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परिसीमन और जनगणना से जुड़े तीन बड़े विधेयकों पर चर्चा (फोटो सोर्स- डाइनामाइट न्यूज़)
New Delhi: आज का विषय सिर्फ एक कानून या एक बिल नहीं है… आज हम बात कर रहे हैं उस बदलाव की, जो आने वाले समय में भारत की राजनीति, प्रतिनिधित्व और लोकतंत्र की पूरी तस्वीर बदल सकता है। सवाल सीधा है- क्या 2029 के बाद भारत का चुनावी नक्शा पूरी तरह बदल जाएगा? क्या संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी सच में 33 प्रतिशत तक पहुँच पाएगी? और सबसे बड़ा सवाल- इस बदलाव के पीछे की सच्चाई क्या है?
वरिष्ठ पत्रकार मनोज टिबड़ेवाल आकाश ने अपने चर्चित शो The MTA Speaks में 2029 के चुनाव से पहले महिला आरक्षण, परिसीमन और जनगणना को लेकर सटीक विश्लेषण किया।
दरअसल, केंद्र सरकार ने संसद का तीन दिन के लिए एक विशेष सत्र बुलाया है… यह सत्र 16, 17 और 18 अप्रैल को होगा और इस सत्र में तीन बेहद महत्वपूर्ण विधेयक पेश किए जाने की तैयारी है। पहला- संविधान संशोधन से जुड़ा विधेयक, दूसरा- नया परिसीमन कानून 2026, और तीसरा- जनगणना से संबंधित कानून। पहली नजर में ये तीनों बिल अलग-अलग लग सकते हैं… लेकिन असल में ये तीनों मिलकर एक बड़े बदलाव की नींव रख रहे हैं। सरकार का स्पष्ट लक्ष्य है- 2029 के लोकसभा चुनाव तक देश की संसद और सभी विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देना। लेकिन यह इतना आसान नहीं है। इसके लिए सिर्फ कानून पास करना ही काफी नहीं है… इसके लिए पूरे देश की सीटों का गणित बदलना होगा, सीमाएं बदलनी होंगी, और राजनीतिक संतुलन को नए सिरे से तय करना होगा।
यहीं से शुरू होती है असली कहानी- परिसीमन की। परिसीमन यानी क्या? सरल भाषा में समझें तो लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से तय करना और सीटों का पुनर्वितरण करना। आज जो 543 लोकसभा सीटें हैं, वे 1971 की जनगणना के आधार पर तय हुई थीं। तब से देश की जनसंख्या में भारी बदलाव आया है। कुछ राज्यों में जनसंख्या तेजी से बढ़ी है, तो कुछ राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता हासिल की है। अब सरकार की योजना है कि इन बदलते आंकड़ों के आधार पर सीटों की संख्या को बढ़ाया जाए। और यही वजह है कि चर्चा हो रही है कि लोकसभा की सीटें 543 से बढ़कर 850 तक जा सकती हैं। अगर ऐसा होता है, तो यह भारत के संसदीय इतिहास का सबसे बड़ा बदलाव होगा।
लेकिन सवाल उठता है- सीटें बढ़ाने की जरूरत क्यों पड़ी? जवाब साफ है- प्रतिनिधित्व का संतुलन। आज कई ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ जनसंख्या बहुत ज्यादा है, लेकिन प्रतिनिधित्व कम है। वहीं कुछ जगहों पर जनसंख्या कम होने के बावजूद सीटें ज्यादा हैं। इस असंतुलन को खत्म करने के लिए परिसीमन जरूरी माना जा रहा है।
अब आते हैं महिला आरक्षण पर। सरकार कह रही है कि महिलाओं को उनका हक अब और नहीं टाला जा सकता। प्रधानमंत्री ने खुद इस पर जोर दिया है कि 2029 तक यह व्यवस्था लागू हो जाएगी। लेकिन इसके लिए जो प्रक्रिया तय की गई है, वह लंबी और जटिल है। पहला कदम होगा- नई जनगणना। दूसरा- उस जनगणना के आधार पर परिसीमन। और तीसरा- नई सीटों पर आरक्षण का लागू होना। यानी साफ है कि बिना जनगणना और परिसीमन के महिला आरक्षण लागू नहीं हो सकता।
अब बात करते हैं कि इससे क्या बदलेगा। सबसे बड़ा बदलाव होगा- सीटों की संख्या में वृद्धि। लोकसभा की सीटें बढ़ेंगी, विधानसभाओं की सीटें भी बढ़ेंगी। इसके साथ ही सीटों का नया बंटवारा होगा। SC और ST सीटों में भी महिलाओं का हिस्सा तय किया जाएगा। लेकिन यह सिर्फ संख्या का खेल नहीं है… यह राजनीति का भी खेल है।
