Opinion on Nizamuddin Markaz: इंसानियत के लिए खुद को फना करने से बड़ा कोई धर्म नहीं

इस समय वाकई मूसा और फकीर के चरित्र, ईमान और मानसिकता को समझे जाने की नितांत आवश्यकता है| आवश्यक नहीं कि नियमित इबादत/प्रार्थना करने वाला, सुबह-शाम पूजा/अर्चना करने वाला एवं दिन में 5 बार नमाज पढ़ने वाला व्यक्ति धर्म-धर्म चिल्लाते हुए नियमित रूप से धार्मिक स्थलों पर जाएगा तभी वह ईश्वर का दूत और खुदा का बंदा होगा| हो सकता है, सांसारिक मोहमाया से दूर दीन-हीन, फटे-हाल मांगकर खाने वाला फकीर-साधु ऊपर वाले के ज्यादा करीब हो| धर्म की रक्षा के लिए चिल्लाने और बरगलाने की आवश्यकता नहीं पड़ती है| मानवता और इंसानियत के लिए खुद को फना (कुर्बान) करने वाले से बड़ा धार्मिक कोई नहीं हो सकता|

Updated : 3 April 2020, 1:00 PM IST
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नई दिल्ली: ऐसी मान्यता है कि इस्लाम धर्म में 1 लाख 24 हजार पैगम्बर हुये हैं | कहा जाता है कि अल्लाह के पैगम्बरों में से मूसा नाम के पैगम्बर की अल्लाह से सीधी गुफ़्तगू होती थी| मूसा तूर नामक पहाड़ी पर रहता था और इस्लाम धर्म का प्रचार-प्रसार करता था| तूर पहाड़ी पर बसे गाँव में एक नान (रोटी) की दुकान थी, नानवाइ (रोटी बेचने वाली महिला) के कोई औलाद परवर-दीगार ने नहीं बख्शी थी| तमाम मज़ार-दरगाहों पर हाजिरी लगाने, पीर-काजी, मुल्ला-मौलवी और इमामों के कदमों में शीश झुकाने के बाद भी नानवाइ पर अल्लाह की रहमत नहीं हुई| दुखी नानवाइ ने एक दिन मूसा से गुजारिश की, हे, अल्लाह के बंदे! तुम्हारा तो खुदा से क़रीबी नाता है, अल्लाह से मेरे नसीब के बारे में तुम क्यों नहीं मालूमात करते हो, क्या मैं दुनिया से बे-औलाद ही रुखसत हो जाऊँगी?

मूसा धार्मिक था| धर्म की व्याख्या एक वाक्य में की जाए तो निर्विवाद सभी धर्मों का दर्शन है, ‘मानवता की रक्षा करना’| मूसा ने नानवाइ के नसीब में औलाद है या नहीं यह जानने के लिए अल्लाह से गुफ़्तगू की, मूसा ने देखा कि नानवाइ के नसीब में औलाद नहीं है| उसने खुदा से विनती की, कि वह नानवाइ को औलाद बख्शे जिस पर अल्लाह ने जवाब दिया ‘मूसा तुम खुद उसका नसीब पढ़ चुके हो, मैं इस हक में नहीं हूँ, उसे औलाद नसीब नहीं हो सकती| मूसा स्वयं खुदा नहीं अपितु खुदा का बंदा था, क्या करता? उससे नानवाइ को मायूस होकर कहा कि अल्लाह की इनायत उस पर नहीं हो सकती क्योंकि उसके नसीब में औलाद नही है|

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एक दिन अल्लाह ने मूसा से इंसान का मांस खाने की मंशा जाहिर की| मूसा निकल पड़ा खुदा के लिए इंसान का गोश्त लाने| घर-घर भटका लेकिन कोई भी इंसान अपना गोश्त देने को राजी नहीं हुआ | इंसान का गोश्त नहीं मिलने से मूसा मायूस हो गया | तभी वहाँ से एक फकीर निकला, मूसा को मायूस देखकर फकीर ने पूछा –‘आज खुदा का बंदा मायूस क्यों ? मूसा ने बताया कि अल्लाह की ख़्वाहिश इंसान का गोश्त खाने की है, उसी के लिए भटक रहा हूँ | फ़कीर ने तुरंत अपने हाथ, पैर तथा शरीर के दूसरे हिस्सों से थोड़ा-थोड़ा मांस काटकर मूसा को देते हुए कहा –‘जाओ अपने मालिक की ख़्वाहिश और फरमाइश को पूरी करो | मूसा ने फकीर के इंसानी गोश्त से खुदा की ख़्वाहिश को पूरा कर दिया | कुछ समय बाद फ़कीर घूमते-घूमते नानवाइ की दुकान पर पहुंचा और उसने कहा - अल्ला की बंदी 12 रोटी दे दो ऊपर वाला तुम्हें 12 औलाद बख्शेगा | नानवाइ ने शुक्रिया अदा करते हुए कहा – फ़कीर बाबा ! औलाद मेरे नसीब में नहीं है, लेकिन तुम्हें खाली हाथ नहीं जाने दूँगी और यह कहते हुए 12 रोटियाँ दे दी | खुश होकर फ़कीर दुआ देते हुए चला गया | कुछ दिनों के बाद मूसा ने सुना कि ‘नानवाइ पेट से है’ (माँ बनने वाली)|

