत के घर राजुला का जन्म हुआ। इस तरह बचपन से ही उनका मिलन तय माना जाने लगा।

शादी के बाद मुश्किलें खड़ी हुईं

लोककथाओं के अनुसार, मालूशाही की कुंडली देखने के बाद एक पुजारी ने उसके जीवन को लेकर चिंता जताई। भविष्यवाणी की गई कि अगर उसने पांचवें दिन तक शादी नहीं की, तो उसकी जान खतरे में पड़ सकती है। नतीजतन राजुला और मालूशाही की शादी कर दी गई। हालांकि, शादी के दौरान ही राजा दुलाशाह का निधन हो गया। अफवाहें फैलने लगीं कि राजुला अशुभ है। इसी डर से शादी को गुप्त रखा गया ताकि राजुला शाही परिवार में प्रवेश न कर सके।

राजुला बैराठ पहुंची, फिर भी उनका मिलन रहा अधूरा

जब राजुला को अपनी शादी के बारे में पता चला, तो वह मालूशाही से मिलने बैराठ के लिए निकल पड़ी। इस बीच, मालूशाही ने अपनी मां के सामने राजुला को अपनाने की इच्छा जताई, लेकिन वह उनकी सहमति नहीं ले सका।लोककथाओं के अनुसार, मालूशाही को एक ऐसी जड़ी-बूटी सुंघा दी गई जिससे वह गहरी और लंबी नींद में सो गया, ताकि वह आगे न बढ़ सके। राजुला उस जगह पहुंची, लेकिन दोनों मिल नहीं पाए। वहां से जाने से पहले उसने अपनी हीरे की अंगूठी मालूशाही की उंगली में पहना दी।

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मालुशाही योगी का भेष धरकर रजुला के पास पहुंचे

होश में आने पर मालुशाही ने अंगूठी देखी और उन्हें एहसास हुआ कि रजुला उनसे मिलने आई थीं। इसके बाद उन्होंने गुरु गोरखनाथ से मार्गदर्शन लिया। हालांकि, तब तक रजुला की शादी 'हूण' देश में हो चुकी थी। लोककथाओं के अनुसार, मालुशाही ने योगी का भेष धारण किया और कई बाधाओं को पार किया। लंबे संघर्ष के बाद, उन्होंने विरोधी ताकतों को हराया और आखिरकार रजुला से उनका मिलन हुआ।

यह प्रेम कहानी लोकगीतों में आज भी है जीवित

रजुला और मालुशाही की कहानी कुमाऊं की लोक-संस्कृति में आज भी जीवित है। यह प्रेम कहानी लोकगीतों और पारंपरिक कथाओं के माध्यम से पीढ़ियों तक पहुंचती रही है। यही कारण है कि उत्तराखंड में रजुला और मालुशाही को आज भी संघर्ष, समर्पण और अमर प्रेम का प्रतीक माना जाता है।

Location :  New Delhi

Published :  31 August 2026, 4:36 PM IST

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