मुरादाबाद में तेंदुओं का आतंक: 22 दिन में 3 महिलाओं को नोच-नोचकर खाया, बच्चों ने स्कूल जाना छोड़ा

मुरादाबाद में तेंदुओं का आतंक बढ़ता जा रहा है। 22 दिनों में 3 महिलाओं की मौत और 20 से ज्यादा किसानों के घायल होने के बाद करीब 50 गांवों में दहशत है। वन विभाग ने 29 पिंजरे लगाए हैं और 11 तेंदुए पकड़े जा चुके हैं, लेकिन हमले अब भी जारी हैं।

Post Published By: Mayank Tawer
Updated : 27 August 2026, 7:52 AM IST
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Moradabad News: जिम कॉर्बेट के बफर जोन से सटी मुरादाबाद की सीमा में तेंदुओं की मौजूदगी कोई नई बात नहीं है, लेकिन पिछले 22 दिनों में जिस तरह इंसानों पर हमले हुए हैं, उसने पूरे इलाके को दहला दिया है। तेंदुए अब जंगल और खेतों तक सीमित नहीं दिख रहे, बल्कि इंसानी बस्तियों और हाईवे के आसपास भी नजर आने लगे हैं। 22 दिनों में तीन महिलाओं की मौत हो चुकी है, जबकि 20 से ज्यादा किसान तेंदुओं के हमले में घायल हुए हैं। करीब 50 गांवों के एक लाख लोग दहशत में हैं। हालात ऐसे हैं कि मंदिर-मस्जिदों से एनाउंसमेंट कर लोगों को खेतों में अकेले न जाने की चेतावनी दी जा रही है।

बच्चों की पढ़ाई पर भी पड़ा असर

तेंदुओं के डर का असर अब रोजमर्रा की जिंदगी पर दिखाई देने लगा है। ग्रामीणों ने बच्चों को स्कूल भेजना तक बंद कर दिया है। खेती और पशुपालन पर निर्भर परिवारों के सामने सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि चारा लाने और खेतों में काम करने के लिए बाहर निकलना जरूरी है, लेकिन हर कदम पर तेंदुए के हमले का डर बना हुआ है।

29 पिंजरे लगाए, 11 तेंदुए पकड़े

वन विभाग ने तेंदुओं को पकड़ने के लिए इलाके में 29 पिंजरे लगाए हैं। विभाग के अधिकारी करीब 50 एक्सपर्ट्स के साथ कैंपिंग और गश्त कर रहे हैं। अब तक एक शावक समेत 11 तेंदुओं को पकड़ा जा चुका है। तेंदुओं की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए थर्मल ड्रोन की भी मदद ली जा रही है। इसके बावजूद हमलों की घटनाएं थम नहीं रही हैं।

मुरादाबाद के DFO डॉ. विनय कुमार पांडेय के मुताबिक इलाके में 100 से ज्यादा तेंदुए होने का अनुमान है। उनका कहना है कि उत्तराखंड से सटा यह क्षेत्र तेंदुओं का पारंपरिक इलाका रहा है। पहले यहां घास के मैदान और घना जंगल था, जहां इंसानों की आवाजाही कम रहती थी।

गन्ने के खेत बने तेंदुओं का ठिकाना

DFO के मुताबिक समय के साथ घास के मैदानों की जगह गन्ने की खेती ने ले ली। इससे तेंदुओं को छिपने के लिए खेतों में बेहतर जगह मिल गई। इस साल बारिश कम होने की वजह से बाढ़ भी नहीं आई। आमतौर पर बाढ़ के दौरान किसानों का जंगल और गन्ने के खेतों में जाना कम हो जाता था, जिससे इंसान और तेंदुए आमने-सामने नहीं आते थे। इस बार किसानों की खेतों में आवाजाही जारी रही और टकराव बढ़ गया।

बिना उकसावे गर्दन पर हमला क्यों?

पिछले 22 दिनों की घटनाओं में एक बात खास तौर पर सामने आई है कि कई हमलों में तेंदुओं ने सीधे इंसानों की गर्दन को निशाना बनाया। एक्सपर्ट्स के मुताबिक सामान्य परिस्थितियों में तेंदुए इंसानों से बचने की कोशिश करते हैं।

DFO डॉ. विनय कुमार पांडेय का कहना है कि वन विभाग एक्सपर्ट्स की मदद से तेंदुओं के व्यवहार को समझने की कोशिश कर रहा है। उनका मानना है कि इंसान को अचानक करीब आता देखकर तेंदुआ खुद को असुरक्षित महसूस कर सकता है और अपनी सुरक्षा में हमला कर सकता है।

छोटी सी आड़ में भी छिप जाता है तेंदुआ

फॉरेस्ट एक्सपर्ट्स के मुताबिक तेंदुए को ट्रैक करना आसान नहीं है। वह अपने शरीर को जमीन से इतना सटा लेता है कि छोटी सी झाड़ी, पत्थर या कबाड़ की आड़ में भी नजर नहीं आता। खुले मैदान में भी अगर वह जमीन से चिपककर बैठ जाए तो सामने होने के बावजूद उसे पहचानना मुश्किल हो सकता है। यही वजह है कि थर्मल ड्रोन और लगातार निगरानी के बावजूद तेंदुए का पता लगाना चुनौती बना हुआ है।

शहर और हाईवे तक पहुंचा खतरा

तेंदुओं की दहशत फिलहाल उत्तराखंड से सटे करीब 50 गांवों में सबसे ज्यादा है, लेकिन अब इसका दायरा बढ़ता दिख रहा है। ठाकुरद्वारा और डिलारी के बाद कांठ और छजलैट क्षेत्र में भी तेंदुए देखे गए हैं। दिल्ली-लखनऊ नेशनल हाईवे के पास TMU अंडरपास में भी तेंदुआ नजर आने की बात सामने आई है।

ग्रामीण बोले- खेती करें या जान बचाएं?

ग्रामीण मिथिलेश का कहना है कि गांव वालों की जिंदगी खेती और पशुपालन पर निर्भर है। चारा लेने या खेतों में जाने के लिए भी जान जोखिम में डालनी पड़ रही है। वहीं मनीषा ने आरोप लगाया कि कई पिंजरों में पर्याप्त चारा नहीं रखा जा रहा, जिससे तेंदुए पिंजरे तक तो पहुंचते हैं लेकिन अंदर नहीं जाते। ग्रामीणों का कहना है कि कई जगह वे खुद पिंजरों की निगरानी कर रहे हैं। उनकी मांग है कि तेंदुओं को जल्द पकड़ा जाए, ताकि गांवों में फैली दहशत खत्म हो सके।

Location :  Moradabad

Published :  27 August 2026, 7:52 AM IST

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