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आलू बेल्ट में किसानों का दर्द
Etawah: उत्तर प्रदेश के प्रमुख आलू उत्पादक क्षेत्रों में इस बार आलू किसानों की हालत बेहद खराब है। इटावा की मंडियों में पहुंच रहे किसान अपनी फसल का दर्द बयां करते हुए आलू का नाम तक लेने से बच रहे हैं। किसी ने कहा, "आलू की बात मत करिए", तो किसी ने गुस्से में यह तक कह दिया, "हम आलू को जानते ही नहीं।" इन शब्दों में इस बार की आलू खेती से जुड़े किसानों की बेबसी साफ दिखाई देती है।
दरअसल, इटावा समेत प्रदेश के जिन जिलों को "आलू बेल्ट" कहा जाता है, वहां इस बार किसानों को लागत तक निकालना मुश्किल हो गया है।
उत्तर प्रदेश में फर्रुखाबाद, कन्नौज, इटावा, मैनपुरी, फिरोजाबाद, मथुरा और अलीगढ़ को प्रमुख रूप से आलू बेल्ट का हिस्सा माना जाता है। इन जिलों की जलवायु और मिट्टी आलू उत्पादन के लिए अनुकूल मानी जाती है। यहां बड़ी संख्या में किसान अपनी आजीविका के लिए आलू की खेती पर निर्भर रहते हैं और हर साल लाखों क्विंटल आलू का उत्पादन होता है।

किसान अक्टूबर-नवंबर में आलू की बुवाई करते हैं। इसके बाद लगभग 15 मार्च से 15 अप्रैल के बीच खुदाई पूरी हो जाती है। बेहतर दाम मिलने की उम्मीद में किसान अपनी उपज को कोल्ड स्टोरेज में रख देते हैं और अक्टूबर-नवंबर में बेचकर मुनाफा कमाने का इंतजार करते हैं।
लेकिन इस बार हालात उम्मीद के बिल्कुल विपरीत हैं।
जून के मौजूदा बाजार भाव में आलू की कीमत महज 250 से 300 रुपये प्रति पैकेट चल रही है। एक पैकेट में करीब 50 से 52 किलोग्राम आलू होता है।
किसानों के अनुसार एक बीघा खेत में औसतन 45 से 50 पैकेट आलू का उत्पादन होता है। बीज, जुताई, खाद, बुवाई और रखरखाव समेत एक बीघा में लागत करीब 12 से 14 हजार रुपये आती है।
इसके अलावा कोल्ड स्टोरेज का लगभग 130 रुपये प्रति पैकेट किराया भी देना पड़ता है। इस खर्च को जोड़ने के बाद प्रति बीघा कुल लागत करीब 22 से 23 हजार रुपये तक पहुंच जाती है।

मौजूदा बाजार दर पर 45 से 50 पैकेट आलू बेचने पर किसान को करीब 15 हजार रुपये की ही आमदनी हो रही है। यानी लागत निकलना तो दूर, किसानों को हजारों रुपये का सीधा नुकसान उठाना पड़ रहा है।
यही वजह है कि आलू बेल्ट के किसान आज मानसिक और आर्थिक दबाव में हैं। मंडियों में बातचीत के दौरान किसान आलू का जिक्र आते ही दर्द और नाराजगी जाहिर कर रहे हैं।
किसानों को उम्मीद है कि आने वाले अक्टूबर-नवंबर तक आलू के दामों में कुछ सुधार होगा, जिससे वे कम से कम कर्ज और घाटे की स्थिति से उबर सकेंगे।
आखिर क्यों नहीं करना चाहते किसान आलू की बात?
क्योंकि जिस आलू को कभी किसानों की नकदी फसल और मुनाफे का जरिया माना जाता था, वही आज उनके लिए नुकसान का सौदा बन गया है। इटावा की मंडी में किसानों की जुबान पर एक ही दर्द सुनाई देता है—"आलू ने इस बार हमें वेंटिलेटर पर पहुंचा दिया है।"
Location : Etawah
Published : 11 June 2026, 6:03 PM IST