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RSS ने बदल दी बंगाल की सत्ता (Img: Google)
Kolkata: पश्चिम बंगाल की राजनीति में वर्ष 2026 का दिन इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया, जब शुभेंदु अधिकारी ने राज्य के पहले भाजपा मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि उस विचारधारा की जीत थी, जिसकी नींव दशकों पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने बंगाल की धरती पर रखी थी। जिस बंगाल को कभी वामपंथ और तृणमूल कांग्रेस का अभेद्य किला माना जाता था, वहां भाजपा की यह जीत कई राजनीतिक समीकरणों को बदलने वाली साबित हुई।
एक समय ऐसा था जब पश्चिम बंगाल में भाजपा का नाम लेना भी राजनीतिक हाशिए की बात मानी जाती थी। 2011 विधानसभा चुनाव में भाजपा का वोट शेयर महज 4.06 प्रतिशत था। 2016 में यह बढ़कर 10.16 प्रतिशत हुआ, लेकिन 2026 में पार्टी ने 45.8 प्रतिशत वोट शेयर हासिल कर सत्ता के शिखर तक पहुंचकर सभी को चौंका दिया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बदलाव अचानक नहीं हुआ। इसके पीछे संघ का बूथ स्तर तक फैला संगठन, वर्षों की रणनीति और सामाजिक समीकरणों पर की गई गहरी मेहनत शामिल रही।
बंगाल में RSS की जड़ें चुनावी राजनीति से कहीं ज्यादा पुरानी हैं। भारत विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों के बीच संघ ने राहत और सामाजिक सहायता के जरिए अपनी पैठ बनाई। सीमावर्ती जिलों में संघ की सक्रियता धीरे-धीरे सामाजिक विश्वास में बदल गई।
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इसी नेटवर्क ने आगे चलकर भाजपा के लिए मजबूत वोट बैंक तैयार किया। पहचान, सुरक्षा और विस्थापन जैसे मुद्दों ने बंगाल की राजनीति में हिंदुत्व आधारित विमर्श को जगह दिलाने में अहम भूमिका निभाई।
1951 में भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को संघ ने बंगाली गौरव और राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया। इससे भाजपा को “बाहरी पार्टी” कहने वाला नैरेटिव कमजोर पड़ने लगा। संघ ने बंगाली संस्कृति, भाषा और स्थानीय प्रतीकों को अपनाकर यह संदेश देने की कोशिश की कि भाजपा बंगाल की राजनीतिक और सांस्कृतिक धारा से अलग नहीं है। यही रणनीति बाद में भाजपा के विस्तार की सबसे बड़ी ताकत बनी।
1977 से 2011 तक बंगाल में वामपंथ का दबदबा रहा। वर्ग संघर्ष और मजदूर राजनीति के बीच पहचान आधारित राजनीति के लिए ज्यादा जगह नहीं थी। लेकिन जैसे-जैसे वामपंथ कमजोर हुआ संघ ने गांवों और कस्बों में अपनी सक्रियता बढ़ा दी।
उत्तर बंगाल, जंगलमहल और औद्योगिक इलाकों में संघ के स्वयंसेवकों ने बूथ स्तर पर नेटवर्क तैयार किया। स्थानीय नेताओं, असंतुष्ट कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों के जरिए भाजपा की पहुंच गांव-गांव तक बढ़ाई गई।
2026 चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की आक्रामक चुनावी रणनीति ने भाजपा के अभियान को नई ऊर्जा दी। CAA, सीमा सुरक्षा, भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा और बेरोजगारी जैसे मुद्दों को लगातार उठाया गया। इसके साथ ही मतुआ समुदाय को साधने की कोशिश भाजपा के लिए गेमचेंजर साबित हुई। महिला मतदाताओं और युवाओं में भी भाजपा को अपेक्षा से ज्यादा समर्थन मिला।
एक दशक से ज्यादा समय तक बंगाल की राजनीति पर मजबूत पकड़ रखने वाली तृणमूल कांग्रेस इस बार कई मोर्चों पर कमजोर नजर आई। पार्टी का वोट शेयर घटकर 40.8 प्रतिशत तक पहुंच गया, जबकि भाजपा ने ऐतिहासिक बढ़त हासिल कर ली।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि भ्रष्टाचार के आरोप, संगठनात्मक थकान और ग्रामीण इलाकों में बढ़ती नाराजगी ने टीएमसी को नुकसान पहुंचाया। वहीं भाजपा ने इसे अवसर में बदल दिया।
Location : Kolkata
Published : 12 May 2026, 9:33 AM IST