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केरल में राजनीतिक विवाद तेज: आरवी बाबू ने वीडी सतीशन पर 2001 और 2006 के विधानसभा चुनाव में आरएसएस से समर्थन लेने का आरोप लगाया, सतीशन ने पूरी तरह खारिज किया। राजनीतिक माहौल तनावपूर्ण हो गया।
केरल में आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज (Img- Internet)
Thiruvananthapuram: केरल की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। संघ परिवार से जुड़े नेता आरवी बाबू ने यूडीएफ चेयरमैन वीडी सतीशन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। बाबू ने दावा किया कि सतीशन ने 2001 और 2006 के विधानसभा चुनाव जीतने के लिए आरएसएस से समर्थन मांगा था। इस आरोप के बाद राज्य की राजनीति में हलचल तेज हो गई है और सभी पार्टियों के नेता इसे लेकर बयानबाजी में जुट गए हैं।
वीडी सतीशन ने इन आरोपों को पूरी तरह से खारिज किया है। उन्होंने कहा कि उन्होंने कभी आरएसएस या भाजपा से वोट नहीं मांगे। सतीशन का कहना है कि यह आरोप राजनीतिक वजह से लगाए जा रहे हैं और आरोप लगाने वाले नेता उनके खिलाफ पहले से ही पक्षपात रखते हैं।
आरवी बाबू ने कहा कि सतीशन पहले आरएसएस के कार्यक्रम में शामिल होने से इनकार करते थे, लेकिन बाद में उन्होंने इसे स्वीकार किया। बाबू ने सवाल उठाया कि अगर एक विषय पर सच्चाई सामने आई है, तो अन्य मामलों में भी सच्चाई सामने आ सकती है। उन्होंने दावा किया कि चुनाव जीतने के लिए सतीशन ने आरएसएस से मदद ली थी।
सतीशन ने साफ कहा कि यह आरोप झूठे हैं। उन्होंने कहा कि अगर उनके और आरएसएस या भाजपा के बीच कोई समझौता होता, तो उनके विरोधी उन्हें हराने के लिए कार्रवाई करते। उन्होंने इसे उनकी छवि खराब करने की साजिश बताया।
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सतीशन ने पलटवार करते हुए सीपीआई(एम) और आरएसएस के रिश्तों पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि जब उनकी पार्टी को किसी संगठन का समर्थन मिलता है, तो सवाल उठाए जाते हैं, लेकिन दूसरी पार्टियों और उनके सहयोगियों के संबंधों पर चुप्पी रहती है।
सतीशन ने सबरीमाला मामले और अन्य विवादों का भी जिक्र किया। उन्होंने आरोप लगाया कि सीपीआई(एम) अपने नेताओं को बचा रही है। इसके साथ ही उन्होंने केंद्र सरकार से एफसीआरए कानून में बदलाव के प्रस्ताव को वापस लेने की मांग की।
इस पूरे विवाद के बाद केरल की राजनीति में तनाव और बढ़ गया है। आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। आने वाले चुनाव में यह मुद्दा बड़ा राजनीतिक हथियार बन सकता है और सभी पार्टियां इसे लेकर अपनी रणनीति तैयार कर रही हैं।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इस विवाद से चुनावी माहौल गरमाएगा। विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों इसे चुनावी रैलियों और प्रचार में इस्तेमाल करेंगे। आम जनता और पार्टी कार्यकर्ता भी इस मुद्दे पर अलग-अलग राय रखते नजर आ रहे हैं।