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चीन की युन्नान यूनिवर्सिटी (IMG: Pinterest)
New Delhi: समुद्र की गहराई में जहां सूरज की रोशनी लगातार कम होती जाती है, वहां सोलर पैनल से बिजली बनाने का विचार अब सिर्फ कल्पना नहीं रह गया है। चीन की युन्नान यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने समुद्र के भीतर सौर ऊर्जा हासिल करने की दिशा में अहम प्रयोग किया है। शोधकर्ताओं ने पेरोव्स्काइट आधारित फोटोवोल्टिक सिस्टम का करीब 10 मीटर की गहराई तक परीक्षण किया और दिखाया कि समुद्र के भीतर पहुंचने वाली नीली-हरी और कम रोशनी को भी बिजली में बदला जा सकता है। प्रयोग के दौरान सिस्टम ने बैटरियों को चार्ज किया और एक LED पैनल को भी बिजली दी।
समुद्र के अंदर सौर ऊर्जा पैदा करने की सबसे बड़ी चुनौती रोशनी की उपलब्धता है। पानी सूर्य की रोशनी के अलग-अलग रंगों को अलग-अलग मात्रा में सोखता है। लाल रंग की रोशनी पानी में अपेक्षाकृत जल्दी अवशोषित हो जाती है, जबकि अधिक नीली-हरी रोशनी गहराई तक पहुंचती है। करीब 10 मीटर नीचे पहुंचने तक उपलब्ध प्रकाश काफी कम हो जाता है। यही वजह है कि जमीन पर इस्तेमाल होने वाले सामान्य सिलिकॉन सोलर सेल समुद्र के भीतर उसी तरह प्रभावी नहीं हो सकते।
पेरोव्स्काइट ऐसे क्रिस्टलीय पदार्थ हैं, जिनके ऑप्टिकल और इलेक्ट्रॉनिक गुणों को जरूरत के अनुसार बदला जा सकता है। इस शोध में वैज्ञानिकों ने लेड-हैलाइड पेरोव्स्काइट सोलर सेल का इस्तेमाल किया। इसका बैंड गैप करीब 1.96 eV रखा गया, ताकि पानी के अंदर पहुंचने वाले नीले-हरे प्रकाश का बेहतर इस्तेमाल किया जा सके।
प्रयोगशाला में वैज्ञानिकों ने 10 मीटर की गहराई जैसी रोशनी वाली परिस्थितियां कृत्रिम रूप से तैयार कीं। इस परीक्षण में 0.0895 वर्ग सेंटीमीटर के छोटे सोलर सेल ने 34.71 प्रतिशत पावर कन्वर्जन एफिशिएंसी यानी PCE हासिल की। वहीं, बड़े 28.79 वर्ग सेंटीमीटर मॉड्यूल ने 29.40 प्रतिशत PCE हासिल की। खास बात यह है कि ये आंकड़े बहुत कम उपलब्ध रोशनी वाले वातावरण में हासिल किए गए। रिपोर्ट के अनुसार, 10 मीटर की गहराई जैसी परिस्थितियों में छोटे सेल की दक्षता सामान्य पूर्ण-सूर्य प्रकाश परीक्षण से भी अधिक रही, क्योंकि सेल को खास तौर पर उस सीमित स्पेक्ट्रम के लिए डिजाइन किया गया था जो पानी के अंदर पहुंचता है।
सिर्फ बिजली बनाना ही चुनौती नहीं थी। समुद्री पानी पेरोव्स्काइट जैसे पदार्थों के लिए मुश्किल वातावरण हो सकता है। पानी, दबाव, जंग और लंबे समय तक समुद्री वातावरण के संपर्क में रहने से सेल की क्षमता घट सकती है। इसके अलावा पेरोव्स्काइट में मौजूद लेड के संभावित रिसाव को लेकर भी सुरक्षा का सवाल है। वैज्ञानिकों ने सेल की स्थिरता बढ़ाने के लिए पॉलीहेक्सामेथिलीन गुआनिडीन हाइड्रोक्लोराइड यानी PHMG को क्रिस्टलीकरण एडिटिव के रूप में इस्तेमाल किया। इसके साथ सेल को कई सुरक्षा परतों में पैक किया गया।
डिवाइस की टिकाऊ क्षमता जांचने के लिए इसे सिम्युलेटेड समुद्री पानी में 10 मीटर की गहराई जैसी रोशनी में लंबे समय तक रखा गया। 1,000 घंटे तक लगातार डुबोए रखने के बाद भी सेल ने अपनी शुरुआती PCE का 99.58 प्रतिशत बरकरार रखा। शोधकर्ताओं की आगे की गणना में 25 डिग्री सेल्सियस पर ऐसी कृत्रिम रोशनी वाली परिस्थितियों में T80 लाइफ करीब 48,094 घंटे आंकी गई। T80 का मतलब वह समय है, जब डिवाइस अपनी शुरुआती प्रदर्शन क्षमता का 80 प्रतिशत बनाए रखता है।
शोध सिर्फ प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रहा। वैज्ञानिकों ने दक्षिण चीन सागर में वेइझोउ द्वीप के पास वास्तविक समुद्री पानी में भी सिस्टम का परीक्षण किया। इसके लिए पेरोव्स्काइट सोलर मॉड्यूल को एक अंडरवाटर रोबोट के साथ जोड़ा गया। रोबोट ने सिस्टम को 2, 6 और 10 मीटर की गहराई तक ले जाकर परीक्षण किया। दो घंटे की रोशनी के दौरान सिस्टम ने 2 मीटर की गहराई पर 1,416 mWh, 6 मीटर पर 752 mWh और 10 मीटर पर 324 mWh ऊर्जा बैटरियों में स्टोर की।
अगर इस तकनीक को आगे बड़े पैमाने पर विकसित किया जाता है, तो इसका इस्तेमाल समुद्र के भीतर लंबे समय तक काम करने वाले कम ऊर्जा वाले उपकरणों में किया जा सकता है। इनमें पानी के अंदर सेंसर, कैमरे, डिटेक्टर, संचार उपकरण और अंडरवाटर रोबोट शामिल हो सकते हैं।
Location : New Delhi
Published : 21 September 2026, 3:45 PM IST
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