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सेक्टर-150 में लोटस ग्रीन बिल्डर का एक अधूरा मॉल बना हुआ है। उसके खुले बेसमेंट में लंबे समय से पानी भरा हुआ था और सुरक्षा के नाम पर कोई बैरिकेडिंग या चेतावनी बोर्ड तक नहीं लगाया गया था।
IAS Lokesh M
Noida: नोएडा में इंजीनियर युवराज मेहता की डूबकर हुई मौत बेहद दुखद और झकझोर देने वाली थी। योगी सरकार ने तेजी दिखाते हुए नोएडा अथॉरिटी के सीईओ डॉ. लोकेश एम को हटा भी दिया। कार्रवाई बड़ी हो सकती है, लेकिन असली सवाल ये है कि क्या इससे पूरी जवाबदेही तय हो गई या फिर सिस्टम ने सबसे आसान निशाना चुन लिया? खैर लोकेश एम जुलाई 2023 में नोएडा अथॉरिटी की कमान संभालने आए थे।
क्या लोकेश एम जिम्मेदार थे?
यदि सरकार की दृष्टि में युवराज की मौत के लिए नोएडा अथॉरिटी सीधे तौर पर दोषी है तो यह स्पष्टीकरण जरूरी है कि अथॉरिटी के प्रमुख यानी लोकेश एम ही इस हादसे के अकेले ज़िम्मेदार कैसे बने? ये बात सब जानते हैं प्राधिकरण में निर्णय लेने की प्रक्रिया कई स्तरों से गुजरती है। ऐसे में सीईओ को हटाना एक तेज़ राजनीतिक और प्रशासनिक निर्णय भले हो, पर सवाल उठता है कि बाकी वे स्तर, जहां निगरानी, अनुमति, सुरक्षा और असल कार्रवाई सुनिश्चित होती है। वे अभी भी जांच के दायरे से बाहर क्यों हैं? क्या वे इस मामले के सीधे जिम्मेदार थे?
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संविदा JE की बलि और बीच के किरदारों का गायब होना
इस मामले में सबसे तेज़ अगला एक्शन ट्रैफिक सेल के संविदा JE नवीन कुमार की सेवा समाप्त कर देना रहा। संविदा अधिकारियों पर कार्रवाई होना नोएडा अथॉरिटी में कोई नई बात नहीं, लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सवाल है कि सीईओ और संविदा इंजीनियर के बीच के दर्जनों निर्णयकर्ता कौन थे? प्राधिकरण की फाइलों, अनुमतियों और निगरानी प्रक्रियाओं में ये बीच के किरदार अक्सर सबसे ताकतवर होते हैं, लेकिन इस घटना में वे पूरी तरह ओझल हैं।
बीच की परतों पर चुप्पी क्यों?
किसी भी प्राधिकरण में सीईओ और संविदा इंजीनियर के बीच कई अफसर, कई नोटिंग, कई लेवल, कई विभाग, कई फाइलें होती हैं। प्लानिंग, बिल्डिंग, ट्रैफिक, ग्रुप हाउसिंग, सर्वे, NOC सबकी भूमिका अलग होती है। मगर कार्रवाई सबसे पहले संविदा JE पर हुई और सबसे ऊपर सीईओ को हटाया गया। बीच के किरदार कहां गए? ये वही परतें हैं जो फाइल रोक भी सकती हैं, बढ़ा भी सकती हैं। सालों तक लटकाए भी रख सकती हैं।
सवालों के घेरे में रेस्क्यू एजेंसियां
सबसे बड़ा सवाल ये है कि युवराज उस वक्त जिंदा थे। मौके पर कमिश्नरेट पुलिस, दमकल और SDRF की टीमें मौजूद थीं। ये तीनों रेस्क्यू एजेंसियां ट्रेनिंग और उपकरणों के दम पर खड़ी होती हैं। फिर क्यों एक खुले बेसमेंट में पानी में घिरे इंसान को निकाला नहीं जा सका? क्या केवल अथॉरिटी की निगरानी कमी थी या रेस्क्यू सिस्टम भी फेल हुआ? ग्रामीणों वाला एक तंज में कहे तो “गांव में होता तो गांव वाले बचा लेते।”
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क्या है मामला?
सेक्टर-150 में लोटस ग्रीन बिल्डर का एक अधूरा मॉल बना हुआ है। उसके खुले बेसमेंट में लंबे समय से पानी भरा हुआ था और सुरक्षा के नाम पर कोई बैरिकेडिंग या चेतावनी बोर्ड तक नहीं लगाया गया था। रविवार देर रात युवा इंजीनियर युवराज मेहता अपनी कार के साथ उसी बेसमेंट में फंस गए। पानी ज्यादा होने और अंधेरा होने की वजह से वे बाहर नहीं निकल पाए और डूबकर उनकी मौत हो गई।
एसआईटी गठित
घटना के वक्त मौके पर दमकल, पुलिस और SDRF टीमें मौजूद थीं लेकिन युवराज को जिंदा निकालने में देरी पर सवाल उठे। इधर, बिल्डर की जवाबदेही, प्राधिकरण की निगरानी और रेस्क्यू एजेंसियों की तैयारी पर भी गंभीर आरोप लगे। मामला बढ़ा तो सरकार ने संज्ञान लिया और जांच के लिए एसआईटी गठित कर दी।