तारों की छांव, ‘नो-मैन लैंड’ का सन्नाटा और हाथ में तिरंगा, जश्ने आजादी पर हर बार गुम नाम रहते है सीमा के गुप्त पहरेदार
पंद्रह अगस्त की सुबह जब पूरा देश लाउडस्पीकरों से गूंजते देशभक्ति के तरानों में सराबोर होता है, ठीक उसी वक्त नेपाल सीमा से सटे बलरामपुर के आख़िरी छोर पर बसे थारू बाहुल्य गांवों में एक अलग ही खामोशी तैर रही होती है। मिट्टी से पुते, रंग-बिरंगे बरामदों से बाहर निकलकर निहारती आंखें उस पगडंडी को देखती हैं, जहाँ न तो कोई कंक्रीट की ऊंची दीवारें हैं और न ही लोहे की कंटीली तारें।