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देवरिया की 'खामोश मिल' का सच (Image Source: Dynamite News)
Deoria: एक दौर था जब उत्तर प्रदेश का देवरिया जिला "चीनी का कटोरा" कहलाता था, लेकिन आज यहाँ की बंद पड़ी शुगर मिल विकास के बड़े-बड़े दावों को मुंह चिढ़ा रही है। मिल परिसर का जमीनी जायजा लेने पर सिर्फ वीराना और खंडहर नजर आते हैं। मौके पर तैनात चौकीदार के मुताबिक, कभी यहाँ दिन-रात मशीनों की गूंज हुआ करती थी और हजारों मजदूरों का घर चलता था। आज यहाँ सिर्फ जंग खाती मशीनें, भरभराकर गिरती दीवारें और एक गहरा सन्नाटा पसरा हुआ है।
इस मिल की शुरुआत साल 1936 में अंग्रेजों के जमाने में करमचंद थापर द्वारा की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य पूर्वांचल के किसानों, व्यापारियों, परिवहन और रेलवे को आर्थिक रूप से मजबूत करना था, ताकि यह क्षेत्र हरित क्रांति का गढ़ बन सके। मिल के पूर्व कर्मचारियों का कहना है कि जब मिल चलती थी, तब किसान और मजदूर अपनी बेटियों की शादियाँ समय पर और धूमधाम से कर लेते थे। लेकिन मिल पर ताला लगते ही उनकी खुशियों को भी ग्रहण लग गया। जिन हाथों में कभी रोजगार की ताकत थी, आज वे आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं।
स्थानीय व्यापारियों और नागरिकों के अनुसार, मिल बंद होने का असर सिर्फ कर्मचारियों पर नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र पर पड़ा। मिल के भरोसे चलने वाले चाय-पान के ठेले, छोटी दुकानें, ट्रांसपोर्ट व्यवसाय और दिहाड़ी मजदूर पूरी तरह बेरोजगार हो गए। रोजी-रोटी के संकट के कारण सैकड़ों परिवारों को पलायन करने पर मजबूर होना पड़ा। गन्ना किसानों को अब अपनी फसल बेचने के लिए दूर-दराज की मिलों के चक्कर काटने पड़ते हैं, जिससे उनका परिवहन खर्च बढ़ गया है और मुनाफा न के बराबर रह गया है।
खंडहर बन चुकी दीवारें और अपनों का दर्द! कभी 'चीनी का कटोरा' कहे जाने वाले देवरिया की यह बंद शुगर मिल आज विकास के दावों पर बड़े सवाल खड़े कर रही है। 1936 से जुड़ा हजारों परिवारों का रोजगार छीन गया, किसान परेशान हैं और व्यापारी बेबस। आखिर कब तक खामोश रहेगी करोड़ों की यह विरासत?… pic.twitter.com/UyQubXkE5q
— डाइनामाइट न्यूज़ हिंदी (@DNHindi) June 23, 2026
करोड़ों रुपये की इस सरकारी और औद्योगिक विरासत को आखिर किसकी नजर लग गई? क्या सरकार या संबंधित विभाग इस मिल को पुनर्जीवित करने के लिए कोई ठोस कदम उठाएगा, या फिर यह ऐतिहासिक धरोहर सिर्फ सुनहरे अतीत की एक दर्दनाक याद बनकर रह जाएगी? यह सवाल आज भी देवरिया के हर नागरिक के जेहन में कौंध रहा है।
हर चुनाव में राजनीतिक दलों द्वारा इस शुगर मिल को दोबारा शुरू कराने का वादा किया जाता है, लेकिन चुनाव खत्म होते ही यह मुद्दा ठंडे बस्ते में चला जाता है।
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मिल बंद होने के समय कई किसानों और कर्मचारियों का लाखों रुपये का भुगतान बकाया रह गया था, जिसके लिए आज भी बुजुर्ग हो चुके कर्मचारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं।
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मिल की कीमती जमीनों और परिसंपत्तियों पर भू-माफियाओं की नजर है, और सुरक्षा पुख्ता न होने के कारण मिल के कीमती पुर्जे और लोहा चोरी होने की खबरें भी सामने आती रहती हैं।
Location : Deoria
Published : 23 June 2026, 8:44 AM IST
Topics : Deoria Crime Deoria News UP News