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सुप्रीम कोर्ट में बढ़ेगी जजों की संख्या (फोटो सोर्स- डाइनामाइट न्यूज़)
New Delhi: प्रधानमंत्री Narendra Modi की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय कैबिनेट बैठक में सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। अब संसद में 'द सुप्रीम कोर्ट नंबर ऑफ जजेज अमेंडमेंट बिल 2026' लाया जाएगा, जिसके जरिए सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 की जाएगी और अगर मुख्य न्यायाधीश को भी जोड़ दें, तो देश की सर्वोच्च अदालत में कुल जजों की संख्या 38 हो जाएगी। केन्द्र सरकार का कहना है कि बढ़ते मामलों के बोझ और लंबित मुकदमों को देखते हुए यह फैसला बेहद जरूरी था। लेकिन इस फैसले ने एक बार फिर देश में न्याय व्यवस्था, अदालतों पर बढ़ते दबाव और न्याय में देरी को लेकर बड़ी बहस छेड़ दी है।
वरिष्ठ पत्रकार मनोज टिबड़ेवाल आकाश ने अपने चर्चित शो The MTA Speaks में, सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने के प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के मामले पर इसका सटीक विश्लेषण किया।
आज के इस विशेष विश्लेषण में हम आपको बताएंगे कि आखिर भारत के सुप्रीम कोर्ट की शुरुआत कैसे हुई? आज़ादी से पहले स्थिति क्या थी? आज़ादी के बाद कब-कब जजों की संख्या बढ़ाई गई? किस सरकार ने कितने जज बढ़ाए और आखिर क्यों हर कुछ वर्षों में देश को सुप्रीम कोर्ट का विस्तार करना पड़ता है?
अगर इतिहास के पन्ने पलटें तो भारत में सर्वोच्च न्यायालय की अवधारणा ब्रिटिश शासन के दौरान विकसित हुई थी। अंग्रेजों के दौर में भारत की अदालतों के ऊपर अंतिम अधिकार लंदन की प्रिवी काउंसिल के पास होता था। भारतीय अदालतों के फैसलों के खिलाफ अंतिम अपील वहीं की जाती थी। लेकिन जैसे-जैसे भारत में संवैधानिक ढांचे की मांग बढ़ी, वैसे-वैसे एक केंद्रीय सर्वोच्च अदालत की जरूरत महसूस होने लगी।
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1935 के भारत सरकार अधिनियम के तहत भारत में फेडरल कोर्ट की स्थापना का रास्ता खुला और 1937 में फेडरल Court of India अस्तित्व में आया। यही फेडरल कोर्ट आगे चलकर स्वतंत्र भारत के सुप्रीम कोर्ट की नींव बना। फिर आया आजादी के बाद 26 जनवरी 1950... भारत का संविधान लागू हुआ और उसी दिन भारत के सुप्रीम कोर्ट का औपचारिक गठन हुआ। संविधान के अनुच्छेद 124(1) में व्यवस्था की गई कि भारत में एक सुप्रीम कोर्ट होगा जिसमें एक मुख्य न्यायाधीश और संसद द्वारा तय संख्या के अन्य न्यायाधीश होंगे। शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट में सिर्फ मुख्य न्यायाधीश समेत कुल 8 जज थे। यानी एक चीफ जस्टिस और सात अन्य न्यायाधीश।
उस दौर में देश की आबादी कम थी मुकदमों की संख्या सीमित थी और न्यायिक व्यवस्था आज जितनी व्यापक नहीं थी। लेकिन धीरे-धीरे भारत बदलने लगा। लोकतंत्र मजबूत हुआ। लोगों में अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ी। नए कानून बने। राज्यों और केंद्र के बीच विवाद बढ़े। आर्थिक, सामाजिक और संवैधानिक मामलों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी। और इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट पर दबाव भी बढ़ने लगा। इसी दबाव को देखते हुए 1956 में संसद ने “द सुप्रीम कोर्ट नंबर ऑफ जजेज एक्ट 1956” पारित किया।
इस कानून के जरिए सुप्रीम कोर्ट में जजों की अधिकतम संख्या बढ़ाई गई। उस समय मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर अन्य जजों की संख्या 10 तय की गई। लेकिन कुछ ही वर्षों में यह संख्या भी कम पड़ने लगी। इसलिए 1960 में संशोधन किया गया और जजों की संख्या 10 से बढ़ाकर 13 कर दी गई। यह वह दौर था जब स्वतंत्र भारत में संवैधानिक व्यवस्था तेजी से विकसित हो रही थी। इसके बाद देश ने कई राजनीतिक और संवैधानिक उथल-पुथल देखी। 1975 में The Emergency in India लगा… न्यायपालिका की भूमिका पर सवाल उठे… और फिर आपातकाल के बाद न्यायपालिका को और मजबूत बनाने की मांग तेज हुई। 1977 में “सुप्रीम कोर्ट नंबर ऑफ जजेज अमेंडमेंट एक्ट” के जरिए जजों की संख्या 13 से बढ़ाकर 17 कर दी गई।
