The MTA Speaks: क्या खत्म होना चाहिए जातिगत आरक्षण? जानिए SC, ST, OBC, EWS आरक्षण का पूरा गणित

दिल्ली के जंतर-मंतर पर आरक्षण के खिलाफ जारी आंदोलन के बीच जानिए भारत में आरक्षण का 150 साल पुराना इतिहास। इस वीडियो में समझें SC, ST, OBC और EWS आरक्षण की शुरुआत, जरूरत, और इससे जुड़े सभी संवैधानिक पहलुओं का पूरा विश्लेषण।

Post Published By: Manoj Tibrewal Aakash
Updated : 24 August 2026, 11:20 AM IST
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New Delhi: आरक्षण खत्म करने की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर आंदोलन हो रहा है... लेकिन भारत में आरक्षण की शुरुआत आखिर कब हुई? किस वर्ग को कितना आरक्षण मिला और इसकी जरूरत क्यों पड़ी? आज के आंदोलन को समझने के लिए पहले आरक्षण के पूरे इतिहास को समझना बेहद जरूरी होगा, तो चलिए जानते है।

वरिष्ठ पत्रकार मनोज टिबड़ेवाल आकाश ने अपने चर्चित शो The MTA Speaks  में भारत में आरक्षण की शुरुआत आखिर कब हुई? किस वर्ग को कितना आरक्षण मिला और इसकी जरूरत क्यों पड़ी? को लेकर सटीक विश्लेषण किया।

दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल ही में आरक्षण के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हुआ जो अभी भी जारी है... प्रदर्शनकारियों की मांग है कि सरकारी मदद और आरक्षण का आधार जाति नहीं, बल्कि व्यक्ति की आर्थिक स्थिति होनी चाहिए। आंदोलन से जुड़ी मांगों में आरक्षण व्यवस्था में बदलाव, उसकी समय-समय पर समीक्षा और कुछ दूसरी शर्तों की बात भी शामिल है।

आरक्षण का इतिहास और ब्रिटिश दौर की शुरुआत

लेकिन आरक्षण को लेकर बहस आज की नहीं है। भारत में यह मुद्दा आजादी से पहले से ही चर्चा में रहा है। भारत में आरक्षण की कहानी करीब डेढ़ सौ साल पुरानी बहस से जुड़ी हुई है। ब्रिटिश दौर में ही अलग-अलग क्षेत्रों में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े लोगों को प्रतिनिधित्व देने की कोशिशें शुरू हो गई थीं।

बीसवीं सदी की शुरुआत में कोल्हापुर के छत्रपति शाहू महाराज ने पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था लागू की। इसके बाद मद्रास प्रेसिडेंसी जैसे क्षेत्रों में भी सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर अलग-अलग व्यवस्थाएं सामने आईं। यानी आजादी के बाद संविधान बनने के साथ आरक्षण की शुरुआत अचानक नहीं हुई थी। इसके पीछे लंबे समय से चली आ रही सामाजिक असमानता और प्रतिनिधित्व की बहस थी।

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संविधान निर्माण और सामाजिक न्याय की परिकल्पना

अब आते हैं आजादी के दौर पर। जब संविधान बनाया जा रहा था, तब सबसे बड़ा सवाल था कि देश के उन वर्गों को बराबरी का मौका कैसे दिया जाए, जो लंबे समय तक सामाजिक भेदभाव का सामना करते रहे थे। संविधान निर्माताओं ने सिर्फ यह नहीं देखा कि किसी व्यक्ति के पास पैसा कितना है। सवाल यह भी था कि क्या उसे समाज में बराबरी का दर्जा और अवसर मिला है?

इसी सोच के तहत अनुसूचित जाति यानी SC और अनुसूचित जनजाति यानी ST के लिए विशेष प्रावधान किए गए। संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 सरकार को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा SC और ST के लिए विशेष प्रावधान करने की अनुमति देते हैं। सरकारी नौकरियों में अवसर और प्रतिनिधित्व से जुड़ी व्यवस्था का आधार भी यहीं से मजबूत हुआ।

आरक्षण का मूल उद्देश्य: गरीबी हटाना या प्रतिनिधित्व देना?

