‘दिशा तय करो वरना…’ मोहन भागवत ने युवा ऊर्जा के सही इस्तेमाल पर दी गंभीर चेतावनी, जानिए क्या कुछ कहा

मोहन भागवत ने युवाओं और जेन-जी की सोच को लेकर कहा कि नई पीढ़ी सवाल करती है और तर्कसंगत जवाब चाहती है। उन्होंने असहमति को राष्ट्रविरोध समझने को गलत बताया और कहा कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध वैध है। युवाओं की ऊर्जा को सही दिशा देकर इसे राष्ट्रनिर्माण की शक्ति बनाया जा सकता है।

Post Published By: Pratibha Yadav
Updated : 15 August 2026, 1:51 PM IST
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New Delhi: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने युवाओं और खासकर जेन-जी की सोच, सवालों और विरोध के अधिकार को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी सवाल करती है और तर्कसंगत जवाब चाहती है। ऐसे में युवाओं को केवल आदेश देने के बजाय उनके साथ संवाद और सहमति का रास्ता अपनाने की जरूरत है।

असहमति को राष्ट्रविरोध समझना गलत

मोहन भागवत ने कहा कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन अपनी बात रखने का वैध माध्यम है। उन्होंने युवाओं के आंदोलनों में उठाए गए मुद्दों को समझने की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि विरोध करने वाले हर व्यक्ति को राष्ट्रविरोधी बताना उचित नहीं है।

उन्होंने कहा कि असहमति को राष्ट्रविरोध समझना बड़ी भूल है। राष्ट्र सरकार से बड़ा और लोकतंत्र सत्ता से बड़ा है। देश के भविष्य को लेकर सवाल उठाने वाला युवा जरूरी नहीं कि देश का विरोध कर रहा हो। कई बार उसके सवाल व्यवस्था को बेहतर बनाने की इच्छा से जुड़े होते हैं।

युवाओं की आवाज सुनना जरूरी

स्वतंत्रता दिवस के संदर्भ में युवाओं की भूमिका पर चर्चा करते हुए यह सवाल भी अहम है कि आजादी का अर्थ केवल तिरंगा फहराने और स्वतंत्रता सेनानियों को याद करने तक सीमित है या नागरिकों को बिना डर अपनी बात रखने का अधिकार भी इसका हिस्सा है।

यदि भारत को विकसित और शक्तिशाली राष्ट्र बनाना है तो युवाओं के सपनों, चिंताओं और सवालों को समझना होगा। युवा देश के भविष्य के साथ-साथ वर्तमान की भी महत्वपूर्ण शक्ति हैं।

‘क्यों, कैसे और किसलिए’ पूछता है आज का युवा

आज की नई पीढ़ी पहले की तुलना में अधिक सवाल करती है। वह किसी बात को केवल परंपरा या आदेश के आधार पर स्वीकार करने के बजाय उसके पीछे का कारण, प्रक्रिया और परिणाम जानना चाहती है।

यही प्रश्नाकुलता सही दिशा मिलने पर नवाचार, अनुसंधान और राष्ट्रनिर्माण की ताकत बन सकती है। लेकिन अगर युवाओं की ऊर्जा और सवालों को सही दिशा नहीं मिली तो यही शक्ति उनके लिए और समाज के लिए बोझ बन सकती है।

बहस लोकतंत्र की ताकत, हिंसा नहीं

भारतीय परंपरा में संवाद और तर्क का लंबा इतिहास रहा है। अलग-अलग विचारों के बीच बहस को लोकतांत्रिक व्यवस्था की कमजोरी नहीं बल्कि उसकी बौद्धिक ताकत माना जाता है।

सरकार की आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना लोकतांत्रिक अधिकार नहीं है। युवाओं की आवाज को दबाने के बजाय उनके सवालों को सुनकर संवाद के जरिए समाधान तलाशना जरूरी है।

Location :  New Delhi

Published :  15 August 2026, 1:51 PM IST

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