हालांकि एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि 1979 तक कैबिनेट ने सुप्रीम कोर्ट की कार्यकारी क्षमता को 15 जजों तक सीमित रखा था। बाद में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के अनुरोध पर यह प्रतिबंध हटा लिया गया। फिर आया 1986… भारत तेजी से बदल रहा था। अदालतों में लंबित मामलों का आंकड़ा बढ़ रहा था। तब एक और बड़ा संशोधन किया गया और सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 17 से बढ़ाकर 25 कर दी गई। इसके बाद 2008 में यूपीए सरकार के दौरान एक और संशोधन लाया गया। सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 25 से बढ़ाकर 30 कर दी गई। सरकार ने कहा कि लंबित मामलों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और न्यायपालिका पर बोझ कम करने के लिए यह जरूरी है।
फिर 2019 में Narendra Modi सरकार ने एक और कदम उठाया। संसद में संशोधन पारित हुआ और जजों की संख्या 30 से बढ़ाकर 33 कर दी गई। यानी मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर 33 जज… और कुल संख्या 34। अब 2026 में फिर एक नया संशोधन प्रस्तावित है। केंद्रीय कैबिनेट ने “द सुप्रीम कोर्ट नंबर ऑफ जजेज अमेंडमेंट बिल 2026” को मंजूरी दे दी है। इसके तहत मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर जजों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 की जाएगी। यानी कुल संख्या 38 हो जाएगी।
सरकार का तर्क साफ है… देश में मुकदमों का बोझ लगातार बढ़ रहा है। संवैधानिक पीठों की सुनवाई में देरी हो रही है। हजारों मामले वर्षों से लंबित हैं। ऐसे में अतिरिक्त जजों की नियुक्ति से सुप्रीम कोर्ट अधिक प्रभावी ढंग से काम कर सकेगा और लोगों को जल्दी न्याय मिल सकेगा। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि नए जजों के वेतन, स्टाफ और अन्य सुविधाओं पर होने वाला खर्च भारत की समेकित निधि यानी Consolidated Fund of India से पूरा किया जाएगा।
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लेकिन सवाल केवल संख्या का नहीं है। सवाल न्याय व्यवस्था की क्षमता का है। क्योंकि भारत में सिर्फ सुप्रीम कोर्ट ही नहीं बल्कि हाई कोर्ट और निचली अदालतों में भी करोड़ों मामले लंबित हैं। कई मामलों में लोगों की पूरी जिंदगी अदालतों के चक्कर लगाते हुए गुजर जाती है। विशेषज्ञ कहते हैं कि जजों की संख्या बढ़ाना जरूरी कदम जरूर है… लेकिन यह अकेला समाधान नहीं है। अदालतों में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, ई-कोर्ट व्यवस्था, समय पर नियुक्तियां, खाली पदों को भरना और प्रक्रियात्मक सुधार भी उतने ही जरूरी हैं।
आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। आबादी 140 करोड़ के पार है। नए प्रकार के कानूनी विवाद सामने आ रहे हैं। साइबर अपराध, डेटा प्राइवेसी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल ट्रांजैक्शन, चुनावी पारदर्शिता, पर्यावरण, धार्मिक विवाद… हर बड़ा मुद्दा अंततः सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचता है। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पहले से कहीं अधिक व्यापक हो चुकी है। आज सुप्रीम कोर्ट केवल कानून की व्याख्या नहीं करता… बल्कि कई बार देश की राजनीतिक और सामाजिक दिशा तय करने वाले ऐतिहासिक फैसले भी देता है। चाहे Kesavananda Bharati case में संविधान के बेसिक स्ट्रक्चर सिद्धांत की स्थापना हो… चाहे Ayodhya verdict हो… चाहे निजता के अधिकार पर ऐतिहासिक फैसला… या फिर धारा 377 और तीन तलाक जैसे मामलों पर निर्णय… सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर भारतीय लोकतंत्र की दिशा तय की है। लेकिन इन ऐतिहासिक फैसलों के पीछे एक सच्चाई यह भी है कि अदालत पर लगातार काम का बोझ बढ़ता गया। कई बार संवैधानिक पीठ के गठन में ही महीनों लग जाते हैं क्योंकि पर्याप्त जज उपलब्ध नहीं होते।
