काकोरी के नायक दादा बख्शी: जेल की यातना से लेकर समुद्र में 3 मील तैरने तक, ऐसी थी क्रांतिकारी की कहानी

काकोरी ट्रेन एक्शन के रणबांकुरे शचीन्द्रनाथ बख्शी ने अंग्रेजी हुकूमत से लोहा लिया, जेल की यातनाएं सहीं और क्रांतिकारियों के लिए तीन मील समुद्र तैरकर माउजर पिस्तौल तक पहुंचाई। आजादी के बाद वह कांग्रेस से जनसंघ तक पहुंचे और विधायक बने। जीवन के आखिरी वर्षों में सुल्तानपुर में गुमनाम जिंदगी जीने वाले दादा बख्शी ने 23 नवंबर 1984 को अंतिम सांस ली।

Post Published By: Asmita Patel
Updated : 9 August 2026, 12:36 PM IST
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Sultanpur: अंग्रेजों की हुकूमत के खिलाफ हथियार उठाने वाला एक ऐसा क्रांतिकारी, जिसने गिरफ्तारी से बचने के लिए पुलिस को खूब छकाया, जेल में जिंदगी भर की सजा काटी और क्रांतिकारी साथियों के लिए हथियार जुटाने समुद्र तक में छलांग लगा दी। लेकिन आजादी मिलने के बाद जब जिंदगी का आखिरी पड़ाव आया तो यही शख्स सुल्तानपुर में लगभग गुमनामी की जिंदगी जी रहा था। शहर के बहुत कम लोगों को मालूम था कि उनके बीच रहने वाला यह बुजुर्ग कोई आम आदमी नहीं, बल्कि काकोरी ट्रेन एक्शन के प्रमुख क्रांतिकारियों में शामिल शचीन्द्रनाथ बख्शी थे, जिन्हें लोग प्यार से ‘दादा बख्शी’ कहते थे।

काकोरी ट्रेन एक्शन के 100 साल पूरे होने पर जब देश के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के पन्ने पलटे जा रहे हैं, तब दादा बख्शी की कहानी भी एक बार फिर सामने आती है। उनकी जिंदगी में क्रांति, गिरफ्तारी, जेल की यातना, राजनीति और फिर एक ऐसी गुमनामी शामिल रही, जिसका अंतिम अध्याय सुल्तानपुर में लिखा गया।

अंग्रेजों के निशाने पर आए दादा बख्शी

25 दिसंबर को जन्मे शचीन्द्रनाथ बख्शी मूल रूप से बंगाली थे और उनका जन्म बनारस में हुआ था। युवावस्था में ही देश की गुलामी ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया था। अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ चल रहे क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़े और जल्द ही सशस्त्र संघर्ष का हिस्सा बन गए। काकोरी ट्रेन एक्शन में भी उनकी अहम भूमिका रही। अंग्रेजी सरकार के खिलाफ इस कार्रवाई के बाद ब्रिटिश हुकूमत ने क्रांतिकारियों की धरपकड़ तेज कर दी। दादा बख्शी भी पुलिस के निशाने पर थे, लेकिन लंबे समय तक गिरफ्तारी से बचते रहे। आखिरकार जनवरी 1927 में बिहार के भागलपुर से उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। काकोरी कांड के मुकदमे में उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। जेल में उन्हें तमाम यातनाएं झेलनी पड़ीं, लेकिन देश की आजादी को लेकर उनका संकल्प नहीं टूटा।

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तीन मील समुद्र तैरकर हथियार लेने पहुंचे थे दादा बख्शी

दादा बख्शी की जिंदगी का एक किस्सा ऐसा भी है, जिसे सुनकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। क्रांतिकारी साथियों के लिए हथियार जुटाने के लिए वह कलकत्ता पहुंचे थे। बताया जाता है कि उस दौर में भारत की समुद्री सीमा तीन मील तक मानी जाती थी। योजना के तहत हथियार लेकर आए एक जहाज तक पहुंचना था। इसके लिए दादा बख्शी बंगाल की खाड़ी में करीब तीन मील तक तैरकर जहाज तक पहुंचे। वहां भुगतान कर माउजर पिस्तौलों का बंडल हासिल किया और फिर उसी तरह समुद्र में उतरकर अंधेरे में वापस लौट आए।

जनसंघ के टिकट पर बने विधायक

आजादी के बाद दादा बख्शी का जीवन सिर्फ क्रांतिकारी गतिविधियों तक सीमित नहीं रहा। जेल से रिहाई के बाद उन्होंने कांग्रेस से जुड़कर सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की। बाद में उन्होंने कांग्रेस का साथ छोड़कर जनसंघ का दामन थाम लिया। उन्होंने जनसंघ के टिकट पर चुनाव लड़ा और विधायक भी बने। यानी जिस व्यक्ति ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बंदूक और क्रांतिकारी गतिविधियों का रास्ता चुना था, वही आजादी के बाद लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा बन गया।

