यूपी में क्यों घुट रहा है दम? विश्व बैंक की मदद से सभी 75 जिलों में खुलेगा जहरीली हवा का खौफनाक राज

यूपी में प्रदूषण के कारण दमा-सांस के मरीज हर साल 12% बढ़ रहे हैं। इससे निपटने के लिए विश्व बैंक की मदद से सभी 75 जिलों में 'क्लीन एयर मैनेजमेंट प्रोजेक्ट' के तहत शोध शुरू हुआ है। 15 बड़े संस्थानों को इसकी जिम्मेदारी दी गई है, जो 5 साल तक हवा के नमूनों की जांच करेंगे।

Post Published By: Poonam Rajput
Updated : 21 June 2026, 4:41 PM IST
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Lucknow: उत्तर प्रदेश की हवा अब जीवन देने वाली नहीं, बल्कि बीमारियां बांटने वाली सहेली बन चुकी है। राज्य में दमा, अस्थमा और सांस की बीमारियों के मरीजों की संख्या में हर साल 10 से 12 फीसदी का भयावह इजाफा हो रहा है। हवा में तेजी से बढ़ रहा कार्बन, पीएम 2.5 और भारी विषैले तत्व लोगों को असमय मौत की नींद सुला रहे हैं। इस जानलेवा संकट की असली वजह और इसके खतरनाक दुष्प्रभावों को समझने के लिए पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने एक बड़ा कदम उठाया है। इसके तहत 'उत्तर प्रदेश क्लीन एयर मैनेजमेंट प्रोजेक्ट' की शुरुआत की गई है, जिसके अंतर्गत राज्य के सभी 75 जिलों में एक व्यापक शोध (रिसर्च) किया जाएगा। इस बड़े प्रोजेक्ट का पूरा वित्तीय खर्च विश्व बैंक वहन कर रहा है।

15 नामी संस्थानों को मिली जिम्मेदारी

इस महा-अभियान को धरातल पर उतारने के लिए देश और प्रदेश के 15 नामी शैक्षणिक व तकनीकी संस्थानों को जिम्मेदारी बांटी गई है। इसके लिए विश्व बैंक से शासन का आधिकारिक समझौता हो चुका है। प्रोजेक्ट के तहत हाई-टेक प्रयोगशालाओं (लैब) के लिए 27.9 लाख रुपये और आगरा, अलीगढ़, गोरखपुर व झांसी में बनने वाली चार 'मिनी सुपर साइट्स' के लिए 5.20 करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत किया गया है। इन केंद्रों पर पर्यावरण से जुड़े नए पाठ्यक्रम भी शुरू होंगे, जिनका पूरा खाका आईआईटी कानपुर द्वारा तैयार किया जाएगा। जिलों की जिम्मेदारी के तहत डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय को आगरा, मथुरा व इटावा, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को अलीगढ़, एटा, हाथरस व कासगंज तथा बीएचयू को वाराणसी में शोध का जिम्मा मिला है।

5 साल में 525 से अधिक नमूनों का होगा पोस्टमार्टम

आंबेडकर विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लाइफ साइंस के निदेशक प्रो. भूपेंद्र स्वरूप शर्मा के मुताबिक, विशेषज्ञों की टीमें सबसे पहले अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्रों को चिह्नित कर वहां आधुनिक उपकरण स्थापित करेंगी। हर साल न्यूनतम 104 एयर सैंपल लेकर लैब में जांच की जाएगी। 5 वर्षों में कुल 525 से अधिक नमूनों की गहन जांच के बाद एक विस्तृत रिपोर्ट शासन को भेजी जाएगी, जिसके आधार पर भविष्य की सख्त गाइडलाइन तैयार होगी।

युवाओं के फेफड़े हो रहे हैं छलनी

चिंताजनक बात यह है कि अब बुजुर्गों के साथ-साथ युवा भी इस जहरीली हवा का शिकार बन रहे हैं। मेडिकल कॉलेज की ओपीडी में हर महीने औसतन 7500 मरीज सिर्फ सांस की दिक्कतों के साथ पहुंच रहे हैं। हवा में मौजूद आर्सेनिक, लेड और सल्फर डाइऑक्साइड के कारण फेफड़ों के कैंसर और टीबी का ग्राफ तेजी से ऊपर जा रहा है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अकेले आगरा में एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 486 के खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका है, जबकि सामान्य तौर पर इसे सिर्फ 50 होना चाहिए।

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सैटेलाइट डेटा और एआई का इस्तेमाल

 इस प्रोजेक्ट में पहली बार जमीनी उपकरणों के साथ-साथ इसरो (ISRO) के सैटेलाइट डेटा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल किया जाएगा, जो हवा में तैरते बारीक धूल कणों के स्रोत (जैसे- पराली, फैक्ट्रियां या गाड़ियां) की सटीक पहचान रियल-टाइम में करेगा।

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विंटर स्मॉग एक्शन प्लान

शोध से मिलने वाले शुरुआती डेटा के आधार पर उत्तर प्रदेश सरकार आगामी सर्दियों के महीनों के लिए एक कस्टमाइज्ड 'विंटर स्मॉग एक्शन प्लान' तैयार करेगी, जिससे एनसीआर के साथ-साथ पूरे यूपी में लॉकडाउन जैसी नौबत से बचा जा सके।

Location :  New Delhi

Published :  21 June 2026, 4:41 PM IST

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