अब इस पूरी व्यवस्था का एक और अहम और संवेदनशील पहलू समझिए- महिला आरक्षण के इस पूरे मुद्दे में एक बड़ा और संवेदनशील पहलू OBC महिलाओं के प्रतिनिधित्व का है, जिस पर Samajwadi Party सहित कई दल सवाल उठा रहे हैं कि अगर 33% आरक्षण दिया जा रहा है तो उसमें OBC महिलाओं के लिए अलग कोटा क्यों नहीं है, और यही आगे चलकर बड़ा राजनीतिक विवाद बन सकता है; वहीं इस व्यवस्था का Rotation System जमीनी राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकता है, क्योंकि हर चुनाव में आरक्षित सीटें बदलने से मौजूदा नेताओं की पारंपरिक सीटें खत्म हो सकती हैं और राजनीतिक स्थिरता प्रभावित हो सकती है।
परिसीमन के साथ ही देश का राजनीतिक संतुलन बदल सकता है। खासकर उत्तर और दक्षिण भारत के बीच। जबकि उत्तर और दक्षिण भारत के बीच सीटों के पुनर्वितरण को लेकर भी गहरी चिंता है, क्योंकि नई जनगणना के आधार पर उत्तर भारत के अधिक जनसंख्या वाले राज्यों- जैसे यूपी और बिहार- को ज्यादा सीटें मिल सकती हैं, जिससे दक्षिण भारत का संसद में अनुपात घट सकता है, हालांकि उनकी कुल सीटें कम नहीं होंगी बल्कि प्रतिशत कम हो सकता है। दक्षिण भारत के कई राज्यों में यह मुद्दा राजनीतिक रूप से गरमाया हुआ है। उनका कहना है कि जो राज्य जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे, उन्हें सजा क्यों मिले? और जो राज्य इसमें पीछे रहे, उन्हें ज्यादा सीटें क्यों मिलें? यानी यह सिर्फ महिला आरक्षण का मुद्दा नहीं है… यह संघीय ढांचे, क्षेत्रीय संतुलन और राजनीतिक शक्ति के पुनर्वितरण का मुद्दा भी है।
अब सवाल उठता है- परिसीमन करेगा कौन? इसके लिए एक परिसीमन आयोग बनाया जाएगा। आमतौर पर इसमें सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज को अध्यक्ष बनाया जाता है। चुनाव आयोग और राज्यों के प्रतिनिधि भी इसमें शामिल होते हैं। यह आयोग जनगणना के आंकड़ों के आधार पर नई सीमाएं तय करता है। लेकिन यह प्रक्रिया इतनी आसान नहीं होती। इसमें समय लगता है… विवाद होते हैं… राजनीतिक दबाव भी होता है। पिछली बार परिसीमन 2002 में हुआ था, और उस समय भी कई राज्यों में असंतोष देखने को मिला था। इस बार तो दांव और भी बड़ा है।
अनुमान है कि पूरी प्रक्रिया में 2 से 3 साल का समय लग सकता है। अगर 2026 के बाद जनगणना होती है, तो परिसीमन 2028 तक पूरा हो सकता है… और फिर 2029 के चुनाव में नया सिस्टम लागू किया जा सकता है।
अब बात करते हैं बिल पास होने की। यह कोई साधारण कानून नहीं है… यह संविधान संशोधन है। इसके लिए लोकसभा और राज्यसभा दोनों में बहुमत चाहिए। साथ ही देश के आधे राज्यों की मंजूरी भी जरूरी होगी। यानी राजनीतिक सहमति के बिना यह संभव नहीं है। और यहीं पर विपक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
विपक्ष का कहना है कि सरकार इस मुद्दे को राजनीतिक तरीके से पेश कर रही है। उनका आरोप है कि महिला आरक्षण पहले भी लागू किया जा सकता था, लेकिन इसे जानबूझकर टाला गया। इस पूरे मुद्दे पर Sonia Gandhi ने महिला आरक्षण का समर्थन करते हुए यह सवाल उठाया है कि इसे तुरंत लागू करने के बजाय जनगणना और परिसीमन से क्यों जोड़ा गया, क्या यह एक तरह से देरी करने की रणनीति है। दूसरी तरफ सरकार का तर्क है कि बिना परिसीमन के आरक्षण लागू करना व्यावहारिक नहीं है।
अब एक नजर आंकड़ों पर डालते हैं। आज लोकसभा में 74 महिला सांसद हैं… जो कुल संख्या का करीब 13.6 प्रतिशत है। यानी 33 प्रतिशत के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना है। राज्यों की बात करें तो स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है। कई विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी 10 प्रतिशत से भी कम है। अगर नया सिस्टम लागू होता है, तो राजस्थान जैसे राज्य में महिलाओं को 80 से ज्यादा सीटें मिल सकती हैं। यानी प्रतिनिधित्व में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
लेकिन क्या सिर्फ आरक्षण से महिलाओं की स्थिति बदल जाएगी? यह भी एक बड़ा सवाल है। क्योंकि राजनीति में भागीदारी सिर्फ सीट मिलने से नहीं बढ़ती… इसके लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सशक्तिकरण भी जरूरी है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि आरक्षण एक शुरुआत हो सकता है, लेकिन असली बदलाव तभी आएगा जब महिलाओं को राजनीतिक प्रशिक्षण, संसाधन और अवसर भी मिलेंगे।
