नई दिल्ली में ऐतिहासिक ब्रिक्स महाकुंभ का आगाज: एक दशक बाद एक मंच पर दिखेंगे मोदी, पुतिन और जिनपिंग

नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में 11 देशों के नेता और 20 से अधिक राष्ट्राध्यक्ष हिस्सा ले रहे हैं। पीपीपी के आधार पर ब्रिक्स की अर्थव्यवस्था अमेरिका से तीन गुना बड़ी हो चुकी है। इस सम्मेलन में लोकल करेंसी में व्यापार, डिजिटल पेमेंट और ग्लोबल साउथ के मुद्दों पर मुख्य रूप से चर्चा हो रही है।

Updated : 12 September 2026, 9:09 AM IST
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New Delhi: नई दिल्ली का भारत मंडपम इन दिनों वैश्विक कूटनीति के केंद्र में तब्दील हो चुका है। 12 और 13 सितंबर 2026 को आयोजित हो रहे 18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन की मेजबानी भारत कर रहा है। इस महासम्मेलन में दुनिया की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि कैसे भारत की धरती पर वैश्विक मंच के समीकरण बदल रहे हैं। इस ऐतिहासिक आयोजन से न केवल भू-राजनीतिक बल्कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के नए आयाम भी तय हो रहे हैं।

सात साल बाद जिनपिंग का भारत दौरा और दस साल बाद त्रिमूर्ति का मिलन

इस सम्मेलन का सबसे बड़ा कूटनीति आकर्षण चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा है। वर्ष 2020 में गलवान घाटी में हुए संघर्ष के बाद से दोनों देशों के संबंधों में तनाव रहा है, ऐसे में शी जिनपिंग का सात साल बाद भारत आना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ आमने-सामने की मुलाकात होना बेहद अहम है। इसके अलावा, करीब दस साल के लंबे अंतराल के बाद भारतीय सरजमीं पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग एक साथ किसी बड़े मंच पर एक ही फ्रेम में नजर आएंगे। प्रधानमंत्री मोदी इस दौरान चीन के राष्ट्रपति, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन सहित कई अन्य प्रमुख विदेशी नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकों को भी अंजाम देंगे।

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वैश्विक दक्षिण की आवाज और 20 से अधिक देशों का महाजुटान

ब्रिक्स अब केवल पांच देशों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसमें हुए विस्तार ने इसका दायरा काफी बढ़ा दिया है। मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सऊदी अरब और इंडोनेशिया के जुड़ने के बाद अब यह 11 पूर्णकालिक सदस्यों का एक प्रभावशाली संगठन बन गया है। इस शिखर सम्मेलन में ब्रिक्स देशों के अलावा विशेष रूप से आमंत्रित राष्ट्रों के राष्ट्राध्यक्षों समेत 20 से अधिक देशों के नेता और प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं। इस विशाल आयोजन की सुरक्षा व्यवस्था को पुख्ता करने के लिए पूरी दिल्ली को एक किले और छावनी में तब्दील कर दिया गया है।

पश्चिमी देशों और डॉलर के वर्चस्व को चुनौती देती ब्रिक्स अर्थव्यवस्था

आर्थिक मोर्चे पर ब्रिक्स देशों ने पश्चिमी देशों और अमेरिका के प्रभुत्व को कड़ी टक्कर दी है। क्रय शक्ति समता (PPP) के मामले में ब्रिक्स देशों की संयुक्त अर्थव्यवस्था अब अमेरिका और पश्चिमी देशों के G7 समूह से आगे निकल चुकी है। वैश्विक जीडीपी में ब्रिक्स देशों की हिस्सेदारी अब 27 प्रतिशत से अधिक हो गई है, जबकि इसके मुकाबले यूरोपियन यूनियन की हिस्सेदारी महज 14 प्रतिशत के आसपास है। इस सम्मेलन में 'डी-डॉलरीकरण' यानी अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता को कम करने का मुद्दा प्रमुखता से छाया हुआ है। सदस्य देश आपस में व्यापार करने के लिए अमेरिकी डॉलर की जगह अपनी स्थानीय मुद्राओं (लोकल करेंसी) के इस्तेमाल को बढ़ावा देने और एक-दूसरे के ऑनलाइन पेमेंट सिस्टम को डिजिटल करेंसी के माध्यम से आपस में जोड़ने के एजेंडे पर तेजी से काम कर रहे हैं।

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भारत की संतुलित कूटनीति और सम्मेलन का मुख्य एजेंडा

इस दो दिवसीय महासम्मेलन का मुख्य एजेंडा सीमा विवादों को सुलझाना, लोकल करेंसी में व्यापार को बढ़ावा देना और डिजिटल पेमेंट सिस्टम को इंटीग्रेट करना है। यह मंच विकासशील देशों यानी 'ग्लोबल साउथ' की सशक्त आवाज बनकर उभर रहा है। हालांकि, इस मंच के रणनीतिक निहितार्थ भी कम दिलचस्प नहीं हैं। जहां एक ओर रूस और चीन इस मंच का इस्तेमाल अमेरिका विरोधी गुट के रूप में पेश करने की मंशा रखते हैं, वहीं दूसरी ओर भारत एक कुशल संतुलनकर्ता (Balancer) की भूमिका निभा रहा है। भारत एक तरफ अमेरिका के साथ अपने सामरिक और मजबूत रिश्तों को पूरी मजबूती से कायम रखे हुए है, तो वहीं दूसरी तरफ ब्रिक्स मंच के जरिए आर्थिक सहयोग, सुरक्षित सप्लाई चेन और ग्लोबल साउथ के लिए निष्पक्ष बाजार पहुंच को पुरजोर तरीके से बढ़ावा दे रहा है।

Location :  New Delhi

Published :  12 September 2026, 9:09 AM IST

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