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युवा अवस्था की शचींद्रनाथ बख्शी की तस्वीर (IMG: Dynamite News)

बेटे की नौकरी ने दादा बख्शी को पहुंचाया सुल्तानपुर

अस्सी के दशक में उनके बेटे राजेंद्रनाथ बख्शी की तैनाती सुल्तानपुर के जलकल विभाग में इंजीनियर के पद पर हुई। बेटे के साथ रहने के लिए दादा बख्शी भी सुल्तानपुर आ गए। यहीं से उनकी जिंदगी का अंतिम अध्याय शुरू हुआ। शहर में वह बेहद साधारण तरीके से रहने लगे। हालत यह थी कि आसपास के लोगों में भी बहुत कम लोगों को पता था कि उनके बीच रहने वाला बुजुर्ग कभी देश की आजादी के लिए अंग्रेजों से लोहा ले चुका है। इतिहास के पन्नों में दर्ज नाम सुल्तानपुर की गलियों में लगभग गुमनाम हो चुका था।

एक चिट्ठी ने खोल दिया दादा बख्शी की पहचान का राज

अगर बलिया से आई एक चिट्ठी न होती तो शायद दादा बख्शी सुल्तानपुर में गुमनामी में ही जिंदगी गुजार देते। शहीद स्मारक सेवा समिति के अध्यक्ष समाजसेवी करतार केशव यादव ने तत्कालीन जिलाधिकारी पुलक चटर्जी के हाथों शहीद चंद्रशेखर आजाद की प्रतिमा का अनावरण कराया था। इसी दौरान उन्हें बलिया से एक पत्र मिला। पत्र में सवाल उठाया गया कि जब चंद्रशेखर आजाद के साथी शचीन्द्रनाथ बख्शी सुल्तानपुर में मौजूद हैं तो प्रतिमा का अनावरण उनसे क्यों नहीं कराया गया?

नौकर से मिली जानकारी ने बदल दी पूरी कहानी

दादा बख्शी की तलाश के दौरान करतार केशव यादव की मुलाकात उनके नौकर से हुई। बातचीत में नौकर ने दादा बख्शी के बारे में कई ऐसी बातें बताईं, जिनसे यादव को शक हुआ कि यह बुजुर्ग कोई सामान्य व्यक्ति नहीं है। उनके समुद्र में तैरने और पुराने क्रांतिकारी जीवन से जुड़े किस्सों की जानकारी जुटाई गई। धीरे-धीरे तस्वीर साफ होती गई और आखिरकार यह पुष्टि हुई कि सुल्तानपुर में रह रहे बुजुर्ग वही शचीन्द्रनाथ बख्शी हैं, जिन्होंने काकोरी ट्रेन एक्शन में अहम भूमिका निभाई थी। तत्कालीन जिलाधिकारी पुलक चटर्जी की मदद से करतार केशव यादव की दादा बख्शी से मुलाकात हुई। यादव ने बाद में इस मुलाकात को अपनी जिंदगी का सबसे ऐतिहासिक क्षण बताया।

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1981 में दादा बख्शी ने किया भगत सिंह की प्रतिमा का अनावरण

दादा बख्शी की पहचान सामने आने के बाद सुल्तानपुर ने उन्हें वह सम्मान दिया, जिसके वह हकदार थे। वर्ष 1981 में जिला परिषद के प्रांगण में शहीद भगत सिंह की प्रतिमा का अनावरण शचीन्द्रनाथ बख्शी ने किया। यह पल सुल्तानपुर के इतिहास में बेहद खास बन गया। एक ओर भगत सिंह की प्रतिमा थी और दूसरी ओर उसका अनावरण करने वाला वह क्रांतिकारी, जिसने खुद अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी।

बीमारी के बीच अस्पताल में गुजरे आखिरी दिन

उम्र के आखिरी पड़ाव तक पहुंचते-पहुंचते दादा बख्शी का स्वास्थ्य खराब रहने लगा। बीमारी बढ़ने पर उन्हें जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया। इस दौरान करतार केशव यादव और उनकी टीम ने उनकी सेवा की। आखिरकार 23 नवंबर 1984 को काकोरी के इस रणबांकुरे ने सुल्तानपुर में अंतिम सांस ली। गोमती नदी के किनारे उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनकी स्मृति को जीवित रखने के लिए जनसहयोग से शवयात्री कक्ष का निर्माण कराया गया। यह जगह आज भी उस क्रांतिकारी की याद दिलाती है, जिसकी जिंदगी का अंतिम अध्याय सुल्तानपुर की धरती पर लिखा गया।

Location :  Sultanpur

Published :  9 August 2026, 12:36 PM IST

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