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कौन चलाता है चीनी की कीमत का चाबुक (Img- Pinterest)
New Delhi: चाय की चुस्की से लेकर मांगलिक मौकों की मिठाइयों तक, चीनी भारतीय जीवन का अहम हिस्सा है। हालांकि, बीते कुछ हफ्तों में चीनी की खुदरा कीमतें 65 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच चुकी हैं, जिससे आम जनता की जेब पर सीधा असर पड़ा है।
डेढ़ महीने पहले जो थोक चीनी 42 से 45 रुपये प्रति किलो बिक रही थी, वह अब 62 रुपये प्रति किलो के करीब है। अचानक बढ़ी इस महंगाई ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर चीनी के दाम बढ़ाने या घटाने की डोर किसके हाथ में है?
कई लोगों को लगता है कि किसान अपनी मर्जी से फसल की कीमत तय करते हैं, लेकिन सच इसके उलट है। किसान केवल गन्ना उगाता है, उसकी कीमत तय करने का अधिकार सरकार के पास है। केंद्र सरकार आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के तहत 'उचित और लाभकारी मूल्य' (FRP) तय करती है।
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चीनी मिलों को किसानों को कम से कम इस दर पर भुगतान करना ही होता है। वहीं उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा जैसे राज्य अपना अलग SAP (राज्य परामर्शित मूल्य) तय करते हैं, जो अक्सर केंद्र के FRP से अधिक होता है।
सीजन 2025-26 के लिए केंद्र सरकार ने गन्ने का FRP 355 रुपये प्रति क्विंटल (10.25% रिकवरी दर पर) तय किया है। बेहतर रिकवरी पर किसानों को अतिरिक्त प्रीमियम भी मिलता है। लेकिन चीनी की अंतिम बिक्री दर सिर्फ गन्ने के मूल्य से तय नहीं होती।
मिलों द्वारा एथेनॉल उत्पादन, चीनी की कुल मांग और आपूर्ति का संतुलन भी बाजार भाव तय करता है। जब बाजार में आपूर्ति घटती है, तो व्यापारी और मिलें दाम बढ़ा देती हैं।
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बाजार में चीनी का भाव अनियंत्रित न हो, इसके लिए सरकार के पास व्यापक शक्तियां हैं। सरकार मिलों के लिए बिक्री कोटा तय करती है, ताकि बाजार में एक साथ पूरी चीनी न आए।
हालिया महंगाई को देखते हुए केंद्र सरकार ने 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त (Duty-Free) आयात को मंजूरी दी है और बड़े व्यापारियों पर स्टॉक लिमिट लगा दी है, ताकि जमाखोरी रोकी जा सके और कीमतें दोबारा नियंत्रण में आ सकें।
Location : New Delhi
Published : 23 August 2026, 11:20 AM IST