क्या लौट आएगी तबाही? नैनीताल पर मंडराया 146 साल पुराना खतरा, इसरो और यूरोपीय सैटेलाइट की रिपोर्ट ने उड़ाई नींद

Nainital Landslide Threat: नैनीताल की 84% जमीन पर भूस्खलन का बड़ा खतरा। उपग्रह रिसर्च में खुलासा- धंस रही है जमीन। क्या फिर दोहराएगी 1880 की वो दर्दनाक त्रासदी जिसमें गई थी 151 जानें? पूरी खबर पढ़ें

Post Published By: Tanya Chand
Updated : 18 September 2026, 11:57 AM IST
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Nainital: देवभूमि उत्तराखंड की शान और झीलों की नगरी नैनीताल अपनी खूबसूरत वादियों, शांत तालों और ठंडी आबोहवा के लिए दुनिया भर में मशहूर है। लेकिन सैर-सपाटे के इस मशहूर ठिकाने के नीचे एक बेहद खतरनाक भूगर्भीय हलचल चल रही है, जो भविष्य में किसी बड़े विनाश का कारण बन सकती है।

शोधकर्ताओं और भू-वैज्ञानिकों के एक संयुक्त उपग्रह अध्ययन में बेहद चौंकाने वाले और डरावने आंकड़े सामने आए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, नैनीताल का करीब 24.9 प्रतिशत इलाका बेहद संवेदनशील यानी अत्यधिक जोखिम की श्रेणी में है, जबकि 59.6 प्रतिशत क्षेत्र मध्यम जोखिम वाले जोन में आ चुका है। यानी कुल मिलाकर नैनीताल का 84 प्रतिशत हिस्सा भूस्खलन की चपेट में आने की कगार पर है।

अंतरिक्ष से मिली चेतावनी: कहीं धंस रही तो कहीं उठ रही जमीन

यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के सेंटिनल 1ए (Sentinel-1A) उपग्रह से वर्ष 2017 से 2024 के बीच जुटाए गए आंकड़ों के एडवांस विश्लेषण (PSI तकनीक) से पता चला है कि नैनीताल की जमीन स्थिर नहीं है। शहर के अलग-अलग हिस्सों में जमीन की गति में असमानता देखी गई है।

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अध्ययन में सामने आया है कि बलियानाला क्षेत्र में जमीन लगातार आठ से 10 मिलीमीटर प्रतिवर्ष की दर से नीचे धंस रही है। वहीं दूसरी ओर, शेर-का-डांडा पहाड़ी क्षेत्र में जमीन छह से आठ मिलीमीटर प्रतिवर्ष की रफ्तार से ऊपर उठ रही है। जमीन का यह असंतुलन किसी भी वक्त बड़े भूस्खलन को न्योता दे सकता है।

1880 का वो दर्दनाक शनिवार, जब दफन हो गई थीं 151 जिंदगियां

इस ताजा चेतावनी ने 146 साल पुरानी उस ऐतिहासिक त्रासदी की यादें ताजा कर दी हैं, जिससे नैनीताल आज तक उबर नहीं पाया है। 18 सितंबर 1880 के शनिवार का दिन नैनीताल के इतिहास का सबसे काला दिन माना जाता है। दो दिनों तक लगातार हुई मूसलाधार बारिश के बाद मल्लीताल क्षेत्र में इतना भयावह भूस्खलन हुआ कि पूरी की पूरी पहाड़ी भरभराकर नीचे आ गिरी।

कई आलीशान इमारतें जमींदोज हो गईं और प्रसिद्ध नैना देवी मंदिर पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था। उस भयानक हादसे में 108 भारतीयों और 43 ब्रिटिश नागरिकों समेत कुल 151 लोगों की दर्दनाक मौत हुई थी।

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भूस्खलन का पुराना इतिहास और अनसुलझे सवाल

नैनीताल में भूस्खलन का इतिहास बहुत पुराना रहा है। पहली बड़ी घटना साल 1867 में चार्टन लॉज की पहाड़ी पर दर्ज की गई थी, जिसके बाद तत्कालीन कुमाऊं कमिश्नर सर हेनरी रैमजे ने 'हिल साइड सेफ्टी कमेटी' बनाई थी। इसके बाद 1866 में आल्मा हिल, 1924 में अयारपाटा, 1987-88 में चायना पीक और ठंडी सड़क पर कई बार चट्टानें दरकी हैं।

आज एक बार फिर वही खतरे की घंटी बज रही है। यदि वैज्ञानिक रिपोर्टों को गंभीरता से लेकर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो खूबसूरत नैनीताल को एक बार फिर इतिहास की पुनरावृत्ति का सामना करना पड़ सकता है।

Location :  Nainital

Published :  18 September 2026, 11:57 AM IST

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