अब यहां एक बात समझना बहुत जरूरी है। आरक्षण का मूल उद्देश्य सिर्फ गरीबी दूर करना नहीं था। अगर कोई व्यक्ति गरीब है तो उसकी मदद के लिए सरकार की अलग-अलग योजनाएं हो सकती हैं। लेकिन आरक्षण का उद्देश्य उन वर्गों को प्रतिनिधित्व और अवसर देना भी है, जिन्हें लंबे समय तक सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन का सामना करना पड़ा।

यही अंतर आज की पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। आरक्षण के समर्थक कहते हैं कि सिर्फ आर्थिक स्थिति देखकर सामाजिक भेदभाव और ऐतिहासिक असमानता की समस्या खत्म नहीं हो सकती। वहीं आरक्षण का विरोध करने वालों का तर्क है कि गरीबी किसी एक जाति की समस्या नहीं है। अगर कोई आर्थिक रूप से कमजोर है तो उसे उसकी जाति देखकर नहीं, बल्कि उसकी आर्थिक स्थिति देखकर सरकारी मदद और अवसर मिलने चाहिए। यानी दोनों पक्षों की अपनी-अपनी दलील है।

मंडल आयोग और OBC आरक्षण का उदय

अब सवाल आता है कि OBC को आरक्षण कब मिला? आजादी के बाद पिछड़े वर्गों की स्थिति पर विचार करने के लिए अलग-अलग आयोग बनाए गए। इनमें सबसे ज्यादा चर्चा मंडल आयोग की हुई। 1979 में केंद्र सरकार ने बी.पी. मंडल की अध्यक्षता में पिछड़ा वर्ग आयोग बनाया।

आयोग ने सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन का अध्ययन किया और OBC के लिए आरक्षण की सिफारिश की। बाद में 1990 में केंद्र सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने का फैसला किया। इसके तहत केंद्रीय सरकारी नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था आई।

इसके बाद देशभर में इसके समर्थन और विरोध में बड़े आंदोलन हुए। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और 1992 के इंद्रा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने OBC आरक्षण को बरकरार रखा, लेकिन आरक्षण की सीमा को सामान्य तौर पर 50 प्रतिशत तक रखने की बात कही। साथ ही क्रीमी लेयर जैसी व्यवस्था भी सामने आई। यानी आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था सिर्फ एक फैसले या एक सरकार से नहीं बनी। इसके पीछे संविधान, कानून, आयोग और सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों की लंबी प्रक्रिया रही है।

वर्तमान में विभिन्न वर्गों को मिलने वाला आरक्षण

अब बात करते हैं कि आज अलग-अलग वर्गों को कितना आरक्षण मिलता है। केंद्र सरकार की नौकरियों और केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में सामान्य व्यवस्था के तहत SC को 15 प्रतिशत और ST को 7.5 प्रतिशत आरक्षण मिलता है। OBC के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण है।

इसके बाद 2019 में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी EWS के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान आया। EWS व्यवस्था 103वें संविधान संशोधन के जरिए लाई गई। संविधान के अनुच्छेद 15(6) और 16(6) के तहत शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10 प्रतिशत तक आरक्षण का प्रावधान किया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में EWS व्यवस्था को संवैधानिक माना। इसका मतलब यह है कि आर्थिक आधार को भी आरक्षण की व्यवस्था में जगह मिल चुकी है। लेकिन EWS आने का मतलब यह नहीं है कि जाति और सामाजिक पिछड़ेपन पर आधारित आरक्षण खत्म हो गया। दोनों व्यवस्थाओं का आधार अलग है। यही बात जंतर-मंतर के मौजूदा आंदोलन को समझने में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है।

सामाजिक पिछड़ेपन बनाम आर्थिक स्थिति की बहस

मान लीजिए दो लोग आर्थिक रूप से समान स्थिति में हैं। लेकिन अगर उनमें से एक व्यक्ति ऐसे सामाजिक वर्ग से आता है जिसे लंबे समय तक शिक्षा, नौकरी और सामाजिक अवसरों से दूर रखा गया, तो सिर्फ उसकी मौजूदा आर्थिक स्थिति देखकर पूरे अंतर को समझना मुश्किल होगा।

यही कारण है कि भारत की आरक्षण व्यवस्था में आर्थिक स्थिति के साथ सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन को भी महत्व दिया गया है।

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राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और सरकारी रुख

अब सवाल है कि जंतर-मंतर पर हो रहे आंदोलन को लेकर सरकार का क्या रुख है? केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने कहा है कि अगर प्रदर्शनकारी अपनी मांगों को व्यवस्थित तरीके से सरकार के सामने रखते हैं तो सरकार बातचीत करेगी। उन्होंने यह भी कहा कि आरक्षण को लेकर किसी तरह की गलतफहमी देश की बड़ी आबादी में नाराजगी पैदा कर सकती है। आर्थिक आधार की मांग पर उन्होंने EWS के 10 प्रतिशत आरक्षण का भी उल्लेख किया।

वहीं केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले ने आरक्षण को संवैधानिक अधिकार बताते हुए इसे खत्म करने की मांग का विरोध किया है। उनका तर्क है कि जब तक जाति आधारित भेदभाव पूरी तरह खत्म नहीं होता, तब तक आरक्षण की जरूरत बनी हुई है। यानी सरकार में शामिल नेताओं के बीच भी इस मुद्दे पर अलग-अलग तर्क सामने आ रहे हैं।

