The MTA Speaks : 600 से ज्यादा मौतें, 320 भारतीय लापता, Nepal Flood से बिहार-UP तक पहुंची तबाही की लहर

नेपाल में तीन दिन पहले शुरू हुई एक भयावह प्राकृतिक आपदा ने हालात बदल दिए। तबाही के निशान आज भी दिखाई दे रहे हैं और कई सवालों के जवाब तलाशे जा रहे हैं। इस बीच पड़ोसी देशों की मदद और भारत के सीमावर्ती राज्यों में बढ़ी निगरानी ने चिंता और बढ़ा दी है।

Post Published By: Manoj Tibrewal Aakash
Updated : 30 August 2026, 9:08 AM IST
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Kathmandu: नेपाल में आई भीषण बाढ़ को तीन दिन बीत चुके हैं… लेकिन तबाही की तस्वीर अभी भी लगातार सामने आ रही है। जिस इलाके से इस आपदा की शुरुआत हुई, वहां अब कई जगह सिर्फ मलबा, टूटी सड़कें और बर्बाद पुल दिखाई दे रहे हैं। सैकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है, हजारों लोग अब भी लापता हैं और सबसे बड़ी चिंता यह है कि कई इलाकों तक राहत और बचाव की टीमें अभी भी पूरी तरह नहीं पहुंच पाई हैं। और अब इस पूरी तबाही का असर सिर्फ नेपाल तक सीमित नहीं है।

चीन के तिब्बत इलाके में भी भारी नुकसान हुआ है, आखिर तीन दिन पहले नेपाल में ऐसा क्या हुआ था? तबाही कहां से शुरू हुई? अब वहां हालात कितने संभले हैं? चीन और अमेरिका ने क्या मदद की है? और सबसे बड़ा सवाल… क्या नेपाल से आया पानी बिहार और यूपी के लिए नई मुसीबत खड़ी कर सकता है?

वरिष्ठ पत्रकार मनोज टिबड़ेवाल आकाश ने अपने चर्चित शो The MTA Speaks  में इन सब बातों को विस्तार से समझाया है।

सबसे पहले उस जगह को समझिए, जहां से यह पूरी त्रासदी शुरू हुई। 26 अगस्त की सुबह नेपाल-तिब्बत सीमा के पास हिमालयी इलाके में अचानक एक बड़े ग्लेशियर के टूटने की घटना हुई। करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई पर बर्फ, चट्टान और मलबे का बड़ा हिस्सा नीचे की तरफ आया और नदी तंत्र में जा गिरा। इसके बाद पानी और मलबे की एक बेहद तेज लहर बनी, जिसने नीचे की ओर बसे इलाकों को अपनी चपेट में ले लिया। इसका सबसे ज्यादा असर ल्हेंडे और भोटेकोशी नदी क्षेत्र के साथ-साथ रसुवा, नुवाकोट और धादिंग जैसे इलाकों में दिखाई दिया। पानी इतनी तेजी से नीचे आया कि लोगों को संभलने तक का मौका नहीं मिला। त्रिशूली नदी का जलस्तर भी बेहद तेजी से बढ़ा और कुछ ही समय में कई इलाके पानी और मलबे से भर गए। बाढ़ अपने साथ सिर्फ पानी नहीं लाई थी। इसमें बड़े-बड़े पत्थर, पेड़, बर्फ और पहाड़ का मलबा शामिल था। इसलिए रास्ते में आने वाली सड़कें, पुल, घर और हाइड्रोपावर परियोजनाएं बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गईं।

यही वजह है कि इसे सामान्य बाढ़ से अलग और बेहद विनाशकारी फ्लैश फ्लड माना जा रहा है। और अब तीन दिन बाद नेपाल में स्थिति क्या है? 29 अगस्त की सुबह तक नेपाल में मृतकों की संख्या 626 तक पहुंच गई थी और करीब 2,500 लोग अब भी लापता बताए जा रहे थे। अलग-अलग इलाकों से शव मिलने और नई जानकारी सामने आने के कारण आंकड़े लगातार बदल रहे हैं। 90 हजार से ज्यादा लोग इस आपदा से प्रभावित बताए जा रहे हैं सबसे बड़ी परेशानी यह है कि कई जगहों पर सड़कें और पुल टूट चुके हैं। संचार व्यवस्था प्रभावित है और पहाड़ी रास्तों पर मलबा जमा है।

