Bakrid 2026: भारत में 28 मई को होगी ईद-उल-अज़हा, जानें नमाज़, कुर्बानी का समय और इसका खास महत्व

भारत में इस साल ईद-उल-अजहा (बकरीद) 28 मई को मनाई जाएगी। रविवार को चांद नहीं दिखने के बाद शाही इमामों ने यह घोषणा की। यह त्योहार हजरत इब्राहिम के बलिदान की याद और समाज में आपसी भाईचारे तथा जरूरतमंदों की मदद का संदेश देता है।

Post Published By: Tanya Chand
Updated : 18 May 2026, 1:30 PM IST
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New Delhi: देशभर में मुस्लिम समुदाय का दूसरा सबसे बड़ा त्योहार ईद-उल-अजहा यानी बकरीद इस साल 28 मई को मनाया जाएगा। रविवार शाम देश की राजधानी दिल्ली समेत देश के किसी भी हिस्से से ज़िलहिज्जा (ज़ुल हिज्जा) का चांद दिखाई देने की कोई प्रामाणिक सूचना प्राप्त नहीं हुई। चांद नजर न आने के बाद देश के प्रमुख मुस्लिम धर्मगुरुओं, रूयत-ए-हिलाल कमेटियों और इस्लामी संगठनों ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की है कि इस वर्ष बकरीद का त्योहार 28 मई को मनाया जाएगा।

प्रमुख मुस्लिम संगठनों और धर्मगुरुओं का आधिकारिक बयान

पुरानी दिल्ली की ऐतिहासिक चांदनी चौक स्थित फतेहपुरी मस्जिद के शाही इमाम मुफ़्ती मुकर्रम अहमद ने इस संबंध में विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि रविवार शाम को देशभर के विभिन्न राज्यों और शहरों से संपर्क साधने का प्रयास किया गया, लेकिन कहीं से भी चांद दिखने की पुष्टि नहीं हो सकी। इसी आधार पर सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि ईद-उल-अज़हा 28 मई को होगी।

इसके साथ ही, इमारत-ए-शरीअह ने भी अपने एक आधिकारिक बयान में चांद न दिखने की बात कही और त्योहार की तारीख की पुष्टि की। वहीं, दिल्ली की प्रसिद्ध जामा मस्जिद के नायब शाही इमाम सैयद शबान बुखारी ने एक वीडियो संदेश जारी करते हुए कहा कि देश के किसी भी हिस्से से चांद नजर आने की गवाही नहीं मिली है, इसलिए भारत में बकरीद का पर्व 28 मई को मनाया जाएगा।

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इस्लामिक कैलेंडर में क्या है इसका महत्व?

इस्लामी मान्यताओं और कैलेंडर के अनुसार, ईद-उल-अज़हा का यह पावन पर्व साल के आखिरी महीने यानी ज़ुल हिज्जा की 10वीं तारीख को मनाया जाता है। यह त्योहार मीठी ईद यानी ईद-उल-फित्र के लगभग दो महीने नौ दिन बाद आता है। इस्लाम धर्म में इस पर्व का बेहद खास और ऐतिहासिक महत्व माना जाता है, जो त्याग और समर्पण का प्रतीक है।

बकरीद पर क्यों दी जाती है कुर्बानी?

इस्लामी इतिहास और मान्यताओं के मुताबिक, ईद-उल-अज़हा का त्योहार पैगंबर हज़रत इब्राहिम और उनके पुत्र हज़रत इस्माइल द्वारा अल्लाह की राह में दिए गए महान बलिदान की याद में मनाया जाता है। माना जाता है कि अल्लाह के हुक्म पर हज़रत इब्राहिम अपने सबसे प्रिय बेटे को कुर्बान करने के लिए तैयार हो गए थे।

लेकिन जब उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर छुरी चलाई, तो अल्लाह ने उनकी निष्ठा और परीक्षा से संतुष्ट होकर उनके बेटे को सुरक्षित हटा दिया और वहां एक दुंबे (जानवर) को रख दिया। इसी ऐतिहासिक घटना की याद में दुनिया भर के मुसलमान हर साल इस मौके पर कुर्बानी की सुन्नत को जिंदा करते हैं।

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किन जानवरों की दी जाती है कुर्बानी और क्या हैं नियम?

त्याग और परोपकार का यह त्योहार आमतौर पर तीन दिनों (10, 11 और 12 ज़ुल हिज्जा) तक चलता है। इस दौरान मुस्लिम समुदाय के लोग अपनी आर्थिक क्षमता और हैसियत के अनुसार हलाल जानवरों की कुर्बानी करते हैं। धार्मिक विद्वानों और उलेमाओं का स्पष्ट कहना है कि केवल उन्हीं पशुओं की कुर्बानी दी जानी चाहिए, जिन पर भारतीय कानून के तहत कोई कानूनी प्रतिबंध नहीं है।

इस मुबारक मौके पर देशभर की छोटी-बड़ी मस्जिदों और ईदगाहों में सुबह के वक्त विशेष नमाज़ अदा की जाती है, जिसके बाद लोग एक-दूसरे को गले लगाकर मुबारकबाद देते हैं और गरीबों व जरूरतमंदों में गोश्त का हिस्सा बांटकर उनकी मदद करते हैं।

Location :  New Delhi

Published :  18 May 2026, 1:30 PM IST

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