72 घंटे बाद भी भ्रष्टाचार में निलंबित आईएएस पर नहीं दर्ज हुआ मुकदमा, देखिये कैसे बहाना बना रहे हैं अफसर?
अजब यूपी का गजब हाल है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गो-सेवा के समर्पित भाव को भी राज्य के आला-अफसरों ने घनघोर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा दिया है। सरकारी धन के गबन के आरोपी प्रमोटेड आईएएस अमरनाथ उपाध्याय को सीएम निलंबित कर चुके हैं। मुख्य सचिव ने खुली प्रेस वार्ता में एफआईआर का ऐलान किया लेकिन ये क्या नतीजा जीरो.. आखिर क्यों? लखनऊ से लेकर गोरखपुर और महराजगंज तक के अफसर सीएम की मंशा के विपरित भ्रष्टाचारी अफसर को बचाने में एड़ी-चोटी का जोर लगा दिये हैं। डाइनामाइट न्यूज़ एक्सक्लूसिव:
लखनऊ: प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार मुक्त पारदर्शी शासन व्यवस्था देना चाहते हैं। हर माकूल मंच से वे इस बात को नौकरशाहों को समझाते भी हैं लेकिन यूपी के अफसर न तो कुछ सुनने को तैयार हैं और न ही सुधरने को। जिसका नतीजा यह है कि भ्रष्टाचार पर लगाम लग ही नहीं पा रहा है।
ज्वलंत उदाहरण है महराजगंज के पूर्व जिलाधिकारी और पीसीएस से प्रमोशन पाकर आईएएस बने अमरनाथ उपाध्याय का। पहली बार जिला पाये ये साहब काफी जल्दी में थे। लगे खुलकर चौका-छक्का लगाने। हद तो तब हो गयी जब इन्होंने सीएम के सबसे प्रिय प्रोजेक्ट गो-सदन पर ही खुलेआम डकैती डाल दी।
तीन दिन पहले मधवालिया गो सदन में भारी भ्रष्टाचार, लूट खसोट, सरकारी धन के गबन, साढ़े तीन सौ एकड़ बेशकीमती जमीन को प्राइवेट आदमियों को गैरकानूनी तरीके से पट्टे पर देने के आरोपी आईएएस अमरनाथ उपाध्याय को गोरखपुर के अपर आय़ुक्त की जांच में दोषी पाये जाने के बाद मुख्यमंत्री ने निलंबित कर दिया।
इसका ऐलान लोक भवन में आयोजित खुली प्रेस वार्ता में राज्य के सबसे बड़े नौकरशाह यानि मुख्य सचिव राजेन्द्र कुमार तिवारी ने खुद किया। प्रेस वार्ता में मुख्य सचिव ने साफ-साफ ऐलान किया कि ‘वित्तीय अनियमितता और आपराधिक कार्यवाही के बारे में अफसरों पर एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दे दिये गये हैं। (देखें वीडियो), अब तीन दिन बाद भी एफआईआर दर्ज नहीं हुई है। हर कोई टाल-मटोल कर रहा है।
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तो क्या सूबे के सबसे बड़े साहब का यह निर्देश सिर्फ दिखावटी था?
तिवारी जी कार्यवाहक हैं। अभी मुख्य सचिव का परमानेंट आर्डर भी नहीं पाये हैं। दिल्ली से सचिव स्तर के दो और लखनऊ में बैठे एक वरिष्ठ अधिकारी इनकी कुर्सी पर नजर गड़ाये बैठे हैं, फिर भी साहब हैं कि भ्रष्टाचार पर पीएम और सीएम की जीरो टॉलरेंस नीति को अमलीजामा नहीं पहना पा रहे हैं।
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डाइनामाइट न्यूज़ ने कल जब इस मामले पर कार्यवाहक मुख्य सचिव से पूछा तो उन्होंने कहा कि इस बारे में आप जरा गोरखपुर के कमिश्नर से पूछ लीजिये, वहीं इस मामले को देख रहे हैं। जब हमारे संवाददाता ने असम-मेघालय कैडर से पिंड छुड़ा प्रतिनियुक्ति पर आये 2003 बैच के AM कैडर के आईएएस और साढ़े छह महीने से गोरखपुर के मंडलायुक्त पद पर बैठे जयंत नार्लिकर से जानकारी लेने के लिए फोन किया तो पता लगा कि साहब लंबी छुट्टी पर हैं। 21 तारीख के बाद मिलेंगे।
अपर मुख्य सचिव, नियुक्ति मुकुल सिंघल आदेश देते रह जाते हैं कि कोई अफसर 30 नवंबर तक फील्ड नहीं छोड़ेगा लेकिन सिंघल साहब के आदेश को रद्दी की टोकरी में फेंक जयंत लंबी छुट्टी पर निकल लेते हैं। वैसे ये कमिश्नर साहब वही अफसर हैं जिन्होंने बड़ी गलती कर दी थी मुख्यमंत्री के मूड को भांपने में। साढ़े छह महीने से भ्रष्टाचारी अमरनाथ उपाध्याय से ऐसा गठजोड़ हुआ कि साहब सस्पेंशन से महज 48 घंटे पहले तक अपने मातहत अमरनाथ को 'महोदय', 'जिलाधिकारी के नेतृत्व 'और 'अपील' जैसे शब्दों से महिमामंडित करते और पूजते नजर आय़े थे। कहीं ऐसा तो नहीं है कि अपने सबसे प्रिय अधिकारी को बचाने के लिए ही साहब लंबी छुट्टी पर चले गये हों ताकि मामला ठंडा पड़ जाये और अमरनाथ बच जाये? पढ़ें ये खबर: गोरखपुर के कमिश्नर जयंत नार्लिकर की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल
कमिश्नर का फोन उठाने वाले उनके सहयोगी ने गेंद आईजी के पाले में डाल दी। जब डाइनामाइट न्यूज़ ने गोरखपुर रेंज के आईजी जय नारायण सिंह से जानकारी चाही तो उन्होंने कहा कि आप महराजगंज के एसपी से बात कर लें, वो आपको सटीक जानकारी दे सकते हैं। एसपी रोहित सिंह सजवान से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि मेरे पास कोई लिखित आदेश तो है नही, तो भला मैं क्या करुं। छाप दीजिये मेरा बयान। अब छह साल की नौकरी में पहली बार जिला पाये इन साहब को कौन समझाये कि पुलिस का काम एंटी-करश्पन पर नकेल डालने का भी है।
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इधर लखनऊ में एक वरिष्ठ आईएएस से जब अंदर की बात पूछी गयी तो उन्होंने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि आईएएस अफसर अपने ही साथी आईएएस अफसर पर एफआईआर नहीं दर्ज करवायेंगे। वे हर स्तर पर कोशिश करेंगे कि साथी आईएएस को बचा लिया जाय, भले ही आरोप कितना ही संगीन क्यों न हो।
अगर वाकई यह सच है तब तो फिर भगवान ही मालिक है राज्य का। फिर तो यह भी उम्मीद करना बेमानी होगा कि अपर आय़ुक्त की जांच में दोषी पाये जाने के बाद सीधे सीएम द्वारा निलंबित किये गये इस भ्रष्टाचारी के खिलाफ विभागीय जांच ईमानदारी से होगी। क्या पता सिंघल साहब के अंडर में काम करने वाले नियुक्ति विभाग के लोग अमरनाथ के बहाली का खाका भी बुनना प्रारंभ कर दिये हों?