ऐसे में रेस्क्यू टीमों को उन इलाकों तक पहुंचने में काफी मुश्किल हो रही है जहां लोग फंसे हो सकते हैं। कई हाइड्रोपावर परियोजनाओं से जुड़े लोगों के बारे में भी जानकारी नहीं मिल पाई है। एक परियोजना की सुरंग में बड़ी संख्या में कर्मचारी फंसे होने की आशंका जताई गई है और वहां मलबा हटाकर लोगों तक पहुंचना बचाव दलों के लिए बड़ी चुनौती है। यानी तीन दिन गुजरने के बाद भी नेपाल के लिए सबसे बड़ी लड़ाई खत्म नहीं हुई है।

अब चुनौती सिर्फ पानी से निपटने की नहीं, बल्कि मलबे के नीचे दबे लोगों को तलाशने, शवों की पहचान करने, भोजन और दवाइयां पहुंचाने और टूटे संपर्क को बहाल करने की है। और इसी बीच एक और खतरा सामने आया है। ग्लेशियर टूटने के बाद ऊपर की तरफ मलबे से एक नई झील जैसी संरचना बन गई है। उसके पानी और प्राकृतिक अवरोध को लेकर विशेषज्ञों ने चिंता जताई है। अगर यह अवरोध अचानक टूटता है तो नीचे की ओर फिर तेज पानी आने का खतरा पैदा हो सकता है। इसी वजह से खराब मौसम और नए जलप्रवाह की आशंका के बीच बचाव अभियान को कुछ समय के लिए रोकना भी पड़ा।

यानी रेस्क्यू टीमों को एक तरफ मलबे में लोगों को तलाशना है और दूसरी तरफ खुद भी अचानक आने वाली बाढ़ से बचना है। अब बात करते हैं चीन की। जिस इलाके में यह आपदा आई, उसका एक हिस्सा चीन के तिब्बत क्षेत्र से भी जुड़ा है। वहां भी लोगों की मौत हुई है और बड़ी संख्या में लोग लापता बताए जा रहे हैं। चीन ने अपने प्रभावित क्षेत्र में राहत और बचाव अभियान चलाया है।

चीनी नेतृत्व ने भी हालात पर नजर बढ़ाई है। चीन के प्रधानमंत्री प्रभावित इलाके में पहुंचे और राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अधिकारियों को खोज एवं बचाव की योजना मजबूत करने और ग्लेशियर झीलों की निगरानी बढ़ाने के निर्देश दिए। चीनी रेस्क्यू टीम जब बाढ़ प्रभावित सीमा क्षेत्र तक पहुंची तो वहां भारी तबाही दिखाई दी।

चीन की तरफ से नेपाल के लिए आपातकालीन सामग्री और आर्थिक मदद भी जुटाई गई है। यानी यह आपदा सिर्फ नेपाल की समस्या नहीं रह गई है, बल्कि चीन की सीमा से जुड़े इलाकों में भी बड़ा मानवीय संकट बन चुकी है।

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अब अमेरिका की भूमिका भी समझिए

अमेरिका ने नेपाल के लिए 5 लाख डॉलर की मानवीय सहायता देने का ऐलान किया है। यह पैसा आपातकालीन आश्रय, राहत सामग्री और साफ पानी, स्वच्छता जैसी जरूरी सुविधाओं के लिए इस्तेमाल किया जाना है। इसके साथ अमेरिका ने एक आपदा प्रतिक्रिया सलाहकार को भी क्षेत्र में भेजने की बात कही है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी नेपाल को जरूरत के मुताबिक मदद देने की बात कही है। अमेरिकी दूतावास स्थानीय अधिकारियों के साथ मिलकर प्रभावित इलाकों में अमेरिकी नागरिकों का पता लगाने की कोशिश कर रहा है। क्योंकि इस आपदा में कई विदेशी नागरिक भी लापता हैं।

यानी दुनिया के कई देश अब नेपाल के साथ खड़े हैं। लेकिन नेपाल ने सामान्य खोज और बचाव के लिए हर विदेशी टीम को सीधे बुलाने के बजाय खास तकनीकी मदद पर जोर दिया है। सुरंगों में फंसे लोगों को निकालना, संचार व्यवस्था बहाल करना, शवों की पहचान करना और जरूरी ढांचा दोबारा खड़ा करना इस समय ज्यादा बड़ी जरूरत बन गई है।

अब सबसे अहम सवाल भारत का, नेपाल में आई इस बाढ़ का असर भारत तक क्यों पहुंच रहा है?

