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आजादी के ये गुमनाम प्रहरी
Balrampur: जब पंद्रह अगस्त की सुबह देश के महानगरों और जिला मुख्यालयों में लाउडस्पीकरों पर देशभक्ति के तराने गूंज रहे होते हैं, ठीक उसी वक्त उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले के आखिरी छोर पर बसे थारू आदिवासियों के गांवों में एक अलग तरह का सन्नाटा होता है। मिट्टी, घास-फूस और गाय के गोबर से लीपे गए अपने रंग-बिरंगे बरामदों से बाहर निकलकर, कुछ जोड़ी आंखें चुपचाप नेपाल सीमा की उस पगडंडी को निहारती हैं जहां न कोई कंक्रीट की ऊंची दीवार है और न ही कोई लोहे की कड़क तारबंदी।
इन सुदूर तराई के जंगलों में रहने वाली थारू जनजाति बिना किसी शोर-शराबे, रैलियों और सोशल मीडिया की पब्लिसिटी के, पीढ़ियों से भारत-नेपाल के इस ओपन बॉर्डर यानी खुली सीमा की सबसे मजबूत अदृश्य सुरक्षा दीवार बनी हुई है।
थारू समुदाय के इतिहास की जड़ें बेहद गौरवशाली हैं। स्थानीय बुजुर्गों की मौखिक परंपराओं और लोककथाओं को खंगालें, तो थारू समुदाय खुद को महाराणा प्रताप की उस फौज का हिस्सा मानता है जो सदियों पहले हल्दीघाटी के ऐतिहासिक युद्ध के बाद हिमालय की तलहटी में आकर बस गई थी। यही कारण है कि इस समुदाय की रगों में राष्ट्रवाद कोई थोपी गई विचारधारा नहीं, बल्कि उनकी जीवनशैली और सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा है।
देश के आजादी के आंदोलन के समय भी, जब मैदानी इलाकों में फिरंगियों के खिलाफ विद्रोह भड़क रहा था, तब इस दुर्गम तराई क्षेत्र के थारू युवाओं ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जंगलों में छिपे रहने वाले क्रांतिकारियों को सुरक्षित पनाह दी थी और उन तक गुप्त रूप से रसद पहुंचाई थी। अंग्रेजों की बंदूकें और आधुनिक सेना इस घने जंगल को पार नहीं कर पाती थीं, क्योंकि इस पूरे जंगल का चप्पा-चप्पा थारू आदिवासियों का एक अभेद्य सुरक्षा कवच था।
आज के इस आधुनिक दौर में जब सीमा पार से घुसपैठ, अवैध तस्करी और असामाजिक तत्वों का खतरा हमेशा बना रहता है, तब एसएसबी के जवानों के लिए ये आदिवासी सबसे बड़े लोकल इंटेलिजेंस का काम करते हैं। जंगल के रास्तों से गुजरने वाले किसी भी अनजान चेहरे या अजनबी आहट को थारू आदिवासी पल भर में पहचान लेते हैं।
पचपेड़वा और गैसड़ी ब्लॉक के सीमावर्ती गांवों के स्थानीय निवासी बड़े गर्व से कहते हैं कि जंगल में कौन सा नया पत्ता हिला है और कौन सा नया पैर आया है, यह हमारी महिलाओं और मवेशी चराने वाले चरवाहों को सबसे पहले पता चल जाता है।
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हालांकि, वतनपरस्ती की इस अटूट दास्तान के पीछे एक दुश्वारियों भरी जिंदगी भी सांस ले रही है। आजादी के दशकों बीत जाने के बाद भी यहां के वन-ग्राम बुनियादी जरूरतों की जंग लड़ रहे हैं। हर साल मानसून में उफनते पहाड़ी नाले और राप्ती की बाढ़ इन बस्तियों को बाकी दुनिया से पूरी तरह काट देती है।
इमलीडीह में थारू संस्कृति को सहेजने के लिए बना संग्रहालय बेशक एक अच्छी कोशिश है, लेकिन स्थानीय युवाओं के सामने रोजगार, इलाज और पढ़ाई की राह आज भी नेपाल सीमा की पथरीली पगडंडियों जैसी ही कठिन बनी हुई है। देश के आखिरी छोर पर खड़े ये नागरिक बिना किसी सरकारी तमगे के आज भी साबित कर रहे हैं कि मुल्क सिर्फ नक्शों में नहीं, बल्कि सरहद पर बसने वाले दिलों में धड़कता है।
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बलरामपुर के इन सुदूर वन-ग्रामों में थारू महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले पारंपरिक लोकगीतों में देश की मिट्टी की जो असली महक और वफादारी है, उसे मुख्यधारा के अखबारों के पहले पन्ने पर जगह मिलना अभी बाकी है। बिना किसी सरकारी वेतन, बिना किसी राष्ट्रीय मेडल और बिना किसी खाकी वर्दी के, देश की भौगोलिक सीमा पर राष्ट्रवाद का यह अनवरत पहरा हमें याद दिलाता है कि भारत सिर्फ कागजी नक्शों पर नहीं, बल्कि अपनी आखिरी सीमा पर रहने वाले इन सच्चे और वफादार नागरिकों के दिलों में धड़कता है।
Location : Balrampur
Published : 15 August 2026, 4:22 AM IST