मूसा के लिए यह खबर हैरत में डालने वाली थी, क्योंकि उसने खुद नानवाइ का नसीब देखा था और खुदा ने भी कहा था कि नानवाइ के नसीब में औलाद का सुख नहीं है| मूसा को शर्मिंदगी महसूस होने लगी, लोग उसके बारे में क्या सोचेंगे? उस पर से सबका यकीन उठ जाएगा, यह सरासर मूसा को अपनी तौहीन लगी| तत्काल अल्लाह के पास जाकर मूसा ने पूछा मेरे मालिक यह क्या है? उसके नसीब और मेरी गुजारिश से ज्यादा ताक़त किसकी दुआ में है, जिसके कारण तुझे अपना ही फैसला बदलना पड़ा| सुना है तेरी रहमत से नानवाइ उम्मीद (गर्भवती) से है?

खुदा ने कहा – मूसा! तुम मेरे करीबी अजीज बंदे हो| तुमने मेरे साथ ईमान और इंसानियत की गुफ्तगू की, मुझे महसूस किया और देखा है| मैंने इंसान का गोश्त खाने की ख़्वाहिश जाहिर की थी, क्या तुम इंसान नहीं हो? तुम्हें दर-दर भटकने की क्या जरूरत थी? तुम अपना गोश्त भी मुझे दे सकते थे लेकिन तुमने ऐसा नहीं किया| वह फकीर जिसने मुझे कभी देखा ही नहीं, मुझसे रूबरू भी नहीं हुआ और ना ही उसकी कोई ख़्वाहिश है| उसने तुमसे मेरी ख़्वाहिश को सुनकर ही मेरे लिए अपना गोश्त दे दिया| अब उसकी दुआ को कबूल करना मेरा फर्ज़ है | मुझे नानवाइ का नसीब बदलना पड़ा, क्योकि उस फकीर ने मुझे अपनी इंसानियत से खरीद लिया और मैं उसका कर्जदार हो गया हूँ |

मेरे सहकर्मी नूरूल अमीन नक़्क़ाश (अख्तर) द्वारा धर्मांध लोगों के खुद को अल्लाह का बंदा और इस्लाम का रखवाला समझ लेने की खुशफहमी पर कटाक्ष करते हुए सुनाया गया वाकया अचानक याद आ गया|

कोरोना वायरस के खतरे के बीच भारत की राजधानी दिल्ली के हजरत निजामुदीन मरकज़ में तबलीगी जमात के देश-विदेश भर से इकठ्ठा हुए मौलानाओं के चरित्र और आचरण ने मुझे दुविधा में डाल दिया है| एक ओर अख्तर जैसे सहकर्मी से सुने वाकये के अनुसार इस्लाम धर्म में इंसानियत सबसे ऊपर है वहीं दूसरी ओर जो घटनाक्रम दिल्ली में तबलीगी जमात के कारण हम सबके सामने आया उसमें इंसानियत का नामो-निशान भी नजर नहीं आता|

निजामुदीन मरकज (बायें) और लेखिका प्रो. सरोज व्यास (दायें)  

तबलीगी जमात का इतिहास

वर्तमान में तो इंसानियत के मापदंड ही बदल गए है, 1927 में इस्लाम धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए भारत में स्थापित हुए तबलीगी जमात (धार्मिक जलसा) और निजामुदीन के मरकज (बैठक का स्थान) के बारे में इतना विस्तार से समस्त देशवासियों ने टेलीविज़न पर पहली बार सुना होगा| तबलीगी जमात 93 साल पुराना, 213 देशों की वाला इस्लामिक धार्मिक संगठन है |