क्योंकि नेपाल से निकलने वाली कई नदियां भारत में प्रवेश करती हैं। भोटेकोशी और त्रिशूली नदी तंत्र आगे चलकर नारायणी से जुड़ता है, जिसे भारत में गंडक के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा बागमती और कोसी जैसी नदियां भी नेपाल से भारत आती हैं। इसलिए पहाड़ों में अचानक बढ़ा पानी और मलबा नीचे के मैदानी इलाकों के लिए चिंता का कारण बन जाता है।

उत्तर प्रदेश में कुशीनगर और महाराजगंज जैसे सीमावर्ती इलाकों पर नजर रखी जा रही है। कुशीनगर के खड्डा इलाके में गंडक नदी से तीन शव बरामद होने की जानकारी सामने आई है। प्रशासन उनकी पहचान और घटना के संबंध की जांच कर रहा है।

बिहार में भी गंडक नदी को लेकर निगरानी बढ़ाई गई

बिहार में भी गंडक नदी को लेकर निगरानी बढ़ाई गई है। पश्चिम चंपारण के वाल्मीकिनगर से लेकर गोपालगंज, सारण, मुजफ्फरपुर और वैशाली तक प्रशासन को सतर्क रहने के निर्देश दिए गए हैं। हालांकि फिलहाल पश्चिम चंपारण में गंडक बैराज का जलस्तर सामान्य सीमा के भीतर बताया गया है।

यानी अभी बिहार में स्थिति को सीधे बाढ़ जैसी आपात स्थिति कहना सही नहीं होगा। लेकिन खतरा पूरी तरह खत्म भी नहीं हुआ है। नेपाल के पहाड़ी इलाकों में अगर फिर भारी बारिश होती है या ऊपर बनी कोई प्राकृतिक झील अचानक टूटती है, तो नीचे की तरफ पानी का दबाव बढ़ सकता है।

इसी वजह से बिहार और यूपी के प्रशासन को नदी के जलस्तर पर लगातार नजर रखने और जरूरत पड़ने पर तुरंत राहत एवं बचाव व्यवस्था सक्रिय करने को कहा गया है।

अब बात भारत की मदद की

भारत ने नेपाल के लिए राहत सामग्री की कई खेप भेजी हैं। शुरुआती खेप में टेंट, कंबल, हाइजीन किट, सोलर लैंप और दवाइयां जैसी जरूरी चीजें शामिल थीं। बाद में राहत सामग्री की दूसरी और तीसरी खेप भी भेजी गई। 29 अगस्त तक भारत की तरफ से कुल करीब 62 टन राहत सामग्री तीन एयरलिफ्ट के जरिए नेपाल पहुंचाई जा चुकी थी।

सिर्फ सामान ही नहीं, भारत ने विशेषज्ञों की टीम भी भेजी है। 11 सदस्यीय मेडिकल और तकनीकी टीम नेपाल पहुंच चुकी है। इसमें डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ के साथ सुरंगों में बचाव अभियान का आकलन करने वाली टीम भी शामिल है। भारत ने बेली ब्रिज, तकनीकी विशेषज्ञ और NDRF की मदद की पेशकश भी की है।

भारत के लिए एक और बड़ी चिंता अपने नागरिक हैं

विदेश मंत्रालय के मुताबिक करीब 320 भारतीय नागरिक अभी भी संपर्क से बाहर हैं। हालांकि राहत की बात यह है कि कम से कम 84 भारतीयों को बचाया जा चुका है। इनमें त्रिशूली-1 परियोजना के कर्मचारी और तमिलनाडु के तीर्थयात्री शामिल हैं। कुछ भारतीयों को नेपाल से निकालकर भारत भी लाया गया है।

लेकिन अभी तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है। कई इलाकों में संचार व्यवस्था टूटी हुई है। कई परिवार अपने लोगों की तलाश में अस्पतालों और राहत केंद्रों के चक्कर लगा रहे हैं। चितवन में मिले 233 शवों में अभी तक सिर्फ चार की पहचान हो पाई है और बाकी की पहचान के लिए DNA सैंपल लेने की प्रक्रिया चल रही है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जमीन पर हालात कितने मुश्किल हैं।

एक तरफ राहत सामग्री पहुंच रही है, दूसरी तरफ टूटे पुल और सड़कें रास्ता रोक रही हैं। हेलीकॉप्टर से बचाव किया जा रहा है, लेकिन मौसम कई बार उड़ान रोक देता है। सुरंगों में फंसे लोगों तक पहुंचना अलग चुनौती है और ऊपर बनी झीलों से संभावित नए जलप्रवाह का खतरा अलग।

फिलहाल बिहार और उत्तर प्रदेश में प्रशासन अलर्ट पर है, गंडक समेत दूसरी नदियों के जलस्तर की निगरानी हो रही है और किसी भी अचानक बदलाव से निपटने की तैयारी रखी जा रही है।

Location :  New Delhi

Published :  30 August 2026, 9:08 AM IST

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