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ममता बनर्जी (IMG: Pinterest)
West Bengal: पश्चिम बंगाल की राजनीति में कभी एकछत्र दबदबा रखने वाली तृणमूल कांग्रेस अब खुद अपने सबसे बड़े सियासी संकट से जूझती नजर आ रही है। 15 साल तक सत्ता में रहने के बाद पार्टी के सामने सत्ता से बाहर होने की चुनौती तो है ही, लेकिन उससे बड़ा संकट संगठन के भीतर दिखाई दे रहा है। पार्टी में तीन अलग-अलग शक्ति केंद्र उभरने की चर्चा ने ममता बनर्जी के सामने नई मुश्किलें खड़ी कर दी हैं।
तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में 15 साल तक सत्ता चलाई। इस लंबे दौर में पार्टी का संगठन और सरकार लगभग एक ही राजनीतिक ढांचे के भीतर काम करते रहे। मंत्री, विधायक, नगर निकायों के प्रतिनिधि और जिला स्तर के नेता सत्ता के आसपास सक्रिय रहे। सत्ता के साथ राजनीतिक प्रभाव, प्रशासनिक पहुंच और संगठनात्मक ताकत भी जुड़ी हुई थी। लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। सरकार से बाहर होने के बाद पार्टी को पहली बार ऐसे संगठन के रूप में काम करना है, जिसके पास सत्ता की मशीनरी नहीं है।
मौजूदा हालात में टीएमसी के भीतर तीन अलग-अलग राजनीतिक केंद्र दिखाई दे रहे हैं। पहला खेमा ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला है, जो पार्टी पर अपना नियंत्रण बनाए हुए है। दूसरा धड़ा ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में सामने आया है। इस गुट ने पार्टी के संगठन और नेतृत्व को लेकर अलग दावे किए हैं। उसका कहना है कि मौजूदा नेतृत्व ने टीएमसी की मूल राजनीतिक विचारधारा से दूरी बना ली है और संगठन को अधिक लोकतांत्रिक तरीके से चलाने की जरूरत है। तीसरा धड़ा पार्टी से अलग होकर एनसीपीआई में गया सांसदों का समूह है। इस समूह के नेता अब केंद्र की एनडीए सरकार को समर्थन दे रहे हैं। इससे टीएमसी की संसद में ताकत भी प्रभावित हुई है।
ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट ने पार्टी के भीतर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश शुरू कर दी है। इस गुट ने वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को अध्यक्ष चुने जाने और समानांतर नेतृत्व व्यवस्था की घोषणा का दावा किया है। ममता बनर्जी के खेमे ने इस पूरी प्रक्रिया को असंवैधानिक बताते हुए खारिज कर दिया है। यानी अब टीएमसी के भीतर सिर्फ बयानबाजी नहीं, बल्कि संगठन पर अधिकार को लेकर सीधी लड़ाई दिखाई दे रही है।
ऋतब्रत खेमे की ओर से पूरे घटनाक्रम की अलग तस्वीर पेश की जा रही है। बागी नेताओं का कहना है कि मौजूदा टीएमसी अपनी मूल राजनीतिक पहचान खो चुकी है। गुट से जुड़े संदीपन साहा का तर्क है कि जिस विचारधारा और राजनीतिक उद्देश्य के साथ पार्टी की शुरुआत हुई थी, वह अब दिखाई नहीं देता। उनके मुताबिक, यह लड़ाई सिर्फ ममता बनर्जी के नेतृत्व को चुनौती देने के लिए नहीं है, बल्कि पार्टी को अधिक लोकतांत्रिक तरीके से दोबारा खड़ा करने के लिए है।
टीएमसी के भीतर असंतोष की एक वजह अभिषेक बनर्जी का बढ़ता प्रभाव भी बताया जा रहा है। असंतुष्ट नेताओं का आरोप है कि पार्टी में फैसले लेने की प्रक्रिया पहले जैसी सामूहिक नहीं रही और नेतृत्व का केंद्रीकरण बढ़ा है। मदन मित्रा, फिरहाद हकीम और अरूप विश्वास समेत कई प्रमुख नेताओं के ऋतब्रत खेमे की ओर जाने की बात सामने आई है। अगर बड़े चेहरे लगातार बागी गुट के साथ जाते हैं तो इससे ममता बनर्जी के सामने संगठनात्मक चुनौती और बढ़ सकती है।
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टीएमसी के लिए तीसरा संकट संसद के भीतर भी दिखाई दे रहा है। पार्टी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसदों के एनसीपीआई संसदीय समूह में चले जाने की बात कही गई है। इस बदलाव ने लोकसभा में टीएमसी की ताकत को काफी कम कर दिया है। अलग हुए सांसद अब ममता बनर्जी के नियंत्रण से बाहर एक अलग राजनीतिक मंच तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं।
संसद में संख्या कम होने के बाद टीएमसी के सामने अब सबसे बड़ी परीक्षा जमीन पर संगठन बचाने की है। बंगाल की राजनीति में बूथ स्तर का संगठन हमेशा बेहद महत्वपूर्ण रहा है। ममता बनर्जी ने 2011 में इसी जमीनी ताकत के दम पर 34 साल पुराने वाम मोर्चे के शासन को खत्म किया था। उस समय वह विपक्ष की सबसे मजबूत नेता से बंगाल की सत्ता परिवर्तन की मुख्य नायिका बन गई थीं।
2011 में ममता बनर्जी के सामने सत्ता हासिल करने की चुनौती थी। उन्होंने लंबे संघर्ष के बाद यह लक्ष्य हासिल किया। इसके बाद लगातार 15 साल तक टीएमसी बंगाल की सत्ता में रही। अब 2026 में चुनौती उससे बिल्कुल अलग है। उन्हें सत्ता में लौटने से पहले अपनी पार्टी को टूटने से बचाना होगा। संगठन के भीतर असंतोष, नेताओं का बिखराव और संसदीय ताकत में कमी—इन तीनों मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा। राजनीतिक विश्लेषक बिस्वनाथ चक्रवर्ती के मुताबिक, टीएमसी का राजनीतिक मॉडल लंबे समय तक सत्ता तक पहुंच और मजबूत स्थानीय नेताओं के नेटवर्क पर टिका रहा। सत्ता की धुरी बदलने के बाद इस पूरे ढांचे को नए सिरे से तैयार करना पड़ेगा।
Location : West Bengal
Published : 19 August 2026, 2:16 PM IST