यूपी चुनाव: PDA के साथ ‘पंडित जी’? अखिलेश यादव ने राजनीति में क्यों आजमाया नेताजी का चरखा दांव?

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर सपा प्रमुख अखिलेश यादव के 'सोशल इंजीनियरिंग' के दांव ने राज्य के सियासी माहौल को गरमा दिया है। सपा प्रमुख का मास्टर स्ट्रोक सियासी गलियारों में चर्चा की विषय बनी हुई है।

Post Published By: Subhash Raturi
Updated : 8 July 2026, 7:43 PM IST
google-preferred

Lucknow: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अभी भले ही दूर हों, लेकिन सियासी समर की सरगर्मियां चरम पर पहुंचने लगी हैं। सभी राजनीतिक दल अपने-अपने समीकरणों को सुलझाने और माहौल को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए नए पासे फेंक रहे हैं। नेताओं की तीखी बयानबाजी, रणनीतिक गोलबंदी और विपक्ष पर बढ़ते हमले साफ संकेत दे रहे हैं कि राज्य में चुनावी शंखनाद हो चुका है।

यूपी में बढ़ती सियासी सरगर्मियों के बीच इन दिनों राज्य की राजनीति में समाजवादी पार्टी के कानपुर ब्राह्मण सम्मेलन की खूब चर्चा हो रही है। सपा के इस सम्मेलन ने लखनऊ से लेकर दिल्ली की राजनीतिक को एक नई हवा दे दी है। इस सम्मेलन के जरिए सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने न सिर्फ अपनी सोशल इंजीनियरिंग का नया अध्याय खोला है, बल्कि सत्ताधारी भाजपा को भी नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है।

अखिलेश यादव ने इस सम्मेलन के जरिए 'PDA' के साथ 'सवर्ण' समीकरण साधने की अपनी सियासी चाल को सार्वजनिक कर दिया है, जो यूपी के चुनावी रुख को पूरी तरह बदलने का दम रखती है।

प्रयोगधर्मी राजनीतिज्ञ हैं अखिलेश यादव

उत्तर प्रदेश के सबसे युवा मुख्यमंत्री रह चुके अखिलेश यादव अब एक प्रयोगधर्मी राजनीतिज्ञ के रूप में खुद को स्थापित कर चुके हैं। कभी पारंपरिक 'मुस्लिम-यादव' (M-Y) समीकरण पर निर्भर रहने वाली सपा को अखिलेश ने पहले PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के प्रगतिशील नारे से जोड़ा और अब वे इसके व्यापक संदर्भों का इस्तेमाल करके दूसरी बार सत्ता पर काबिज होना चाहते हैं।

अखिलेश समय और परिस्थिति के अनुसार पीडीए की परिभाषा बदलते रहे हैं। वे कई बार पीडीए के व्यापक संदर्भों को परिभाषित करते रहे हैं। शुरुआती दौर में जो PDA सिर्फ पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक तक सीमित था, उसमें समय-समय पर उन्होंने 'पीड़ित' और 'अगड़े' जैसे शब्दों को भी जोड़ा। लेकिन कानपुर के मंच से उन्होंने यह साफ कर दिया कि आगामी चुनाव वह केवल सामाजिक न्याय के पुराने ढर्रे पर नहीं, बल्कि एक व्यापक और सर्वसमावेशी सामाजिक गठबंधन के दम पर लड़ना चाहते हैं और यूपी की सत्ता में दोबारा काबिज होने के लिए पीडीए के फार्मूले पर आगे बढ़ना चाहते हैं।

इस ब्राह्मण सम्मेलन का मुख्य आकर्षण मंच के पीछे लगा वह विशाल बैनर रहा, जिस पर लिखा था— “ब्राह्मण चला अखिलेश के संग।” यह नारा इस समय यूपी के राजनीतिक गलियारों में विमर्श का केंद्र बन गया है।

पारंपरिक रूप से भाजपा का मजबूत वोटबैंक माने जाने वाले ब्राह्मण समाज में पैठ बनाने की यह कोशिश अखिलेश का बड़ा मास्टरस्ट्रोक मानी जा रही है, क्योंकि PDA के कोर वोटबैंक के साथ अगर सवर्णों का एक हिस्सा भी सपा की तरफ झुकता है, तो यह यूपी का पूरा चुनावी गणित बदल सकता है।

मुलायम सिंह यादव का चरखा दांव

राजनीतिक विश्लेषक अखिलेश यादव के इस दांव को सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव के चरखा दांव की तरह बता रहे हैं, जिसे नेताजी प्रतिद्वंदी को चारों खाने चित्त करने के लिये चला करते थे। यह बात अलग है कि मुलायम सिंह यादव इस दांव को अक्सर कुश्ती के अखाड़े में आजमाते थे और विजयी होते थे। माना जा रहा है कि अखिलेश यादव ने PDA के जरिये ऐसा ही दांव खेला है, जो विपक्षियों को परेशान कर सकता है।

नोएडा में अखिलेश यादव के नाम पर बड़ा अभियान, अतुल यादव बोले- सपा का सेवा ही संकल्प

ब्राह्मण चेहरों को फ्रंटफुट पर उतारा

अखिलेश यादव ने इस बार PDA के पीछे छिपी रणनीति को सिर्फ बयानों तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि जमीन पर उतारने के लिए अपने दो सबसे भरोसेमंद ब्राह्मण चेहरों को फ्रंटफुट पर लगा दिया है।

सांसद सनातन पांडेय जहां यूपी के अलग-अलग शहरों और जिलों में लगातार ब्राह्मण सम्मेलन कर समाज को सपा के पाले में लाने का जिम्मा संभाल रहे हैं, वहीं पूर्व विधायक पवन पांडेय आक्रामक तेवर अपनाकर विपक्षी खेमे को रणनीतिक रूप से घेरने में जुटे हैं। ये दोनों नेता मिलकर ब्राह्मण समाज को यह भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि समाजवादी पार्टी में उनका सम्मान और हिस्सेदारी सुरक्षित है।

गौतमबुद्ध नगर के किसानों ने कहा- योगी से अच्छी तो अखिलेश यादव की सरकार थी, सरकार की नीतियों की खोली पोल

PDA + सवर्ण का चक्रव्यूह

साफ है कि अखिलेश यादव इस बार पारंपरिक जातीय सीमाओं को तोड़कर 'PDA + सवर्ण' का एक नया ताना-बाना बुन रहे हैं, जो भाजपा के मजबूत किले में सेंध लगाने की एक सोची-समझी रणनीति है। अखिलेश यादव का यह दांव यदि सही रहा तो कहा जा सकता है कि ‘पंडित जी’ भी अब PDA के साथ चलेंगे।

ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि अखिलेश की यह नई सोशल इंजीनियरिंग उन्हें उत्तर प्रदेश के सत्ता के शीर्ष तक दोबारा पहुंचा पाती है या नहीं, लेकिन फिलहाल उनके इस दांव ने यूपी के आगामी चुनावी मुकाबले को बेहद प्रभावी और दिलचस्प बना दिया है।

Location :  Lucknow

Published :  8 July 2026, 7:37 PM IST

Advertisement