यही कारण है कि सरकारें समय-समय पर जजों की संख्या बढ़ाती रही हैं। लेकिन एक और महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि क्या भविष्य में भारत को सुप्रीम कोर्ट के क्षेत्रीय बेंचों की जरूरत पड़ेगी? क्या हर मामले को दिल्ली तक लाना जरूरी है? क्या आम आदमी को न्याय सुलभ बनाने के लिए संरचनात्मक बदलाव की जरूरत है? ये बहस आज भी जारी है। लेकिन कहानी सिर्फ जजों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है। असली सवाल है… क्या सुप्रीम कोर्ट पर बढ़ता बोझ अब न्यायपालिका के लिए चेतावनी बन चुका है? आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं। 2019 में जब सुप्रीम कोर्ट में लगभग 59 हजार मामले लंबित थे, तब सरकार ने जजों की संख्या 31 से बढ़ाकर 34 की थी। लेकिन उसके बाद भी लंबित मामलों का पहाड़ कम नहीं हुआ… बल्कि और बढ़ता चला गया। 2025 आते-आते सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या 90 हजार के पार पहुंच गई… और 2026 में यह आंकड़ा करीब 93 हजार तक पहुंच चुका है। यानी सिर्फ सात वर्षों में सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों में लगभग 56 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
यानी सवाल यह उठ रहा है कि क्या केवल जजों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त है… या फिर देश की पूरी न्यायिक संरचना को नए सिरे से देखने की जरूरत है? क्योंकि सिर्फ सुप्रीम कोर्ट ही नहीं… हाई कोर्ट और निचली अदालतों की स्थिति भी गंभीर है। देश के हाई कोर्ट्स में लगभग 30 प्रतिशत जजों के पद खाली पड़े हैं। करीब 334 पद रिक्त हैं। वहीं जिला अदालतों में 4700 से ज्यादा पद खाली हैं। और सबसे बड़ी बात… सुप्रीम कोर्ट खुद सरकार से और अधिक जजों की मांग कर चुका है। सूत्रों के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने 4 नहीं बल्कि 10 अतिरिक्त जजों की मांग की थी। यानी अदालत चाहती थी कि कुल संख्या 43 तक पहुंचे। इसके पीछे कारण भी बेहद दिलचस्प है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में 1200 से ज्यादा मामले तीन जजों की संविधान पीठ के सामने लंबित हैं। 160 से अधिक मामले पांच जजों की बेंच के इंतजार में हैं। सात जजों की बेंच के सामने दर्जनों मामले लंबित हैं… और नौ जजों की संवैधानिक पीठ के सामने भी लगभग 45 मामले वर्षों से फैसले का इंतजार कर रहे हैं।
यानी देश के सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक मामलों की सुनवाई तक लंबित होती जा रही है। और यहीं से शुरू होती है असली बहस…क्या भारत को अब केवल जज बढ़ाने से आगे जाकर न्यायपालिका का ढांचा बदलने की जरूरत है? क्या सुप्रीम कोर्ट की क्षेत्रीय बेंच बनाई जानी चाहिए? क्या अदालतों में दो शिफ्ट में काम होना चाहिए? क्या तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल न्यायिक प्रक्रिया में बढ़ाया जाना चाहिए? क्योंकि एक और बेहद अहम तथ्य यह है कि भारत में आज प्रति दस लाख आबादी पर केवल लगभग 22 जज हैं… जबकि 1987 में विधि आयोग ने यह संख्या 50 जज प्रति दस लाख आबादी करने की सिफारिश की थी। लेकिन लगभग चार दशक बाद भी भारत उस लक्ष्य के आधे तक भी नहीं पहुंच पाया है। यानी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में न्यायपालिका पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है… और यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने का फैसला केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं… बल्कि भारतीय न्याय व्यवस्था के सामने खड़े गहरे संकट का संकेत भी माना जा रहा है। आठ जजों से शुरू हुआ भारत के सुप्रीम कोर्ट का सफर अब 38 तक पहुंचने जा रहा है।
यह केवल संख्या का विस्तार नहीं… बल्कि उस बदलते भारत की कहानी है जहां लोकतंत्र मजबूत हुआ, नागरिक अधिकार बढ़े और न्यायपालिका की जिम्मेदारियां कई गुना बढ़ गईं। अब निगाहें संसद पर होंगी… जहां “सुप्रीम कोर्ट नंबर ऑफ जजेज अमेंडमेंट बिल 2026” पेश किया जाएगा। अगर यह पारित हो जाता है तो भारत के न्यायिक इतिहास में एक और नया अध्याय जुड़ जाएगा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल वही रहेगा… क्या आम आदमी को न्याय जल्दी मिलेगा? क्या अदालतों में लंबित मामलों का बोझ कम होगा? और क्या भारत की न्याय व्यवस्था आने वाले समय की चुनौतियों के लिए पूरी तरह तैयार है? इन सवालों के जवाब आने वाला समय देगा।
Location : New Delhi
Published : 9 May 2026, 10:24 AM IST