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जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हुए “रेल रोको” मामले में सपा विधायक समरपाल सिंह समेत सभी आरोपितों को मुरादाबाद कोर्ट ने दोषमुक्त कर दिया। मामला साल 2011 से चल रहा था।
साल 2011 में हुए रेल रोको आंदोलन
Moradabad: केंद्र सरकार से जाट समाज को आरक्षण देने की मांग को लेकर साल 2011 में हुए रेल रोको आंदोलन से जुड़े एक बड़े मामले में कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। इस मामले में आरोपित बनाए गए सपा विधायक चौधरी समरपाल सिंह समेत सभी आरोपितों को मुरादाबाद की अदालत ने दोषमुक्त कर दिया है। यह मामला लंबे समय से अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट संख्या एक में विचाराधीन था।
काफूरपुर स्टेशन पर हुआ था रेल रोको आंदोलन
पूरा मामला अमरोहा जिले के काफूरपुर रेलवे स्टेशन से जुड़ा है। पांच मार्च 2011 को जाट समाज ने आरक्षण की मांग को लेकर यहां अनिश्चितकालीन रेल रोको आंदोलन शुरू किया था। आंदोलन का नेतृत्व उस समय जाट आरक्षण संघर्ष समिति के अध्यक्ष यशपाल मलिक कर रहे थे। देखते ही देखते आंदोलन ने उग्र रूप ले लिया और हजारों की संख्या में लोग रेलवे ट्रैक पर बैठ गए।
15 दिन तक पूरी तरह ठप रहा रेल संचालन
आंदोलन के दौरान हालात इतने बिगड़ गए थे कि रेलवे ट्रैक पर प्रदर्शनकारियों ने अपनी गाय-भैंसें तक बांध दी थीं। वहीं अस्थायी रसोई बनाकर खाना पकाया जा रहा था। इसका असर सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि देशभर के रेल यातायात पर पड़ा। लगातार 15 दिनों तक ट्रैक जाम रहने से यात्रियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा।
हाई कोर्ट के आदेश पर खाली हुआ था ट्रैक
स्थिति बिगड़ने पर मामला हाई कोर्ट तक पहुंचा। न्यायालय के आदेश के बाद 19 मार्च 2011 को प्रशासन ने काफूरपुर रेलवे ट्रैक को खाली कराया। इसके बाद हाई कोर्ट के निर्देश पर जाट आरक्षण संघर्ष समिति के तत्कालीन अध्यक्ष यशपाल मलिक समेत करीब 1500 लोगों के खिलाफ रेलवे एक्ट और अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया था।
विधायक समरपाल सिंह भी थे आरोपित
इसी मामले में नौगावां सादात से सपा विधायक चौधरी समरपाल सिंह का नाम भी आरोपितों की सूची में शामिल था। केस की सुनवाई मुरादाबाद की अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट संख्या एक में चल रही थी। बुधवार को कोर्ट ने यशपाल मलिक, उमेद सिंह, विजयपाल सिंह, समरपाल सिंह, डॉ. धीरेंद्र सिंह समेत सभी नामजद आरोपितों को दोषमुक्त कर दिया।
कोर्ट से मिली राहत
कोर्ट के फैसले के बाद सभी आरोपितों को बड़ी राहत मिली है। करीब 14 साल पुराने इस मामले में अदालत ने यह साफ कर दिया कि आरोप साबित नहीं हो सके, जिसके चलते सभी को बरी किया गया।