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उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की जंग (सोर्स- Pinterest)
Lucknow: उत्तर प्रदेश में होने जा रहे राज्यसभा चुनाव का राजनीतिक पारा लगातार चढ़ता जा रहा है। इस बार का चुनाव केवल आंकड़ों की लड़ाई नहीं, बल्कि विधायकों के बीच संभावित पाला बदलने और सियासी गोलबंदी की एक नई पटकथा लिख रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही अपने-अपने संख्या बल को मजबूत करने और चुनावी गणित को अपने पक्ष में करने की कवायद में पूरी शिद्दत से जुट गए हैं।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) इस चुनाव में अपनी आठ सीटों की जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नजर आ रही है। चुनावी आंकड़ों और गणित पर गौर करें तो राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए कुल 36 विधायकों के वोटों का कोटा आवश्यक माना जाता है। इस हिसाब से आठ सीटों के लिए कुल 288 वोटों की दरकार होगी। दूसरी ओर, भाजपा के पास वर्तमान में अपने 259 विधायक हैं। इसके साथ ही पार्टी को अपने सहयोगी दलों और कुछ अन्य असंबद्ध विधायकों का भी समर्थन प्राप्त है, जिससे उसका कुल संख्या बल लगभग 299 तक पहुंच जाता है। इस मजबूत स्थिति के कारण पार्टी अपने आठ उम्मीदवारों को आसानी से जिताने के बाद भी करीब 11 वोट सरप्लस यानी अतिरिक्त बचा लेगी।
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आठ सीटों के सुरक्षित गणित को पार करने के बाद अब भाजपा की निगाहें बेहद रणनीतिक रूप से नौवीं सीट पर भी टिक गई हैं। हालांकि, नौवें उम्मीदवार को मैदान में उतारने और उसे जिताने के लिए पार्टी को कुल 36 वोटों की जरूरत होगी। मौजूदा स्थिति में भाजपा के पास अतिरिक्त बचे 11 वोटों को मिलाकर कुल 25 और विधायकों के समर्थन की आवश्यकता है। पार्टी अपने दम पर इस जादुई आंकड़े तक नहीं पहुंच सकती। यही वजह है कि नौवीं सीट को लेकर शुरू हुई सियासी रस्साकसी में विपक्षी खेमे में सेंधमारी और असंतुष्टों को साधना सबसे बड़ा और अहम पहलू बन गया है।
नौंवी सीट की इस पेचीदा जंग में भाजपा की उम्मीदें मुख्य रूप से विपक्षी खेमे के उन विधायकों पर टिकी हैं, जिन्होंने पिछले राज्यसभा चुनाव के दौरान पार्टी लाइन से हटकर क्रॉस वोटिंग की थी या जिनके राजनीतिक समीकरण भाजपा के साथ अनुकूल रहे हैं। पिछले चुनावों में सपा और अन्य दलों से बगावत करने वाले मनोज कुमार पांडेय, पूजा पाल, राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह, विनोद चतुर्वेदी, आशुतोष मौर्या और महाराजी देवी जैसे प्रमुख नाम इस फेहरिस्त में शामिल हैं। भाजपा इनमें से कई चेहरों को अपने पाले में मानकर अपनी रणनीति को आगे बढ़ा रही है। हालांकि, पार्टी के अंदरखाने से यह बात भी सामने आ रही है कि विपक्ष के जो विधायक संपर्क में हैं, वे आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव में टिकट की पक्की गारंटी मिलने के बाद ही अपना समर्थन देने की शर्त रख रहे हैं।
फिलहाल, नौवीं सीट के लिए 25 अतिरिक्त वोटों का इंतजाम करना भाजपा के लिए एक बड़ी और कठिन चुनौती बना हुआ है। आठवीं सीट का गणित भी काफी हद तक अतिरिक्त समर्थन पर निर्भर है, ऐसे में नौवीं सीट की यह कवायद मुकाबले को बेहद दिलचस्प और कांटे का बना रही है। जैसे-जैसे नामांकन और मतदान की तारीखें नजदीक आएंगी, दोनों ही खेमे अपने-अपने विधायकों को एकजुट रखने और दूसरे पाले में सेंध लगाने के लिए नए सियासी समीकरण साधने में व्यस्त रहेंगे।
Location : Lucknow
Published : 1 October 2026, 9:35 AM IST
Topics : BJP Strategy Samajwadi Party Rebels UP Assembly Election 2027 UP Rajya Sabha Elections Uttar Pradesh politics