‘अदृश्य खतरा न्याय को खोखला कर सकता है’, सुप्रीम कोर्ट की AI पर ऐसी चेतावनी जिसने सबको सोचने पर मजबूर कर दिया

सुप्रीम कोर्ट ने AI के इस्तेमाल को लेकर ऐसी चेतावनी दी है जिसने न्याय व्यवस्था में तकनीक की भूमिका पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। कोर्ट ने एक मामले में सामने आई गंभीर गड़बड़ी के बाद साफ कहा कि अगर बिना जांच AI पर भरोसा किया गया तो इसके दूरगामी असर हो सकते हैं।

Post Published By: Nidhi Kushwaha
Updated : 2 July 2026, 4:15 PM IST
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New Delhi: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आज ऑफिस से लेकर अस्पताल और शिक्षा तक इसका इस्तेमाल बढ़ रहा है। लेकिन जब बात अदालतों और न्याय की आती है तो जरा-सी लापरवाही भी बड़ा नुकसान कर सकती है। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने AI के इस्तेमाल को लेकर बेहद सख्त और अहम चेतावनी दी है।

अदालत ने साफ कहा कि अगर कानूनी प्रक्रिया में बिना जांच-पड़ताल AI से तैयार जानकारी पर भरोसा किया गया तो यह न्याय व्यवस्था की नींव को कमजोर कर सकता है। कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे मामले में आई, जिसमें ट्रिब्यूनल ने अपने फैसले में ऐसे कानूनी उदाहरणों का सहारा लिया जो असल में मौजूद ही नहीं थे।

फर्जी कानूनी उदाहरणों ने बढ़ाई चिंता

मामला एस्सेल इंफ्राप्रोजेक्ट्स के दिवालियापन से जुड़ा था। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को पता चला कि एनसीएलटी ने अपने आदेश में जिन पुराने फैसलों और कानूनी मिसालों का हवाला दिया, उनमें से कुछ वास्तविक नहीं थे। माना गया कि ये उदाहरण AI टूल की मदद से तैयार हुए और बिना सही जांच के फैसले का हिस्सा बना दिए गए। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने एनसीएलटी और एनसीएलएटी के आदेश को रद्द करते हुए मामले पर दोबारा तथ्यों के आधार पर फैसला करने का निर्देश दिया।

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AI को बताया 'अदृश्य और खतरनाक'

जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने इस पूरे मामले पर बेहद कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि AI की ओर से बनाई गई नकली और मनगढ़ंत जानकारी कानून के क्षेत्र में बेहद खतरनाक साबित हो सकती है। कोर्ट ने इसकी तुलना मिथाइल आइसोसाइनेट गैस के रिसाव से करते हुए कहा कि यह ऐसा खतरा है जो शुरुआत में दिखाई नहीं देता, लेकिन जब तक इसकी पहचान होती है, तब तक यह न्यायिक प्रक्रिया को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।

हर फैसले पर इंसान का अंतिम नियंत्रण जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि तकनीक का इस्तेमाल गलत नहीं है, लेकिन अंतिम फैसला हमेशा इंसान का ही होना चाहिए। अदालत ने कहा कि AI काम को आसान बना सकता है, जानकारी जुटाने में मदद कर सकता है और समय बचा सकता है, लेकिन निर्णय लेने की पूरी जिम्मेदारी किसी मशीन को नहीं सौंपी जा सकती। कोर्ट के अनुसार न्याय केवल तथ्यों और कानून का मामला नहीं होता, बल्कि उसमें मानवीय समझ, विवेक और संवेदनशीलता भी शामिल होती है।

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AI की बढ़ती ताकत पर जताई चिंता

अदालत ने माना कि AI की क्षमता लगातार बढ़ रही है और वह कई बौद्धिक कार्य भी तेजी से कर सकता है। इसी वजह से पेशेवर लोग उस पर अधिक निर्भर होने लगे हैं। हालांकि कोर्ट ने चेताया कि अगर इस तकनीक के इस्तेमाल के स्पष्ट नियम नहीं बनाए गए तो धीरे-धीरे लोग उसकी हर जानकारी को सही मानने लगेंगे, जो भविष्य में गंभीर समस्याएं पैदा कर सकता है।

हैलुसिनेशन पर भी कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि AI कई बार ऐसी जानकारी तैयार कर देता है जिसका कोई वास्तविक आधार नहीं होता। इसे तकनीकी भाषा में "हैलुसिनेशन" कहा जाता है। अदालत ने साफ किया कि वह इस तकनीकी समस्या का समाधान बताने की कोशिश नहीं कर रही, क्योंकि यह इंजीनियरों और वैज्ञानिकों का विषय है। लेकिन न्याय व्यवस्था में इसका असर रोकना अदालतों और कानूनी संस्थाओं की जिम्मेदारी है।

बार काउंसिल को भी मिले अहम निर्देश

मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया को एक विशेषज्ञ समिति बनाने का निर्देश दिया है। यह समिति जांच करेगी कि कानूनी प्रक्रिया में AI का इस्तेमाल किस तरह सुरक्षित और जिम्मेदारी के साथ किया जा सकता है। कोर्ट चाहता है कि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा पैदा न हो, जहां किसी नकली जानकारी के आधार पर न्यायिक फैसला प्रभावित हो जाए।

Location :  New Delhi

Published :  2 July 2026, 4:08 PM IST

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