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करीब 30 साल पुराने मतदान केंद्र मारपीट मामले में कांग्रेस नेता राज बब्बर को बड़ी राहत मिली है। एमपी-एमएलए कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को रद्द करते हुए उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया है।
30 साल पुराने केस में राज बब्बर बरी
Lucknow: करीब 30 साल पहले का एक चुनावी दिन, एक मतदान केंद्र और अचानक भड़की हिंसा, यह मामला लंबे समय तक न्यायालय की फाइलों में उलझा रहा। आरोप थे मारपीट के, दबाव बनाने के और चुनाव प्रक्रिया में बाधा डालने के। लेकिन अब इस कहानी में ऐसा मोड़ आया है, जिसने पूरे मामले की दिशा ही बदल दी है। अदालत ने सबूतों और दलीलों के आधार पर उस फैसले को पलट दिया, जिसमें सजा सुनाई गई थी। इस फैसले के साथ ही कांग्रेस नेता राज बब्बर को बड़ी राहत मिल गई है और एक लंबे कानूनी संघर्ष का अंत हो गया है।
एमपी-एमएलए कोर्ट के विशेष न्यायाधीश हरबंस नारायण ने इस मामले में अहम फैसला सुनाते हुए राज बब्बर को सभी आरोपों से बरी कर दिया। कोर्ट ने निचली अदालत के उस आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसमें उन्हें दो साल की सजा और जुर्माना सुनाया गया था।
यह मामला साल 1996 के विधानसभा चुनाव के दौरान का है। उस समय राज बब्बर समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी थे। दो मई 1996 को मतदान अधिकारी कृष्ण सिंह राणा ने थाना वजीरगंज में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में कहा गया कि मतदान केंद्र संख्या 192/103 के बूथ पर मतदान खत्म होने के बाद जब वह बाहर जा रहे थे, तभी राज बब्बर अपने समर्थकों के साथ वहां पहुंचे।
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आरोप लगाया गया कि उन्होंने फर्जी मतदान का आरोप लगाते हुए विवाद शुरू किया और फिर मारपीट की। इस घटना में मतदान अधिकारी और अन्य लोगों को चोटें आईं। मौके पर मौजूद अन्य अधिकारियों और पुलिसकर्मियों ने बीच-बचाव कर स्थिति को संभाला।
पुलिस ने मामले की जांच के बाद 23 सितंबर 1996 को राज बब्बर और अरविंद यादव के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। मामले में भारतीय दंड संहिता की कई धाराएं लगाई गई थीं, जिनमें धारा 143, 332, 353 और 323 शामिल थीं। कोर्ट ने इन धाराओं के तहत सुनवाई करते हुए पहले दोनों आरोपियों को तलब किया। हालांकि सुनवाई के दौरान सह-आरोपी अरविंद यादव की मृत्यु हो गई, जिसके चलते उनके खिलाफ मामला समाप्त कर दिया गया। इसके बाद 7 मार्च 2020 को राज बब्बर के खिलाफ आरोप तय किए गए।
7 जुलाई 2022 को एमपी-एमएलए कोर्ट के विशेष एसीजेएम अंबरीश श्रीवास्तव ने राज बब्बर को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई थी। कोर्ट ने उन्हें अलग-अलग धाराओं में सजा दी थी, जिसमें दो साल की कैद और कुल 6500 रुपये का जुर्माना शामिल था। इस फैसले के बाद यह मामला फिर से चर्चा में आ गया था और राजनीतिक हलकों में भी इसकी गूंज सुनाई दी थी।
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निचली अदालत के फैसले के खिलाफ राज बब्बर ने सत्र न्यायालय में अपील दाखिल की थी। इसी अपील पर सुनवाई करते हुए विशेष न्यायाधीश हरबंस नारायण ने मामले की दोबारा जांच की। सभी गवाहों के बयान, साक्ष्यों और कानूनी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को गलत ठहराया और उसे रद्द कर दिया। इसके साथ ही राज बब्बर को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।