’10 मिनट’ का झूठा वादा और डेढ़ घंटे का इंतजार… पिता की गोद में बेटे ने तोड़ा दम, आजमगढ़ में स्वास्थ्य सेवाएं की खुली पोल

सरकार के बड़े दावों के बीच यूपी के आजमगढ़ में स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खुली। समय पर 108 एंबुलेंस न मिलने और वेंटिलेटर के अभाव में पिता की गोद में मासूम बेटे ने तड़पकर दम तोड़ दिया।

Updated : 7 August 2026, 11:08 AM IST
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Azamgarh: उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर और चुस्त-दुरुस्त बनाने के सरकारी दावे अक्सर अखबारों की सुर्खियां बनते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलने के लिए काफी है। आजमगढ़ जिले से एक ऐसा ही झकझोर देने वाला मामला सामने आया है, जहां एंबुलेंस सेवा की सुस्ती और स्वास्थ्य व्यवस्था की लापरवाही ने एक हंसते-खेलते मासूम की जिंदगी छीन ली। समय पर मदद न मिलने के कारण एक पिता को अपनी ही आंखों के सामने, अपनी ही गोद में अपने 11 साल के बेटे को दम तोड़ते हुए देखना पड़ा।

चक्रपानपुर मेडिकल कॉलेज में नहीं मिला वेंटिलेटर

घटना की शुरुआत मऊ जिले के रानीपुर फतेहपुर से हुई। पीड़ित पिता अमित के अनुसार, बुधवार शाम उनके 11 साल के बेटे अंश की तबीयत अचानक बहुत ज्यादा बिगड़ गई। परिजन उसे लेकर पहले चिरैयाकोट के एक निजी अस्पताल पहुंचे, जहां प्राथमिक उपचार के बाद डॉक्टरों ने उसकी गंभीर हालत को देखते हुए राजकीय मेडिकल कॉलेज, चक्रपानपुर रेफर कर दिया। जब परिजन बच्चे को लेकर चक्रपानपुर मेडिकल कॉलेज पहुंचे, तो वहां जांच के बाद डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए और कहा कि बच्चे को तत्काल वेंटिलेटर की जरूरत है, लेकिन अस्पताल में कोई भी वेंटिलेटर खाली नहीं है। इसके बाद मजबूरी में उसे बीएचयू, वाराणसी के लिए रेफर कर दिया गया।

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'बस 10 मिनट में पहुंच रही है एंबुलेंस', आश्वासन के फेर में बीता डेढ़ घंटा

डॉक्टरों द्वारा बीएचयू रेफर किए जाने के बाद पिता अमित ने तुरंत 108 आपातकालीन एंबुलेंस सेवा पर फोन मिलाया। आरोप है कि इसके बाद से उन्हें सिर्फ एक ही रटा-रटाया आश्वासन मिलता रहा कि 'एंबुलेंस 10 मिनट में पहुंच रही है।' लेकिन यह दस मिनट का इंतजार डेढ़ घंटे में बदल गया। फोन पर लगातार आश्वासन मिलते रहे, जबकि दूसरी तरफ मासूम अंश की हालत पल-पल बिगड़ती जा रही थी और बेबस परिवार केवल मदद की उम्मीद में बैठा रहा।

मजबूरन ली निजी एंबुलेंस की शरण, लेकिन रास्ते में ही थम गईं सांसें

जब डेढ़ घंटे बीत जाने के बाद भी कोई सरकारी एंबुलेंस मौके पर नहीं पहुंची, तो परिजनों ने किसी तरह उधार मांगकर और अन्य माध्यमों से एक निजी एंबुलेंस का इंतजाम किया। इसके बाद वे बच्चे को लेकर वाराणसी के लिए रवाना हुए। लेकिन सिस्टम की इस लंबी देरी ने तब तक बहुत देर कर दी थी। बीएचयू अस्पताल पहुंचने से पहले ही रास्ते में अंश ने अपने पिता की गोद में ही हमेशा के लिए दम तोड़ दिया।

सिस्टम के आगे बेबस पिता का दर्द और प्रशासनिक सफाई

अपने बेटे को अपनी ही गोद में तड़प-तड़प कर दम तोड़ते देखने का जो दर्द एक पिता की आंखों में था, वह शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। इस पूरी घटना ने स्वास्थ्य विभाग की आपात सेवाओं और मेडिकल कॉलेजों की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए मेडिकल कॉलेज के चिकित्सक कृष्णकांत ने बताया कि बच्चे के फेफड़ों में पानी भर गया था और उसकी हालत बेहद गंभीर थी, जिसके लिए बीएचयू से भी बात की गई थी और परिजन लगातार एंबुलेंस का प्रयास कर रहे थे। वहीं, दूसरी ओर सरकारी महकमे का अपना पक्ष था। 108 एंबुलेंस के रीजनल मैनेजर सुमित सिंह ने बताया कि जिले में एंबुलेंस का औसत रिस्पांस टाइम सात मिनट है और बुधवार रात पहला कॉल 9:09 बजे आया था, जिसके बाद रात 9:45 बजे एंबुलेंस मेडिकल कॉलेज पहुंच गई थी।

108 एंबुलेंस के प्रभारी अजय ने अपना पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया कि रात में एक एंबुलेंस बीएचयू मरीज लेकर गई थी और दूसरी तरवां से मरीज लेकर आ रही थी। उनके मुताबिक जब एंबुलेंस वहां पहुंची, तो कॉलर ने लेने से मना कर दिया और निजी वाहन से जाने लगे, जिसके बाद बच्चे की मृत्यु हो गई।

बहरहाल, विभागों के इन दावों और सफाई के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि समय पर एंबुलेंस मिल जाती, तो क्या मासूम अंश की जान बचाई जा सकती थी? पीड़ित परिवार अब इस पूरे मामले की जांच कराने और इसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग कर रहा है।

Location :  Azamgarh

Published :  7 August 2026, 11:08 AM IST

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