पत्नी पढ़ी-लिखी है तो क्या खत्म हो जाएगी पति की जिम्मेदारी? हाईकोर्ट ने दिया बड़ा जवाब

इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक अहम फैसले ने वैवाहिक विवादों में भरण-पोषण को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। अदालत ने साफ किया कि केवल पत्नी की शिक्षा या नौकरी करने की क्षमता के आधार पर पति अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता।

Post Published By: Nidhi Kushwaha
Updated : 13 May 2026, 3:56 PM IST
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Prayagraj: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों में भरण-पोषण को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि पत्नी का उच्च शिक्षित होना या उसके पास नौकरी करने की क्षमता होना, उसे भरण-पोषण से वंचित करने का आधार नहीं बन सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि विवाह के बाद पत्नी को उसी सामाजिक और आर्थिक स्तर के अनुरूप जीवन जीने का अधिकार है, जैसा उसे वैवाहिक घर में प्राप्त था।

यह फैसला न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की अदालत ने आगरा निवासी कोमल की पुनरीक्षण याचिका पर सुनाया।

शादी के बाद बढ़ा विवाद

मामले के अनुसार, कोमल की शादी अगस्त 2014 में अहमदाबाद में सिख रीति-रिवाजों से हुई थी। आरोप है कि शादी के कुछ समय बाद ही पत्नी को ससुराल से बाहर निकाल दिया गया। इसके बाद वर्ष 2015 में पत्नी ने आगरा के पारिवारिक न्यायालय में भरण-पोषण की मांग करते हुए आवेदन दाखिल किया।

करीब एक दशक तक चली सुनवाई के बाद जुलाई 2024 में पारिवारिक न्यायालय ने पति को मार्च 2022 से पत्नी को 15 हजार रुपये प्रतिमाह देने का आदेश दिया था। हालांकि पत्नी ने इस राशि को अपर्याप्त बताते हुए हाईकोर्ट का रुख किया और भरण-पोषण बढ़ाने की मांग की।

पति ने पत्नी की डिग्री का दिया हवाला

सुनवाई के दौरान पति की ओर से अदालत में दलील दी गई कि उसकी पत्नी एमबीए डिग्रीधारक है और पहले बहुराष्ट्रीय कंपनियों में नौकरी कर चुकी है। इसलिए वह अपना खर्च स्वयं उठाने में सक्षम है। पति ने यह भी दावा किया कि उसकी मासिक आय केवल 15 से 20 हजार रुपये है।

लेकिन अदालत ने रिकॉर्ड की जांच के दौरान पति के दावों में कई विरोधाभास पाए। कोर्ट के सामने यह सच सामने आया कि पति अहमदाबाद में जीईसी इंटरनेशनल स्टडी सेंटर नाम से एक बड़ा व्यवसाय संचालित करता है और उसने कनाडा से उच्च शिक्षा भी प्राप्त की है।

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कोर्ट ने पति की दलीलों पर जताई सख्ती

अदालत ने पाया कि पति ने आयकर रिटर्न और व्यवसाय से संबंधित कई महत्वपूर्ण जानकारियां छिपाने का प्रयास किया। कोर्ट ने कहा कि केवल पत्नी की शैक्षिक योग्यता या पूर्व नौकरी के आधार पर पति अपनी कानूनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता।

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों और पति की सामाजिक स्थिति को देखते हुए 15 हजार रुपये प्रतिमाह की राशि पर्याप्त नहीं कही जा सकती। अदालत ने पारिवारिक न्यायालय के पुराने आदेश को निरस्त करते हुए मामले को दोबारा विचार के लिए वापस भेज दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि पारिवारिक न्यायालय छह महीने के भीतर नई और उचित भरण-पोषण राशि तय करे। साथ ही तब तक पति को पूर्व आदेश के अनुसार सभी बकाया भुगतान करने होंगे।

सेवानिवृत्त कर्मचारी के मामले में भी हाईकोर्ट सख्त

इसी दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्ति लाभों के भुगतान में देरी के मामले में भी महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए। न्यायमूर्ति दिनेश पाठक की पीठ ने झांसी की नगर पालिका परिषद से सेवानिवृत्त कर्मचारी अर्चना की याचिका पर सुनवाई करते हुए अधिकारियों को तीन महीने के भीतर निर्णय लेने का आदेश दिया।

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याचिका में ग्रेच्युटी, पेंशन, जीपीएफ और अवकाश नकदीकरण जैसी बकाया राशि के भुगतान की मांग की गई थी। कोर्ट ने संबंधित अधिकारी को निर्धारित समय में मामले का निस्तारण करने का निर्देश देते हुए कहा कि कर्मचारियों के सेवानिवृत्ति लाभों में अनावश्यक देरी उचित नहीं मानी जा सकती।

Location :  Prayagraj

Published :  13 May 2026, 3:56 PM IST

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