हिंदी
प्रतीकात्मक तस्वीर (Img: Google)
New Delhi: देश में स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती कीमतों ने आम आदमी की चिंता कई गुना बढ़ा दी है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) की हालिया सर्वेक्षण रिपोर्ट ने एक ऐसी तस्वीर पेश की है, जिसने मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों की मुश्किलों को खुलकर सामने ला दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले तीन दशकों में निजी अस्पतालों में इलाज का खर्च करीब दस गुना तक बढ़ चुका है।
अब बीमार पड़ना केवल शारीरिक परेशानी नहीं, बल्कि आर्थिक संकट का कारण भी बनता जा रहा है।
एनएसओ की ‘स्वास्थ्य पर घरेलू सामाजिक खपत’ से जुड़ी 80वें दौर की सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 1995-96 में निजी अस्पतालों में इलाज पर मरीजों का औसत जेब खर्च 4,822 रुपये था। लेकिन 2025 तक यही खर्च बढ़कर 50,508 रुपये पहुंच गया। यह आंकड़ा दिखाता है कि इलाज की लागत ने आम लोगों की आय वृद्धि को भी पीछे छोड़ दिया है।
वहीं सरकारी अस्पतालों में भी इलाज सस्ता नहीं रहा। यहां खर्च 2,138 रुपये से बढ़कर 6,631 रुपये तक पहुंच गया है। हालांकि सरकारी अस्पतालों में बढ़ोतरी निजी अस्पतालों के मुकाबले कम रही, लेकिन गरीब और निम्न आय वर्ग के लिए यह भी बड़ी चुनौती बनती जा रही है।
गर्मी में ट्रैवल का प्लान? इन गलतियों से बचें, वरना बिगड़ सकती है पूरी ट्रिप
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि सरकारी और निजी अस्पतालों के इलाज खर्च के बीच का अंतर लगातार बढ़ रहा है। पहले जहां निजी अस्पतालों का खर्च सरकारी अस्पतालों से लगभग दोगुना माना जाता था, वहीं अब यह अंतर सात गुना से अधिक हो गया है। इसका सीधा असर उन परिवारों पर पड़ रहा है, जिन्हें गंभीर बीमारी की स्थिति में मजबूरी में निजी अस्पतालों का सहारा लेना पड़ता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि महंगी दवाएं, आधुनिक तकनीक, निजी स्वास्थ्य क्षेत्र का व्यावसायीकरण और बीमा कंपनियों की नीतियां इस बढ़ते खर्च की बड़ी वजह हैं। कई परिवार इलाज के लिए कर्ज लेने या अपनी जमा पूंजी खत्म करने को मजबूर हो रहे हैं।
NEET UG 2026 की परीक्षा रद्द, CBI करेगी पेपर लीक की जांच, NTA ने कहा- जल्द जारी होगी नई तारीख
सर्वेक्षण की सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि पहली बार सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने वाले ग्रामीण मरीजों का जेब खर्च शहरी मरीजों से अधिक पाया गया। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों के सबसे निचले 20 प्रतिशत आय वर्ग के परिवारों पर इलाज का आर्थिक बोझ ज्यादा बढ़ा है।
विशेषज्ञ इसे ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की कमजोरी और बड़े शहरों पर निर्भरता का परिणाम मान रहे हैं। कई ग्रामीण परिवारों को इलाज के लिए दूर शहरों तक जाना पड़ता है, जिससे यात्रा, दवा और अन्य खर्च भी बढ़ जाते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, देश के अलग-अलग राज्यों में इलाज का खर्च एक समान नहीं है। सबसे अधिक और सबसे कम खर्च वाले राज्यों के बीच लगभग तीन गुना तक का अंतर दर्ज किया गया है। इससे साफ है कि स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और लागत राज्यों की नीतियों और सुविधाओं पर भी निर्भर करती है।
Location : New Delhi
Published : 12 May 2026, 1:23 PM IST