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फूलन देवी की कहानी आज भी क्यों है चर्चा में? (IMG: Dynamite News)
Lucknow: चंबल के बीहड़ों में कभी बंदूक की आवाज सिर्फ अपराध की खबर नहीं होती थी, बल्कि उसका असर सत्ता के गलियारों तक दिखाई देता था। 1980 के दशक की शुरुआत में उत्तर प्रदेश में डकैती और कानून-व्यवस्था बड़ा मुद्दा बन चुके थे। तत्कालीन मुख्यमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने डाकुओं के खिलाफ अभियान चलाया, लेकिन इसी दौर में बेहमई हत्याकांड और फिर उनके बड़े भाई जस्टिस चंद्रशेखर प्रताप सिंह की डकैतों द्वारा हत्या ने सरकार पर भारी राजनीतिक दबाव बनाया। आखिरकार 28 जून 1982 को वीपी सिंह ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।
इसी उथल-पुथल भरे दौर में एक ऐसा नाम भी सामने आया, जिसने आगे चलकर चंबल की कहानी को अपराध से राजनीति तक पहुंचा दिया। यह नाम था फूलन देवी। एक गरीब परिवार में जन्मी लड़की, कम उम्र में शादी, घरेलू हिंसा और बाद में डकैत गिरोह से जुड़ने की कहानी ने उन्हें देश की सबसे चर्चित शख्सियतों में ला दिया। हालांकि उनकी जिंदगी से जुड़े कई विवरण अलग-अलग स्रोतों में अलग तरह से दर्ज हैं, इसलिए उनकी कहानी में तथ्य और बाद में बनी किंवदंतियों के बीच अंतर करना जरूरी है।
1980 के दशक की शुरुआत में उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में डकैतों की गतिविधियां सरकार के लिए बड़ी चुनौती थीं। वीपी सिंह ने मुख्यमंत्री बनने के बाद डाकुओं के खिलाफ अभियान तेज किया। पुलिस मुठभेड़ों और डकैतियों की खबरें लगातार सुर्खियों में आती थीं।
14 फरवरी 1981 को कानपुर के पास बेहमई गांव में फूलन देवी से जुड़े गिरोह द्वारा 20 लोगों की हत्या की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया। इस घटना को लेकर विधानसभा में भी सरकार से सवाल पूछे गए और विपक्ष की ओर से मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग तक हुई।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। 20 मार्च 1982 को वीपी सिंह के बड़े भाई और इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस चंद्रशेखर प्रताप सिंह की डकैतों ने हत्या कर दी। इस घटना ने मुख्यमंत्री के सामने व्यक्तिगत और राजनीतिक दोनों तरह का संकट खड़ा कर दिया। इसके कुछ समय बाद वीपी सिंह ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।
फूलन देवी का जन्म 10 अगस्त 1963 को उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के घूरा का पुरवा गांव में हुआ था। उनका परिवार आर्थिक रूप से कमजोर था। बचपन से ही जमीन और पारिवारिक विवादों से उनका सामना हुआ। उनकी शादी भी कम उम्र में कर दी गई थी। उनकी जिंदगी के शुरुआती वर्षों को लेकर कई विवरण उनकी आत्मकथा, पत्रकारों की रिपोर्टों और बाद की जीवनियों में मिलते हैं। इन विवरणों में कम उम्र में विवाह, पति से खराब संबंध, पुलिस कार्रवाई और बाद में डकैत गिरोह से जुड़ने की घटनाएं शामिल हैं। हालांकि, इन घटनाओं के कई पहलुओं पर अलग-अलग समय में अलग-अलग दावे सामने आए हैं।
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फूलन देवी बाद में चंबल और बुंदेलखंड क्षेत्र में सक्रिय एक डकैत गिरोह से जुड़ीं। उनके साथ विक्रम मल्लाह का नाम भी जुड़ा। मीडिया रिपोर्टों और उपलब्ध विवरणों के अनुसार, विक्रम की मौत के बाद फूलन देवी गिरोह के प्रमुख चेहरों में शामिल हो गईं। इसके बाद उनकी पहचान एक महिला डकैत के रूप में तेजी से फैलने लगी। उनके नाम के साथ कई घटनाएं जुड़ीं और पुलिस के लिए उन्हें पकड़ना बड़ी चुनौती बन गया। उनकी कहानी में बेहमई की घटना सबसे ज्यादा चर्चित रही।
