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झांसी की रानी का आखिरी फैसला (Img: AI Generated Image)
Jhansi: 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अदम्य साहस और वीरता की मिसाल बनीं रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लंबे समय तक संघर्ष किया। हालांकि अप्रैल 1858 में युद्ध की परिस्थितियां ऐसी बनीं कि उन्हें रणनीतिक कारणों से झांसी छोड़नी पड़ी। यह फैसला आसान नहीं था, क्योंकि झांसी केवल उनका राज्य ही नहीं, बल्कि उनके स्वाभिमान और संघर्ष का प्रतीक भी थी।
अंग्रेजी सेना लगातार झांसी पर दबाव बढ़ा रही थी। युद्ध के दौरान रानी के कई प्रमुख योद्धा शहीद हो चुके थे और संसाधन भी तेजी से कम हो रहे थे। दूसरी ओर कुछ लोगों की विश्वासघातपूर्ण भूमिका ने भी स्थिति को और कठिन बना दिया। ऐसे में रानी ने अपने सैन्य अभियान को जारी रखने और नई रणनीति तैयार करने के उद्देश्य से झांसी से निकलने का निर्णय लिया।
इतिहासकारों के अनुसार, 6 अप्रैल 1858 की रात रानी लक्ष्मीबाई अपने विश्वस्त सैनिकों के साथ झांसी के भांडेरी गेट से बाहर निकलीं। उनका लक्ष्य कालपी पहुंचकर क्रांतिकारी शक्तियों को फिर से संगठित करना था। जैसे ही रानी और उनके सैनिक सुरक्षित बाहर निकले, शहरवासियों ने अंग्रेजों की प्रगति रोकने के लिए गेट को पूरी तरह बंद कर दिया।
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स्थानीय लोगों ने विशाल लकड़ी के दरवाजों को लोहे की मजबूत कीलों और अवरोधों से इस प्रकार जाम कर दिया कि अंग्रेजी सेना तत्काल उसे खोल नहीं सकी। बताया जाता है कि यह ऐतिहासिक द्वार दशकों तक बंद रहा और करीब 75 साल बाद साल 1933 में इसे दोबारा खोला गया। आज भी यह स्थान रानी के संघर्ष और जनता की निष्ठा का मूक गवाह माना जाता है।
झांसी से निकलने के बाद रानी कालपी पहुंचीं, जहां उनकी मुलाकात तात्या टोपे और अन्य क्रांतिकारी नेताओं से हुई। कालपी उस समय विद्रोहियों का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका था। यहां से क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के खिलाफ नई रणनीति बनाई और बाद में ग्वालियर की ओर बढ़े। ग्वालियर किले पर कब्जा करने के बाद भी संघर्ष जारी रहा, लेकिन 18 जून 1858 को युद्धभूमि में लड़ते हुए रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हुईं।
Location : Jhansi
Published : 17 June 2026, 6:43 PM IST