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रामनगर में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के नेतृत्व में वन ग्रामों को राजस्व गांव घोषित करने और ग्रामीणों को जमीन का मालिकाना हक दिलाने की मांग को लेकर पदयात्रा निकाली गई। “जल-जंगल-जमीन हमारी” के नारों के साथ निकली इस पदयात्रा में बड़ी संख्या में ग्रामीण और जनप्रतिनिधि शामिल हुए।
रामनगर में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की पदयात्रा
Ramnagar: रामनगर की सड़कों पर गुरुवार को अचानक राजनीतिक हलचल तेज हो गई। हाथों में तख्तियां, बैनर और “जल-जंगल-जमीन हमारी” के गूंजते नारे… सैकड़ों ग्रामीण और जनप्रतिनिधि सड़कों पर उतर आए। इस भीड़ के बीच पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत भी मौजूद थे, जो वन ग्रामों को राजस्व गांव घोषित करने और ग्रामीणों को जमीन का मालिकाना हक दिलाने की मांग को लेकर पदयात्रा कर रहे थे। सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए रावत ने कहा कि आज गरीबों की जमीनों के साथ अन्याय हो रहा है और अगर जल्द फैसला नहीं लिया गया तो यह आंदोलन और बड़ा रूप ले सकता है।
रामनगर में निकाली गई इस पदयात्रा में वन ग्रामों से बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल हुए। लोगों ने हाथों में बैनर और तख्तियां लेकर सरकार के खिलाफ नारे लगाए और अपनी मांगों को जोरदार तरीके से उठाया। ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से वन क्षेत्रों में रहने के बावजूद उन्हें जमीन का मालिकाना हक नहीं मिला है। इससे उनके सामने कई तरह की समस्याएं खड़ी होती हैं। न तो वे जमीन पर स्थायी निर्माण कर सकते हैं और न ही सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ उन्हें मिल पाता है।
यह पदयात्रा रामनगर शहर के विभिन्न मार्गों से होकर गुजरी। रास्ते भर “धामी सरकार होश में आओ”, “वन ग्रामों को मालिकाना हक दो” और “जल-जंगल-जमीन हमारी” जैसे नारे गूंजते रहे। इस दौरान कई स्थानीय जनप्रतिनिधि और सामाजिक कार्यकर्ता भी पदयात्रा में शामिल हुए। रामनगर ब्लॉक प्रमुख मंजू नेगी, ज्येष्ठ ब्लॉक प्रमुख संजय नेगी सहित कई गांवों के प्रतिनिधि भी इस आंदोलन का हिस्सा बने।
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पदयात्रा अंत में रामनगर तहसील परिसर पहुंचकर समाप्त हुई। यहां पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और ग्रामीणों के प्रतिनिधिमंडल ने एसडीएम को ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में वन ग्रामों को राजस्व गांव घोषित करने और ग्रामीणों को जमीन का मालिकाना हक देने की मांग की गई। साथ ही सरकार से जल्द इस दिशा में ठोस निर्णय लेने की अपील की गई।
इस मौके पर पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि आज सरकार गरीबों की जमीनों के साथ अन्याय कर रही है। रावत ने आरोप लगाया कि आपदा पीड़ितों और भूमिहीन लोगों को जमीन देने के बजाय उनकी जमीनों को ही खत्म किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि पहले एक सोच थी जिसके तहत मालधन, बिंदुखत्ता और रामनगर के पुछड़ी जैसे क्षेत्रों में गांव बसाए गए थे, लेकिन आज उस सोच को आगे बढ़ाने की जरूरत है।
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हरीश रावत ने कहा कि जब उनकी सरकार थी, तब वन ग्रामों को राजस्व गांव बनाने की प्रक्रिया शुरू की गई थी। उन्होंने बताया कि उस समय कैबिनेट में एक प्रस्ताव भी लाया गया था, जिसमें 12 श्रेणियों की जमीनों को वर्गीकृत करते हुए कई गांवों को मालिकाना हक देने की बात कही गई थी। इन गांवों में इंदिरा गांव, हरिराम आर्य गांव सहित पहाड़ से लेकर मैदानी क्षेत्रों तक कई गांव शामिल थे।
हरीश रावत ने साफ कहा कि जब तक वन ग्रामों को उनका अधिकार नहीं मिलेगा, तब तक यह लड़ाई जारी रहेगी। उन्होंने कहा कि यह आंदोलन किसी राजनीतिक लाभ के लिए नहीं बल्कि उन हजारों परिवारों के अधिकारों के लिए है जो वर्षों से वन क्षेत्रों में रहकर भी अपनी जमीन के मालिक नहीं बन पाए हैं।