14 फरवरी 1981 को बेहमई गांव में 20 लोगों की हत्या हुई। इस घटना में मारे गए लोगों में अधिकांश ठाकुर समुदाय से थे। घटना के बाद फूलन देवी और उनके गिरोह का नाम सामने आया। यही घटना आगे चलकर उनकी पहचान का सबसे विवादित और चर्चित हिस्सा बनी। फूलन देवी के जीवन पर लिखी गई किताबों और प्रकाशित रिपोर्टों में बेहमई की घटना की पृष्ठभूमि को उनके साथ हुए कथित यौन उत्पीड़न और गिरोह के भीतर हुए संघर्षों से जोड़कर बताया गया है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के अलग-अलग विवरण मौजूद हैं, इसलिए इसे एक निर्विवाद व्यक्तिगत कथा के तौर पर पेश करना उचित नहीं है।
पुलिस और सरकार की कोशिशों के बावजूद फूलन देवी लंबे समय तक गिरफ्त से बाहर रहीं। आखिरकार फरवरी 1983 में उन्होंने मध्य प्रदेश के भिंड में सार्वजनिक रूप से आत्मसमर्पण किया। उस समय बड़ी संख्या में लोग इस कार्यक्रम को देखने पहुंचे थे। फूलन देवी ने मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के सामने हथियार रखे। उनका आत्मसमर्पण चंबल के डकैत इतिहास में एक बड़ा घटनाक्रम माना गया। इसके बाद उन्होंने करीब 11 साल जेल में बिताए। 1994 में उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुलायम सिंह यादव सरकार के दौरान उनकी रिहाई हुई।
जेल से बाहर आने के बाद फूलन देवी की जिंदगी ने ऐसा मोड़ लिया जिसकी कल्पना शायद चंबल के बीहड़ों में उनके शुरुआती दिनों में किसी ने नहीं की होगी। वह राजनीति में आईं और 1996 में उत्तर प्रदेश की मिर्जापुर लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर संसद पहुंचीं। 1998 में वह चुनाव हार गईं, लेकिन 1999 में दोबारा मिर्जापुर से लोकसभा पहुंचीं। यानी जिस महिला का नाम कभी चंबल के डकैतों और पुलिस अभियान के साथ जोड़ा जाता था, वही आगे चलकर देश की संसद में बैठी। इसी वजह से फूलन देवी की जिंदगी भारतीय राजनीति और अपराध के इतिहास में एक असाधारण और विवादित अध्याय बन गई।
फूलन देवी की कहानी सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रही। उनके जीवन पर पत्रकार और लेखिका माला सेन की किताब India's Bandit Queen प्रकाशित हुई। इसके बाद निर्देशक शेखर कपूर ने 1994 में Bandit Queen फिल्म बनाई, जिसमें सीमा बिस्वास ने फूलन देवी की भूमिका निभाई। फूलन देवी ने फिल्म के कुछ हिस्सों और अपने चित्रण पर आपत्ति जताई थी। उस समय उन्होंने सार्वजनिक रूप से फिल्म की प्रस्तुति पर सवाल उठाए थे। यानी उनकी कहानी के फिल्मी रूपांतरण को लेकर भी विवाद रहा।
25 जुलाई 2001 को फूलन देवी की नई दिल्ली स्थित आवास के बाहर गोली मारकर हत्या कर दी गई। उस समय वह मिर्जापुर से समाजवादी पार्टी की सांसद थीं। हत्या के मामले में शेर सिंह राणा को गिरफ्तार किया गया। 2014 में दिल्ली की अदालत ने राणा को हत्या और साजिश के मामले में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई, जबकि मामले में 10 अन्य आरोपियों को बरी कर दिया गया। फूलन देवी की जिंदगी इसलिए भी चर्चा में रही क्योंकि इसमें अपराध, सामाजिक संघर्ष, जातिगत तनाव, पुलिस कार्रवाई, जेल, आत्मसमर्पण और फिर लोकतांत्रिक राजनीति इन सभी की परतें एक साथ दिखाई देती हैं।
Location : Lucknow
Published : 18 September 2026, 1:18 PM IST