कानूनी सीमाएं और सुप्रीम कोर्ट के फैसले

क्या आरक्षण को पूरी तरह खत्म किया जा सकता है? यह इतना आसान मामला नहीं है। क्योंकि आरक्षण की कई व्यवस्थाएं संविधान और कानून से जुड़ी हुई हैं। इनमें बदलाव के लिए संवैधानिक प्रक्रिया अपनानी होगी।

इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले भी इस व्यवस्था की सीमाओं और नियमों को प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए 50 प्रतिशत की सीमा को लेकर सुप्रीम कोर्ट का इंद्रा साहनी फैसला बेहद महत्वपूर्ण रहा है। हालांकि अलग-अलग राज्यों में विशेष परिस्थितियों और कानूनों को लेकर अलग-अलग कानूनी बहस भी होती रही है।

आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने समय के साथ कई महत्वपूर्ण फैसले दिए हैं। 2024 में कोर्ट ने SC के भीतर उप-वर्गीकरण की अनुमति दी, लेकिन इसके लिए राज्यों को ठोस आंकड़ों और तथ्यों का आधार रखने की बात कही गई। इससे यह साफ होता है कि आरक्षण कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है जो हमेशा एक ही तरीके से चलती रहेगी। इसमें समय और परिस्थितियों के हिसाब से बदलाव पर कानूनी बहस होती रही है।

क्या आरक्षण हमेशा के लिए रहेगा?

अब एक और बड़ा सवाल है, क्या आरक्षण हमेशा के लिए रहेगा? इसका जवाब भी सीधा हां या ना में देना मुश्किल है। आरक्षण को लेकर संविधान में अलग-अलग प्रावधान हैं और समय के साथ उनमें संशोधन भी हुए हैं। संसद और अदालतों के स्तर पर इस व्यवस्था को लेकर लगातार चर्चा होती रही है।

असल बहस यह है कि जब तक समाज में बराबरी पूरी तरह स्थापित नहीं हो जाती, तब तक पिछड़े और वंचित वर्गों को आगे लाने के लिए कौन-सा तरीका सबसे प्रभावी है। एक पक्ष कहता है कि जाति आधारित व्यवस्था को खत्म कर आर्थिक आधार पर अवसर दिए जाने चाहिए, दूसरा पक्ष कहता है कि सिर्फ आर्थिक स्थिति देखकर सामाजिक असमानता का समाधान नहीं हो सकता।

और शायद यही वजह है कि आरक्षण का मुद्दा हर कुछ समय बाद फिर देश की राजनीति और समाज के बीच बड़ी बहस बन जाता है। आज जंतर-मंतर का आंदोलन भी इसी लंबी बहस का नया अध्याय है। प्रदर्शनकारी बदलाव की मांग कर रहे हैं। सरकार की तरफ से बातचीत की बात कही जा रही है। वहीं आरक्षण समर्थक संगठन इसे सामाजिक न्याय से जोड़कर देखते हैं।

ऐसे में सबसे जरूरी बात है कि इस पूरे मुद्दे को सिर्फ नारे या राजनीतिक बयान के आधार पर नहीं समझा जाए। क्योंकि आरक्षण की कहानी सिर्फ सरकारी नौकरी में कुछ प्रतिशत सीटों की कहानी नहीं है। यह भारत के सामाजिक इतिहास, जातिगत भेदभाव, प्रतिनिधित्व, शिक्षा और समान अवसर की पूरी बहस से जुड़ा विषय है।

और इसी वजह से इस मुद्दे पर राय बनाते समय इतिहास को समझना जरूरी है। फिलहाल जंतर-मंतर का आंदोलन यह जरूर दिखाता है कि आरक्षण का सवाल आज भी देश के लोगों के लिए बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण है। एक तरफ ऐसे लोग हैं जो इसे सामाजिक बराबरी का जरूरी माध्यम मानते हैं। दूसरी तरफ ऐसे लोग हैं जो मानते हैं कि अब व्यवस्था की समीक्षा करके आर्थिक स्थिति को ज्यादा महत्व दिया जाना चाहिए।

दोनों पक्षों के सवाल अपनी जगह हैं लेकिन अंतिम समाधान ऐसा होना चाहिए जिससे देश में अवसरों की बराबरी बढ़े और किसी भी वर्ग को यह महसूस न हो कि उसके साथ अन्याय हो रहा है। क्योंकि आखिरकार आरक्षण की पूरी बहस का मूल सवाल भी यही है... बराबरी का मौका कैसे मिले? और आने वाले समय में भारत की आरक्षण नीति किस दिशा में जाएगी, इसका जवाब आने वाली राजनीतिक और संवैधानिक बहसों से ही सामने आएगा।

Location :  New Delhi

Published :  24 August 2026, 11:16 AM IST

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