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वैलेंटाइन डे कुछ लोगों के लिए खुशी नहीं बल्कि FOMO और दबाव क्यों बन जाता है? जानिए कैसे सोशल मीडिया, तुलना और रिश्तों की परफेक्ट इमेज प्यार को तनाव में बदल रही है और इससे कैसे बचा जा सकता है।
प्रतीकात्मक फोटो (Img Source: Google)
New Delhi: वैलेंटाइन डे का नाम सुनते ही सोशल मीडिया पर दिल, फूल, कपल फोटोज और परफेक्ट डेट की तस्वीरें छा जाती हैं। लेकिन हर किसी के लिए यह दिन रोमांस और खुशी का नहीं होता। कई लोगों के लिए वैलेंटाइन डे धीरे-धीरे एक ऐसा दिन बन गया है, जो प्यार से ज्यादा दबाव और FOMO (Fear of Missing Out) पैदा करता है।
आज के डिजिटल दौर में जब हर तरफ “परफेक्ट लव स्टोरी” दिखाई जाती है, तब बहुत से लोग खुद को पीछे छूटता हुआ महसूस करने लगते हैं।
FOMO वाला प्यार वह स्थिति है, जब कोई इंसान सच में किसी रिश्ते में होना नहीं चाहता, बल्कि सिर्फ इसलिए चाहता है क्योंकि उसे लगता है कि वह कुछ मिस कर रहा है। वैलेंटाइन डे पर यह भावना और तेज हो जाती है।
ऐसे सवाल मन में दबाव पैदा करते हैं, जो खुशी को चिंता में बदल देते हैं।
वैलेंटाइन वीक में इंस्टाग्राम और फेसबुक कपल पोस्ट्स से भर जाते हैं। महंगे गिफ्ट्स, सरप्राइज डेट्स और रोमांटिक कैप्शन देखकर ऐसा लगता है जैसे यही प्यार का सही पैमाना है। असल में यह सिर्फ हाइलाइट रील होती है, पूरी सच्चाई नहीं। लेकिन तुलना करने की आदत लोगों को यह महसूस करा देती है कि उनका जीवन अधूरा है।
हमारे समाज में वैलेंटाइन डे ने सिंगल होने को जैसे एक कमी बना दिया है।
कई लोग इस दिन सवालों और तानों से भी जूझते हैं।
यह सब बातें आत्मविश्वास को धीरे-धीरे कमजोर करती हैं और व्यक्ति खुद पर शक करने लगता है।
FOMO का असर सिर्फ सिंगल लोगों तक सीमित नहीं है।
कई कपल्स भी वैलेंटाइन डे पर खुश नहीं होते, क्योंकि उन पर “परफेक्ट दिखने” का दबाव होता है।
इस दबाव में रिश्ता एंजॉय करने की बजाय एक जिम्मेदारी बन जाता है।
असल प्यार किसी एक तारीख का मोहताज नहीं होता।
प्यार वो है जो रोज़ के छोटे पलों में दिखता है-
बातें करना, साथ समय बिताना, एक-दूसरे को समझना। वैलेंटाइन डे को जिंदगी का पैमाना बना लेना खुद के साथ नाइंसाफी है।
याद रखें, अकेले होना और अकेलापन दो अलग चीजें हैं।