अब इस पूरे मुद्दे का एक और महत्वपूर्ण लेकिन कम चर्चित पहलू- राजनीतिक विश्लेषण यह भी संकेत देता है कि 2029 के चुनाव को देखते हुए यह कदम भाजपा के लिए रणनीतिक रूप से फायदेमंद हो सकता है, क्योंकि सीटों में बढ़ोतरी से हिंदी पट्टी के राज्यों का प्रभाव बढ़ेगा और महिला वोटर बेस को मजबूत करने का अवसर मिलेगा, जिसे पहले से सरकारी योजनाओं के जरिए साधा जा रहा है; इसके साथ ही एक महत्वपूर्ण लेकिन कम चर्चित पहलू इसका आर्थिक और प्रशासनिक असर है, क्योंकि अगर लोकसभा की सीटें 850 तक जाती हैं तो संसद की संरचना, सांसदों के वेतन-भत्ते, चुनावी खर्च और प्रशासनिक ढांचे पर बड़ा अतिरिक्त बोझ पड़ेगा, जिसका सीधा असर अंततः टैक्सपेयर्स पर ही आएगा-यानी यह फैसला सिर्फ सामाजिक और राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है।
इस पूरे मुद्दे पर दक्षिण भारत के नेताओं और कांग्रेस का रुख काफी स्पष्ट, लेकिन रणनीतिक रूप से अलग-अलग परतों में सामने आता है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री M. K. Stalin ने सबसे तीखा और मुखर विरोध दर्ज किया है। उनका कहना है कि महिला आरक्षण के नाम पर परिसीमन को जोड़ना दक्षिण भारत के साथ अन्याय हो सकता है, क्योंकि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर काम किया है, उन्हें सीटों के अनुपात में नुकसान झेलना पड़ सकता है। स्टालिन का सीधा आरोप है कि यह प्रक्रिया “संघीय ढांचे के खिलाफ” जा सकती है और दक्षिण के राज्यों की राजनीतिक ताकत को कम कर सकती है।
तेलंगाना के मुख्यमंत्री Revanth Reddy का रुख भी इसी लाइन पर है, लेकिन थोड़ा संतुलित है। वे महिला आरक्षण के समर्थक हैं, लेकिन परिसीमन को लेकर उन्होंने चिंता जताई है कि अगर सिर्फ जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण हुआ, तो दक्षिण भारत के साथ असंतुलन पैदा होगा। उनका कहना है कि विकास, कर योगदान और प्रशासनिक प्रदर्शन जैसे फैक्टर्स को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए, न कि केवल जनसंख्या को।
वहीं Indian National Congress का आधिकारिक रुख “समर्थन के साथ सवाल” वाला है। कांग्रेस महिला आरक्षण का सिद्धांत रूप से समर्थन करती है, लेकिन यह लगातार सवाल उठा रही है कि इसे जनगणना और परिसीमन से क्यों जोड़ा गया। पार्टी का तर्क है कि सरकार इसे तुरंत लागू कर सकती थी, लेकिन इसे 2029 तक टालकर एक तरह से “राजनीतिक वादा” बना दिया गया है। साथ ही कांग्रेस यह भी मांग कर रही है कि इस आरक्षण में OBC महिलाओं के लिए अलग प्रावधान होना चाहिए, ताकि सामाजिक न्याय का संतुलन बना रहे।
कुल मिलाकर, स्टालिन जहां इसे दक्षिण बनाम उत्तर के नजरिए से देख रहे हैं, रेवंत रेड्डी इसे संतुलन और न्याय के मुद्दे के रूप में उठा रहे हैं, और कांग्रेस इसे समर्थन के साथ-साथ सरकार की नीयत और टाइमिंग पर सवाल खड़ा करने के रूप में पेश कर रही है।
अब अंत में सबसे बड़ा सवाल- क्या यह बदलाव सच में होगा? इतिहास बताता है कि ऐसे बड़े सुधारों में समय लगता है… राजनीतिक सहमति बनाना आसान नहीं होता… और कई बार योजनाएं कागजों तक ही सीमित रह जाती हैं। लेकिन अगर यह योजना सफल होती है, तो यह भारत के लोकतंत्र में एक ऐतिहासिक बदलाव होगा। एक ऐसा बदलाव, जिसमें संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की आवाज पहले से कहीं ज्यादा मजबूत होगी… एक ऐसा बदलाव, जो
राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह बदल सकता है… और एक ऐसा बदलाव, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए नई दिशा तय करेगा। तो कुल मिलाकर… महिला आरक्षण सिर्फ एक कानून नहीं है… यह भारत के राजनीतिक भविष्य की नई पटकथा है।
Location : New Delhi
Published : 16 April 2026, 1:01 PM IST