गोरखपुर: खजनी तहसील में क्यों बढ़ने लगी किसानों की मुश्किलें, सामने आया चौंकाने वाला सच

खजनी तहसील में शासन-प्रशासन की लापरवाही एक बार फिर किसानों की मुश्किलें बढ़ा रही है। पढ़िए डाइनामाइट न्यूज़ की पूरी रिपोर्ट

गोरखपुर: खजनी तहसील में शासन-प्रशासन की लापरवाही एक बार फिर किसानों की मुश्किलें बढ़ा रही है। तहसील का सबसे अहम पद — माल बाबू — लंबे समय से खाली पड़ा है और इसका खामियाजा भुगत रहे हैं आम लोग, खासकर किसान। तहसील में फाइलों की रफ्तार थम गई है और कामकाज हल्का लेखपाल के भरोसे है, जो पहले से ही अपने कार्यभार में दबा हुआ है।

डाइनामाइट न्यूज़ संवाददाता के मुताबिक, स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि बिना "सुविधा शुल्क" के एक भी फाइल आगे नहीं बढ़ रही। ख़जनी और आसपास के गांवों से आने वाले किसानों को बार-बार तहसील के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। एक पीड़ित किसान ने कहा, "लेखपाल साहब हल्के में नहीं आते, और तहसील में फाइल तब तक नहीं हिलती जब तक जेब से कुछ न निकले।"

दोहरे काम का बोझ, लेकिन जवाबदेही का अभाव

माल बाबू की जिम्मेदारियां जबरन हल्का लेखपाल निभा रहा है, जिससे दोनों ओर से काम प्रभावित हो रहा है। लेकिन तहसील में लेखपाल का मिलना ही मुश्किल है। नतीजा – किसानों को अपनी भूमि से जुड़े छोटे-छोटे कामों के लिए हफ्तों चक्कर काटने पड़ रहे हैं।

सूत्रों की मानें तो तहसील कार्यालय में माल बाबू के न होने से जो खालीपन आया, उसे कुछ लोग अपने निजी लाभ के लिए भुना रहे हैं। फाइलें आगे तभी बढ़ती हैं जब जेब से पैसा निकले। हैरानी की बात ये है कि इस पूरे मामले में जिम्मेदार अधिकारी चुप्पी साधे बैठे हैं। खजनी के लेखाधिकारी ने सफाई दी है कि "काम न रुके, इसके लिए वैकल्पिक व्यवस्था की गई है।" लेकिन किसानों की हकीकत कुछ और बयां कर रही है। साफ है कि यह व्यवस्था पूरी तरह नाकाम साबित हो रही है।

किसानों की हुंकार — “अब नहीं सहेंगे बेबसी!”

ग्रामीणों और किसानों की मांग है कि माल बाबू के रिक्त पद को अविलंब भरा जाए। साथ ही लेखपाल को उसके मूल कार्यों पर केंद्रित किया जाए ताकि राजस्व से जुड़े काम तेजी से और पारदर्शिता के साथ पूरे हों। क्या जिला प्रशासन और राजस्व विभाग इस गंभीर अव्यवस्था की सुध लेंगे? या फिर किसान यूं ही "सुविधा शुल्क" की भेंट चढ़ते रहेंगे? अब वक्त है जवाबदेही तय करने का, ताकि खजनी तहसील में व्यवस्था फिर से पटरी पर लौटे और लोगों को इंसाफ मिल सके।

यह केवल एक तहसील की बात नहीं, यह ग्रामीण भारत की उस हकीकत की झलक है, जहां कुर्सियां खाली हैं लेकिन जेबें भरी जा रही हैं। अब देखना यह है कि इस गूंगी व्यवस्था को आवाज कौन देगा — जनता या शासन?

 

Location : 
  • Gorakhpur

Published : 
  • 22 May 2025, 1:40 PM IST

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