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कोविड में ऑनलाइन पढ़ाई बच्चों के लिए जरूरी सहारा थी, जिसने शिक्षा को बाधित होने से बचाया। लेकिन सवाल ये है कि क्या स्क्रीन की पढ़ाई हमेशा के लिए स्कूल की जगह ले सकती है?
महामारी ने बदली पढ़ाई की परिभाषा (फोटो सोर्स-इंटरनेट)
New Delhi: कोविड-19 महामारी ने विश्वभर में जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित किया, और शिक्षा प्रणाली इससे अछूती नहीं रही। अचानक लगे लॉकडाउन और सामाजिक दूरी के नियमों के कारण स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को अपने दरवाजे बंद करने पड़े। ऐसे में ऑनलाइन शिक्षा एकमात्र विकल्प बनकर सामने आई। डिजिटल मंचों जैसे Zoom, Google Meet, Microsoft Teams आदि ने शिक्षा के लिए एक नया मंच तैयार किया। लेकिन अब जब दुनिया धीरे-धीरे सामान्य हो गई है, तो यह बहस तेज हो गई है- क्या ऑनलाइन शिक्षा पारंपरिक कक्षाओं का विकल्प बन सकती है?
महामारी के दौरान ऑनलाइन शिक्षा ने छात्रों को निरंतर सीखने का अवसर दिया। यह एक लचीला मॉडल था जिसमें समय और स्थान की पाबंदियां कम थीं। शिक्षक और छात्र घर बैठे जुड़ सके। शिक्षण सामग्री रिकॉर्ड की जा सकी, जिससे छात्र बाद में दोबारा पढ़ाई कर सके। विशेष रूप से ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों के छात्रों को प्रतिष्ठित शिक्षकों से जुड़ने का मौका मिला।
ऑनलाइन शिक्षा (फोटो सोर्स-इंटरनेट)
लेकिन हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। ऑनलाइन शिक्षा के साथ कई चुनौतियां भी सामने आईं। इंटरनेट की उपलब्धता और तकनीकी उपकरणों की कमी ने डिजिटल डिवाइड को उजागर कर दिया। कई घरों में एक ही मोबाइल या लैपटॉप पर दो-तीन बच्चों को पढ़ना पड़ा। आँखों पर तनाव, एकाग्रता की कमी, और सामाजिक संवाद का अभाव छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालने लगा।
पारंपरिक शिक्षा प्रणाली केवल पुस्तकीय ज्ञान देने का जरिया नहीं है, बल्कि यह छात्रों के सर्वांगीण विकास का माध्यम भी है। विद्यालयों और कॉलेजों में साथ पढ़ने, खेल-कूद, वाद-विवाद और सांस्कृतिक गतिविधियों से बच्चों का मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास होता है। शिक्षक और सहपाठियों से प्रत्यक्ष संवाद से छात्रों में आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता का विकास होता है।
पारंपरिक शिक्षा (फोटो सोर्स-इंटरनेट)
महामारी के बाद जब स्कूल दोबारा खुले, तो छात्रों में जोश देखा गया। अभिभावकों और शिक्षकों दोनों ने यह महसूस किया कि ऑनलाइन शिक्षा में जितनी भी सुविधा हो, लेकिन वह पारंपरिक कक्षा जैसा अनुभव नहीं दे सकती।
ऑनलाइन शिक्षा ने यह जरूर साबित कर दिया कि तकनीक के माध्यम से शिक्षा को अधिक सुलभ और व्यापक बनाया जा सकता है। विशेष रूप से उच्च शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण, और पुनः कौशल (reskilling) के लिए यह एक प्रभावी माध्यम बनकर उभरा है। वयस्क शिक्षार्थियों और कामकाजी लोगों के लिए ऑनलाइन कोर्स जीवन में लचीलापन लाते हैं।
लेकिन विद्यालय स्तर पर अभी भी पारंपरिक शिक्षा ही अधिक प्रभावी मानी जाती है। सामाजिक सहभागिता, अनुशासन, और सीखने का जीवंत वातावरण ऑनलाइन माध्यम में संभव नहीं हो पाता।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अब समय आ गया है कि दोनों प्रणालियों के लाभों को मिलाकर एक 'हाइब्रिड मॉडल' अपनाया जाए। स्कूलों में कक्षा शिक्षण के साथ-साथ तकनीकी संसाधनों का उपयोग बढ़ाया जाए। छात्रों को डिजिटल साक्षरता दी जाए ताकि वे वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकें। शिक्षकों को भी डिजिटल पद्धतियों में प्रशिक्षित करना आवश्यक है।
कोविड-19 ने शिक्षा को एक नई दिशा दिखाई है। हालांकि पारंपरिक शिक्षा का महत्व आज भी बरकरार है, लेकिन ऑनलाइन शिक्षा ने उसके पूरक के रूप में अपनी अहमियत साबित की है। आने वाले वर्षों में यह आवश्यक होगा कि शिक्षा प्रणाली दोनों का संतुलन बनाए और छात्रों के विकास को प्राथमिकता दे।
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