झांसी के किले का वो ‘रहस्यमयी गुप्त द्वार’, जिससे रणचंडी बनकर निकली थीं रानी लक्ष्मीबाई, 75 साल तक क्यों रहा बंद?

1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती देने वाली रानी लक्ष्मीबाई ने अप्रैल 1858 में रणनीतिक कारणों से झांसी छोड़ी थी। मध्यरात्रि में उनके प्रस्थान के बाद देशप्रेमियों ने किले का 'भांडेरी गेट' लोहे की कीलों से जाम कर दिया, जो ऐतिहासिक द्वार करीब 75 वर्षों तक बंद रहा।

Post Published By: Priyam Kashyap
Updated : 17 June 2026, 6:43 PM IST
google-preferred

Jhansi: 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अदम्य साहस और वीरता की मिसाल बनीं रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लंबे समय तक संघर्ष किया। हालांकि अप्रैल 1858 में युद्ध की परिस्थितियां ऐसी बनीं कि उन्हें रणनीतिक कारणों से झांसी छोड़नी पड़ी। यह फैसला आसान नहीं था, क्योंकि झांसी केवल उनका राज्य ही नहीं, बल्कि उनके स्वाभिमान और संघर्ष का प्रतीक भी थी।

चारों ओर से घिर चुकी थी झांसी

अंग्रेजी सेना लगातार झांसी पर दबाव बढ़ा रही थी। युद्ध के दौरान रानी के कई प्रमुख योद्धा शहीद हो चुके थे और संसाधन भी तेजी से कम हो रहे थे। दूसरी ओर कुछ लोगों की विश्वासघातपूर्ण भूमिका ने भी स्थिति को और कठिन बना दिया। ऐसे में रानी ने अपने सैन्य अभियान को जारी रखने और नई रणनीति तैयार करने के उद्देश्य से झांसी से निकलने का निर्णय लिया।

मध्यरात्रि में हुआ ऐतिहासिक प्रस्थान

इतिहासकारों के अनुसार, 6 अप्रैल 1858 की रात रानी लक्ष्मीबाई अपने विश्वस्त सैनिकों के साथ झांसी के भांडेरी गेट से बाहर निकलीं। उनका लक्ष्य कालपी पहुंचकर क्रांतिकारी शक्तियों को फिर से संगठित करना था। जैसे ही रानी और उनके सैनिक सुरक्षित बाहर निकले, शहरवासियों ने अंग्रेजों की प्रगति रोकने के लिए गेट को पूरी तरह बंद कर दिया।

Jhansi: जमीन की जंग में बही खून की धार! लाठियों की गूंज से कांपा गांव, 7 लोग घायल

75 वर्षों तक नहीं खुल सका दरवाजा

स्थानीय लोगों ने विशाल लकड़ी के दरवाजों को लोहे की मजबूत कीलों और अवरोधों से इस प्रकार जाम कर दिया कि अंग्रेजी सेना तत्काल उसे खोल नहीं सकी। बताया जाता है कि यह ऐतिहासिक द्वार दशकों तक बंद रहा और करीब 75 साल बाद साल 1933 में इसे दोबारा खोला गया। आज भी यह स्थान रानी के संघर्ष और जनता की निष्ठा का मूक गवाह माना जाता है।

कालपी और ग्वालियर में जारी रहा संघर्ष

झांसी से निकलने के बाद रानी कालपी पहुंचीं, जहां उनकी मुलाकात तात्या टोपे और अन्य क्रांतिकारी नेताओं से हुई। कालपी उस समय विद्रोहियों का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका था। यहां से क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के खिलाफ नई रणनीति बनाई और बाद में ग्वालियर की ओर बढ़े। ग्वालियर किले पर कब्जा करने के बाद भी संघर्ष जारी रहा, लेकिन 18 जून 1858 को युद्धभूमि में लड़ते हुए रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हुईं।

Location :  Jhansi

Published :  17 June 2026, 6:43 PM IST

Advertisement