भारत कच्चा तेल तो जमा कर लेता है… लेकिन LPG क्यों नहीं? वजह जानकर चौंक जाएंगे आप, जानें भारत क्यों है पीछे

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से भारत में एलपीजी सप्लाई पर संकट गहराया है। कच्चे तेल के पर्याप्त भंडार के बावजूद गैस की कमी ने देश की ऊर्जा रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

Post Published By: Asmita Patel
Updated : 21 March 2026, 2:47 PM IST
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New Delhi: पश्चिम एशिया में जारी युद्ध अब सिर्फ सीमाओं तक सीमित नहीं रहा, इसका असर सीधे आम लोगों की रसोई तक पहुंच गया है। हालात ऐसे बन गए हैं जैसे किसी ने सप्लाई की नस पर ही वार कर दिया हो। एक तरफ मिसाइलों की गूंज है, दूसरी तरफ गैस सिलेंडर की कमी का डर और इसी के बीच भारत जैसे बड़े देश की ऊर्जा सुरक्षा पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जहां कच्चे तेल का भंडार सुरक्षित है, वहीं एलपीजी की सप्लाई अचानक डगमगाने लगी है।

20 दिन से ज्यादा जारी संघर्ष

पश्चिम एशिया में ईरान, इस्राइल और अमेरिका के बीच चल रहा संघर्ष अब 20 दिनों से ज्यादा हो चुका है। इस दौरान हमले और जवाबी कार्रवाई लगातार बढ़ती गई हैं। ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए न सिर्फ इस्राइल बल्कि पूरे क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। इसी के साथ उसने दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया, जिससे वैश्विक सप्लाई चेन पर बड़ा असर पड़ा है।

एलपीजी सप्लाई पर संकट

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा असर भारत पर एलपीजी सप्लाई के रूप में सामने आया है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, जिसमें 80-90% सप्लाई पश्चिम एशिया से ही आती है। जैसे ही होर्मुज जलडमरूमध्य बंद हुआ, एलपीजी की सप्लाई बाधित होने लगी। जहाजों की आवाजाही रुक गई, बीमा लागत बढ़ गई और कई जगहों पर डिलीवरी में देरी होने लगी। इसका सीधा असर देश के करोड़ों घरों तक पहुंचने वाली रसोई गैस पर पड़ा।

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कच्चे तेल की कमी नहीं, फिर भी गैस क्यों कम?

यह सवाल सबसे ज्यादा उठ रहा है कि जब भारत के पास कच्चे तेल का पर्याप्त भंडार है, तो फिर एलपीजी की कमी क्यों हो रही है। इसका जवाब भंडारण क्षमता और रणनीति में छिपा है। भारत ने वर्षों में कच्चे तेल के लिए मजबूत रणनीतिक भंडार तैयार किया है। विशाखापत्तनम, मंगलुरु और पाडुर जैसे स्थानों पर बड़े स्तर पर तेल स्टोर किया जाता है, जिससे देश के पास करीब 74 दिनों का कवर मौजूद है। इसके उलट एलपीजी के लिए भारत के पास ऐसा कोई बड़ा रणनीतिक भंडार नहीं है। कागजों पर भले ही 20-22 दिन का स्टॉक बताया जाता हो, लेकिन उसमें भी बॉटलिंग प्लांट का सीमित स्टॉक शामिल होता है। यानी सप्लाई रुकते ही असर तुरंत दिखने लगता है।

‘जस्ट-इन-टाइम’ मॉडल बना सबसे बड़ी कमजोरी

भारत का एलपीजी वितरण सिस्टम ‘जस्ट-इन-टाइम’ मॉडल पर काम करता है। यानी जैसे ही गैस आती है, उसे तुरंत उपभोक्ताओं तक पहुंचा दिया जाता है। इसमें लंबी अवधि के लिए स्टोरेज पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया।

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एलपीजी स्टोरेज क्यों नहीं बढ़ाया गया?

एलपीजी को स्टोर करना कच्चे तेल जितना आसान नहीं है। यह गैस प्रोपेन और ब्यूटेन का मिश्रण होती है, जिसे दबाव या बहुत कम तापमान में रखना पड़ता है। इसके लिए खास तरह के टैंक, पाइपलाइन और सुरक्षा सिस्टम की जरूरत होती है, जो बेहद महंगे होते हैं। इसके अलावा, भूमिगत गुफाओं में भी एलपीजी को सुरक्षित रखना मुश्किल होता है, क्योंकि दबाव के कारण संरचना को नुकसान पहुंच सकता है।

सरकार ने उठाए तात्कालिक कदम

मौजूदा संकट को देखते हुए सरकार ने तुरंत कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत रिफाइनरियों को निर्देश दिया गया है कि वे अन्य उत्पादों की बजाय एलपीजी उत्पादन को प्राथमिकता दें।

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  • New Delhi

Published : 
  • 21 March 2026, 2:47 PM IST

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