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इलाहाबाद हाई कोर्ट(Source: Google)
Prayagraj: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बच्चों के संरक्षण और कस्टडी को लेकर एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेन्द्र की खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि एक पिता, भले ही वह नैसर्गिक संरक्षक (Natural Guardian) हो, अपनी मर्जी से नाबालिग बच्चों की अभिरक्षा किसी अन्य व्यक्ति को नहीं सौंप सकता। अदालत ने जोर देकर कहा कि बच्चों की कस्टडी का हस्तांतरण कानून और नैतिकता के सिद्धांतों के विपरीत है।
यह मामला प्रयागराज के नाबालिग बच्चों,युवराज और आयुष्मान की ओर से दाखिल एक विशेष अपील पर आया है। इससे पहले हाई कोर्ट की एकलपीठ ने एक याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि पिता को अपने बच्चों की अभिरक्षा 'किसी भी व्यक्ति' को देने का पूर्ण अधिकार है। खंडपीठ ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि पिता का यह अधिकार असीमित नहीं है और इसे चुनौती दी जा सकती है।
मामले के अनुसार, बच्चों के पिता ने उनकी मां को अभिरक्षा देने के बजाय बच्चों को किसी तीसरे पक्ष को सौंप दिया था। इसे 'अवैध निरुद्धि' (Illegal Detention) मानते हुए बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका दायर की गई थी। अब खंडपीठ ने अपील स्वीकार करते हुए मामले को फिर से सुनवाई के लिए रखा है। कोर्ट ने साफ किया कि बच्चों का कल्याण सर्वोपरि है और कस्टडी के अधिकार का मनमाना हस्तांतरण नहीं किया जा सकता।
Location : Prayagraj
Published : 30 April 2026, 6:35 AM IST
Topics : Allahabad High Court Father Guardianship Rights Habeas Corpus Petition Justice Arun Bhansali Minor Child Custody