लॉकडाउन के समय में भारतीय ही नहीं, विश्व के अधिकांश राष्ट्रों के नागरिकों की आँखें और कान मीडिया द्वारा दिखाई-सुनाई जा रही खबरों पर लगातार लगे हुए है | आज टेलीविज़न पर अनेक मुस्लिम धर्मगुरुओं, मुस्लिम समाज-सेविकाओं तथा केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान को सबने सुना होगा| अंबर जैदी एक सामाजिक कार्यकर्ता है, उनका कहना था कि तबलीगी जमात के लोगों से उनके तथाकथित धर्मगुरु कहते रहे कि मुसलमान 5 वक्त की नमाज पढ़ने वाला खुदा का बंदा है, कोरोना वाइरस उन्हें छू भी नहीं सकता|

आरिफ़ मोहम्म्द साहब तबलीगी जमात के मुखिया के यूट्यूब पर 18 मार्च को वायरल हुए वीडियो के कुछ अंशों को लिखित रूप से लिए हुए थे | वैश्विक आंकड़ा तो उनके पास नही था, लेकिन भारत में 80 हजार लोगों ने उस भड़काऊ भाषण वाले वीडियो को सुना| जिसमें तबलीगी जमात के मौलाना ने अपने समुदाय के लोगों को संदेश दिया था- “कुछ छोटे लोग तुम्हें गुमराह करेंगे, तुम्हें अल्लाह के घर मस्जिदों में नहीं आने के लिए निर्देशित करेंगे, लेकिन मैं तुमसे कहता हूँ, तुम अधिक से अधिक संख्या में मस्जिदों में आओ| तुम्हारे तजरबे में भी आ जाए कि कोई मस्जिद में मर रहा है, तो उसे मरने दो, क्योंकि इससे ज्यादा नसीब वाला और कौन होगा, जिसे अल्लाह की रहमत से अल्लाह के घर में मौत मिलेगी”| उन्होंने कहा की धर्म के नाम पर नासमझ लोगों को भड़काने वाले ऐसे उनके अनेकों वीडियो हैं |

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आरिफ साहब भी मुस्लिम हैं | उनके उद्बोधन और वक्तव्यों में छिपी असहनीय पीड़ा को सुनने वाले प्रत्येक संवेदनशील मनुष्य ने महसूस किया होगा| उन्होंने संजीदगी के साथ कहा– “जहालत धर्म नहीं है, हलाकत (मुसीबत) है”| तबलीगी जमात के नुमाइंदों ने आज मानवता को संकट के द्वार पर खड़ा कर दिया है | किसी मसीहा की तलाश मत कीजिये, इस अक्षम्य अपराध के लिए उन्हें कठोर से कठोर दंड दिया जाना चाहिए | धर्म एवं समुदाय के नाम पर गुमराह होने वाले लोगों में विश्वास और जागरूकता पैदा करनी होगी”|

लोकतंत्र में कैसे कोई धर्मगुरु अपने ही समुदाय के लोगों को यह संदेश दे सकता है कि, देश के प्रधानमंत्री, राज्यों के मुख्यमंत्री, विश्व स्वास्थ्य संगठन, स्वास्थ्य मंत्रालय तथा विभिन्न विभागों के आदेशों-निर्देशों को दरकिनार करते हुए मस्जिद मे एकत्रित होकर सामूहिक इबादत करें?

अनगिनत सरकारी नुमाइंदे.. पुलिस, प्रशासनिक कर्मी, चिकित्सक, नर्स, पैरामेडिकल स्टाफ़, ड्राइवर आदि इनके इस व्यवहार के कारण अपने जीवन को संकट में डालने के लिए मजबूर हैं| 21वीं सदी में तकनीकी, विज्ञान एवं वैश्वीकरण के इस युग में धर्मांध लोगों को न्याय एवं कानून की नहीं, धार्मिक फ़तवे की भाषा समझ में आती है तो फिर किस अधिकार से यह सरकार एवं सरकारी तंत्र पर लापरवाही बरते जाने का आरोप लगा रहे हैं? क्या यह इन्हें शोभा देता है। कोई संदेह नहीं कि दिल्ली पुलिस और इसके खुफिया विभाग ने तबलीगी जमात तथा मरकज में हजारों की संख्या में ठहरे लोगों के मामले पर उचित कार्यवाही नहीं की|

(लेखिका प्रो. सरोज व्यास, फेयरफील्ड प्रबंधन एवं तकनीकी संस्थान, कापसहेड़ा, नई दिल्ली में डायरेक्टर हैं। डॉ. व्यास संपादक, शिक्षिका, कवियत्री और लेखिका होने के साथ-साथ समाज सेविका के रूप में भी अपनी पहचान रखती है। ये इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के अध्ययन केंद्र की इंचार्ज भी हैं)

Published : 
  • 3 April 2020, 1:00 PM IST

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