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गोला थाना क्षेत्र से एक गंभीर मामला सामने आया है, जहां पीड़िता की तहरीर पर पुलिस ने पूरे 11 दिन बाद पति के खिलाफ तीन तलाक, मारपीट, अप्राकृतिक संबंध और जान से मारने की धमकी जैसे संगीन आरोपों में एफआईआर दर्ज की।
गोरखपुर में पति की हैवानियत
Gorakhpur: गोला थाना क्षेत्र से एक गंभीर मामला सामने आया है, जहां पीड़िता की तहरीर पर पुलिस ने पूरे 11 दिन बाद पति के खिलाफ तीन तलाक, मारपीट, अप्राकृतिक संबंध और जान से मारने की धमकी जैसे संगीन आरोपों में एफआईआर दर्ज की। इस देरी को लेकर स्थानीय स्तर पर पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
पीड़िता निलोफर खान पत्नी अफजल खान, निवासी ग्राम कोहड़ी बुजुर्ग, ने बताया कि उसका निकाह 17 दिसंबर 2012 को मुस्लिम रीति-रिवाज से अफजल खान पुत्र स्वर्गीय अब्दुल समद खान के साथ हुआ था। शादी के बाद वह ससुराल में पति के साथ रहती थी। इस दांपत्य जीवन से उसके तीन बच्चे हैं—13 वर्षीय पुत्र हसन खान, 11 वर्षीय पुत्री अलीना खान और 3 वर्षीय पुत्री आयजल खान।
पीड़िता के अनुसार, शादी के कुछ वर्षों बाद उसके पति के किसी अन्य महिला से अवैध संबंध हो गए। इसका विरोध करने पर उसके साथ मारपीट, मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न शुरू हो गया। निलोफर खान का आरोप है कि पति ने जबरन दवा खिलाकर उसका गर्भपात करा दिया। इतना ही नहीं, पति द्वारा उसके साथ जबरन अप्राकृतिक संबंध बनाए जाते थे। विरोध करने पर उसे बेरहमी से पीटा जाता और जान से मारने की धमकी दी जाती थी।
पीड़िता का कहना है कि 15 जनवरी 2026 को उसके पति अफजल खान ने मौखिक रूप से तीन बार “तलाक” कहकर उसे तलाक दे दिया और बच्चों सहित घर से निकालने का प्रयास किया। विरोध करने पर उसके साथ जमकर मारपीट की गई और धमकी देकर घर से बाहर निकाल दिया गया।
पीड़िता ने उसी दिन थाना गोला में तहरीर दी, लेकिन पुलिस ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। इसके बाद 24 जनवरी को उसने दोबारा थाने में प्रार्थना पत्र दिया, फिर भी मामला दर्ज नहीं हुआ। लगातार न्याय न मिलने से हताश पीड़िता ने अंततः उच्च पुलिस अधिकारियों से शिकायत की। उच्चाधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद जाकर पुलिस ने 11 दिन बाद मुकदमा दर्ज किया।
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इस संबंध में थाना प्रभारी राकेश रौशन सिंह ने बताया कि पीड़िता की तहरीर के आधार पर आरोपी पति के खिलाफ बीएनएस की धारा 85, 89, 115(2), 351(3) तथा मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों की सुरक्षा) अधिनियम 2019 की धारा 3 और 4 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। मामले की जांच शुरू कर दी गई है।
फिलहाल सवाल यह है कि यदि पीड़िता उच्चाधिकारियों तक न पहुंचती, तो क्या उसे न्याय मिल पाता? यह मामला न सिर्फ एक महिला की पीड़ा को उजागर करता है, बल्कि पुलिस की संवेदनशीलता और त्वरित कार्रवाई पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।