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कर्नाटक की सियासत में मुख्यमंत्री पद को लेकर सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच जंग चल रही है। दल-बदल विरोधी कानून इस सियासी खेल में अहम भूमिका निभाता है। इस आर्टिकल में समझाया गया है कि कैसे दल-बदल विरोधी कानून विधायकों की राह को तय करता है और सरकार बनाने के खेल में क्या भूमिका निभाता है।
कर्नाटक सियासत में नया मोड़
Karnataka: कर्नाटक की राजनीति में इस समय मुख्यमंत्री पद के लिए दो दिग्गज नेताओं के बीच रस्साकशी चल रही है। एक तरफ सीएम सिद्धारमैया हैं, जिनकी स्थिति पार्टी के अंदर मजबूत मानी जाती है, तो दूसरी ओर डीके शिवकुमार, जिनकी भी अपनी पार्टी और विधायकों पर गहरी पकड़ है। कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद की यह जंग महज एक पद का संघर्ष नहीं है, बल्कि यह राजनीति के जटिल खेल का हिस्सा बन गई है। पिछले कुछ वर्षों में ऐसी सियासी हलचलों ने राज्य की राजनीति में उठापटक की है, जो न सिर्फ पार्टी के भीतर से बगावत का कारण बन सकती हैं, बल्कि विधायकों के दल-बदल के खेल को भी हवा दे सकती हैं।
कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद की जंग और पार्टी के भीतर की खींचतान का परिणाम अक्सर बागी विधायकों के उभरने के रूप में सामने आता है। इस प्रकार की राजनीतिक उठा-पटक अक्सर दल-बदल विरोधी कानून की परिभाषा और लागू होने के नियमों पर सवाल उठाती है। यह कानून यह सुनिश्चित करता है कि विधायक और सांसद अपनी पार्टी से बिना किसी कारण के इस्तीफा न दें या दूसरी पार्टी में शामिल न हों। लेकिन क्या यह कानून हर स्थिति में प्रभावी रहता है? क्या विधायकों और नेताओं के लिए किसी विशेष स्थिति में यह कानून ढील देता है?
भारत में "आया राम, गया राम" की कहावत राजनीति में नेताओं के दल बदलने की आदत को बयां करती है। इसका उदाहरण गया लाल नामक हरियाणा के एक विधायक की घटना में देखा जा सकता है। 1967 में गया लाल ने महज 9 घंटों में तीन बार पार्टी बदलकर इस कहावत को मशहूर किया। गया लाल की इस हरकत के बाद से ही दल-बदल विरोधी कानून का गठन किया गया ताकि नेताओं को अपनी राजनीतिक लाभ के लिए पार्टी बदलने से रोका जा सके।
दल-बदल विरोधी कानून, जिसे 1985 में भारत के संविधान में संशोधित किया गया, का उद्देश्य राजनीति में स्थिरता बनाए रखना है। इस कानून के तहत, कोई भी विधायक या सांसद अपने दल से त्यागपत्र नहीं दे सकता या दूसरी पार्टी में शामिल नहीं हो सकता जब तक उसकी पार्टी के दो-तिहाई सदस्य एक साथ पार्टी न बदल लें। इस कानून का मुख्य उद्देश्य उन नेताओं को रोकना है जो राजनीतिक लाभ के लिए बिना किसी वैध कारण के अपनी पार्टी बदलते हैं।
आमतौर पर दल-बदल विरोधी कानून एक विधायक को अयोग्य ठहराता है अगर वह अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में शामिल हो जाता है, लेकिन इस कानून में एक महत्वपूर्ण छूट भी है। यदि किसी राजनीतिक दल के दो-तिहाई सदस्य एक साथ किसी दूसरी पार्टी में शामिल हो जाते हैं, तो उन्हें इस कानून से छूट मिलती है। ऐसी स्थिति में, उन विधायकों की सदस्यता बनी रहती है और वे अयोग्य नहीं होते। इस स्थिति में पार्टी बदलने से विधायकों की विधायकी पर कोई असर नहीं पड़ता।
दल-बदल विरोधी कानून विधायकों के लिए एक जटिल कानूनी प्रक्रिया बन सकता है। यदि कोई विधायक अपनी पार्टी छोड़ता है या विपक्षी दल में शामिल होता है, तो उसे अयोग्य ठहराने का निर्णय विधानसभा अध्यक्ष या लोकसभा स्पीकर द्वारा लिया जाता है। अगर कोई विधायक इस फैसले से असहमत होता है, तो वह उच्च न्यायालय या सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सकता है। यही कारण है कि कर्नाटक में चल रही सियासी हलचलों के बीच विधायकों के दल बदलने के सवाल पर हमेशा कानूनी और राजनीतिक मोड़ आते हैं।
कर्नाटक में मुख्यमंत्री के पद पर विवाद और विधायक दलों के बगावत की परिस्थितियों के बीच, यदि किसी विधायक को अपनी सदस्यता बचानी है तो उसे अपनी पार्टी के दो-तिहाई विधायकों के साथ पाला बदलना होता है। इसके बाद, दल-बदल विरोधी कानून के तहत विधायकों की सदस्यता बनी रहती है और वे अपनी पार्टी बदलने के बावजूद अयोग्य नहीं होते। यही वह राजनीतिक खेल है, जो कर्नाटक जैसे राज्यों में अक्सर सियासी उठा-पटक का कारण बनता है।