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असली हैंडमेड और नकली काम में कैसे करें फर्क? (Img- Pinterest)
New Delhi: चिकनकारी हो, पारंपरिक कढ़ाई, फुलकारी या फिर जरी-जरदोजी का बारीक काम, भारतीय हस्तकला की गूंज पूरी दुनिया में है। अपनी अनोखी बनावट और समृद्ध इतिहास के कारण ये पारंपरिक परिधान हर किसी की पहली पसंद होते हैं। लेकिन बदलते वक्त के साथ ऑटोमेशन और आधुनिक मशीनों की मदद से बनने वाली कढ़ाई इतनी सटीक और आकर्षक दिखने लगी है कि असली हैंडमेड और मशीनमेड काम में फर्क करना आम खरीदार के लिए आसान नहीं रह गया है।
बाजार में कई बार मशीन से बने कपड़ों को हाथ की कारीगरी बताकर ऊंचे दामों पर बेच दिया जाता है। ऐसे में खरीदारी करते समय कुछ छोटी और बेहद महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान देकर आप असली हस्तकला की पहचान आसानी से कर सकते हैं।
हाथ से की गई कढ़ाई की सबसे बड़ी और पहली पहचान उसकी स्वाभाविक असमानता होती है। मशीन एक निश्चित प्रोग्रामिंग पर काम करती है, इसलिए वह बिल्कुल एक जैसा और परफेक्ट पैटर्न बना सकती है। इसके विपरीत, किसी कुशल कारीगर के हाथ से बने हर टांके में थोड़ा-बहुत अंतर और दूरी जरूर दिखाई देती है।
अगर आप किसी कढ़ाईदार कपड़े को खरीदने जा रहे हैं, तो सबसे पहले उसके टांकों को गौर से देखें। हाथ की कढ़ाई में कहीं धागे की दूरी थोड़ी ज्यादा या कम हो सकती है। यह कोई मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट या कमी नहीं, बल्कि असली हस्तकला की सबसे बड़ी पहचान होती है जो हर पीस को अनोखा बनाती है।
कढ़ाई की असलियत जानने की दूसरी सबसे अहम और जादुई ट्रिक है कपड़े को पलटकर देखना। ज्यादातर लोग सिर्फ सामने का चमकीला हिस्सा देखकर कपड़ा खरीद लेते हैं, लेकिन असली राज हमेशा पीछे छिपा होता है। हाथ से की गई कढ़ाई के पीछे धागों की हल्की उलझन, कारीगर द्वारा लगाई गई गांठें या थोड़ा असमान पैटर्न साफ नजर आता है। वहीं दूसरी तरफ, मशीनमेड कढ़ाई का पिछला हिस्सा भी बहुत ज्यादा साफ, धागे कटे हुए और पूरी तरह से व्यवस्थित दिखाई देता है।
तीसरी बात कढ़ाई की गहराई और उसके टेक्सचर से जुड़ी है। जरदोजी, आरी या चिकनकारी जैसी पारंपरिक और पुश्तैनी कढ़ाई में धागों, मोतियों, सितारों और अन्य सजावटी तत्वों का इस्तेमाल बेहद बारीकी से किया जाता है, जिससे डिजाइन में एक खास तरह का उभरा हुआ (3D) प्रभाव दिखाई देता है। मशीन से बनी कढ़ाई अक्सर काफी सपाट और बेजान दिखती है, जबकि हाथ की पारंपरिक कारीगरी में एक अलग तरह की जीवंतता, उभार और टेक्सचर हाथों से छूने पर महसूस होता है।
हैंडीक्राफ्ट एक्सपर्ट कैलाश पूजारी बताते हैं कि समय भी कढ़ाई की असलियत और शुद्धता का एक बड़ा संकेत देता है। किसी भी मुश्किल और बारीक डिजाइन को हाथ से सुई-धागे के जरिए तैयार करने में कारीगरों को कई दिन, कई सप्ताह और कभी-कभी महीनों तक हाड़-तोड़ मेहनत करनी पड़ती है।
ऐसे में अगर कोई दुकानदार बेहद भारी, घनी और विस्तृत कढ़ाई वाला कपड़ा बहुत ही कम समय और बेहद कम कीमत में तैयार होने का दावा कर रहा हो, तो उसके मशीनमेड होने की संभावना सबसे अधिक होती है। खरीदारी के दौरान अलग-अलग नमूनों की तुलना करना हमेशा फायदेमंद रहता है। यही वजह है कि असली हैंडमेड कढ़ाई केवल एक डिजाइन नहीं, बल्कि कारीगर की कला, धैर्य और वर्षों के अनुभव की जीती-जागती पहचान मानी जाती है।
Location : New Delhi
Published : 23 June 2026, 2:44 PM IST