Dynamite News Exclusive: खेती से नहीं भर रहा घर का खर्च, अब भेड़-बकरियां बदल रही हैं गांव वालों की किस्मत!

इटावा के सैफई क्षेत्र के एक गांव में खेती से घटती आमदनी ने ग्रामीणों को नया रास्ता खोजने पर मजबूर कर दिया है। अब कई परिवार भेड़ और बकरी पालन के जरिए अपने घर का खर्च चला रहे हैं। आखिर कैसे बदल रही है यह पहल गांव की तस्वीर।

Post Published By: Nidhi Kushwaha
Updated : 19 June 2026, 3:02 PM IST
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Etawah: एक समय था जब गांवों की पूरी अर्थव्यवस्था खेती पर टिकी होती थी, लेकिन अब बदलते मौसम, बढ़ती लागत और घटते मुनाफे ने किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। ऐसे में सैफई तहसील के गींजा गांव के कई परिवारों ने अपनी आय बढ़ाने के लिए पशुपालन का रास्ता चुना है। खासकर भेड़ और बकरी पालन यहां लोगों के लिए अतिरिक्त नहीं, बल्कि जरूरी कमाई का साधन बनता जा रहा है।

खेती के साथ पशुपालन बना मजबूरी

गींजा गांव के चरवाहे मनोज बताते हैं कि केवल खेती के भरोसे परिवार का खर्च चलाना आसान नहीं रह गया है। मौसम की मार और फसल की अनिश्चितता के कारण किसानों को कई बार नुकसान उठाना पड़ता है। ऐसे में पशुपालन उन्हें आर्थिक सहारा देता है। मनोज के अनुसार, गांव के कई परिवार खेती के साथ-साथ भेड़ पालन भी कर रहे हैं। इससे सालभर कुछ न कुछ आय होती रहती है और जरूरत के समय पशुओं की बिक्री से आर्थिक मदद मिल जाती है।

बीमारियां बनी सबसे बड़ी चुनौती

हालांकि भेड़ पालन से आमदनी होती है, लेकिन इसके सामने कई समस्याएं भी हैं। मनोज बताते हैं कि पशुओं में होने वाली बीमारियां पशुपालकों के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय हैं। अगर समय पर इलाज न मिले तो नुकसान काफी बढ़ सकता है। उन्होंने कहा कि पशुओं की देखभाल में काफी मेहनत लगती है। सुबह से लेकर रात तक उनकी निगरानी करनी पड़ती है। चारा, पानी और स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना होता है। यही कारण है कि यह काम जितना लाभदायक दिखता है, उतना ही मेहनत भरा भी है।

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ऊन से नहीं, बिक्री से होती है कमाई

मनोज बताते हैं कि भेड़ों से मुख्य रूप से मांस का व्यवसायिक उपयोग होता है। उनके दूध का गांव में कोई खास उपयोग नहीं होता और ऊन को भी बाजार में अच्छी कीमत नहीं मिल पाती। ऐसे में पशुपालकों की आय का सबसे बड़ा स्रोत भेड़ों की बिक्री ही है। जब भेड़ें बड़ी हो जाती हैं तो उन्हें बाजार में बेचकर अच्छी रकम मिल जाती है, जिससे परिवार की आर्थिक जरूरतें पूरी होती हैं।

सालाना डेढ़ लाख रुपये तक की आमदनी

मनोज के मुताबिक भेड़ पालन से उन्हें हर साल करीब 1.25 लाख से 1.50 लाख रुपये तक की अतिरिक्त आय हो जाती है। यह रकम खेती से होने वाली कमाई के साथ जुड़कर परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने में मदद करती है। गांव के अन्य लोगों का भी मानना है कि पशुपालन ने कई परिवारों को आर्थिक रूप से संभालने में बड़ी भूमिका निभाई है।

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सरकारी मदद मिले तो बदल सकती है तस्वीर

ग्रामीणों का कहना है कि अगर पशुपालकों को बेहतर पशु चिकित्सा सुविधाएं, ऊन के लिए उचित बाजार और सरकारी योजनाओं का लाभ आसानी से मिले तो भेड़ पालन और अधिक लाभदायक हो सकता है। उनका मानना है कि गांवों में पशुपालन को बढ़ावा देकर न सिर्फ किसानों की आय बढ़ाई जा सकती है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई मजबूती दी जा सकती है।

Location :  Etawah

Published :  19 June 2026, 3:02 PM IST

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