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अमेरिका में H-1B वीज़ा शुल्क बढ़ने से भारतीय आईटी कंपनियों और पेशेवरों पर असर पड़ेगा। नए शुल्क से अमेरिका में काम करने की लागत बढ़ेगी, कंपनियां स्थानीय भर्ती और ऑफ़शोर मॉडल बढ़ा सकती हैं। इससे नौकरी सुरक्षा, परियोजना वितरण और वैश्विक संचालन पर भी प्रभाव पड़ सकता है।
अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप
New Delhi: अमेरिका द्वारा H-1B वीज़ा शुल्क में $100,000 की वृद्धि ने भारतीय आईटी उद्योग और पेशेवरों के लिए गंभीर चिंता उत्पन्न की है। हालांकि यह शुल्क केवल नए आवेदनों पर लागू होगा, फिर भी इसका व्यापक प्रभाव देखा जा रहा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 19 सितंबर 2025 को H-1B वीज़ा शुल्क में $100,000 की वृद्धि की घोषणा की। यह शुल्क केवल नए आवेदनों पर लागू होगा, न कि नवीनीकरण या मौजूदा वीज़ा धारकों पर। इस निर्णय का उद्देश्य अमेरिकी तकनीकी क्षेत्र में विदेशी श्रमिकों की निर्भरता को कम करना और घरेलू रोजगार को बढ़ावा देना है।
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भारत, जो H-1B वीज़ा के लिए स्वीकृत आवेदनों का 71% हिस्सा रखता है, इस निर्णय से विशेष रूप से प्रभावित होगा। नासकॉम ने चेतावनी दी है कि यह शुल्क भारतीय आईटी कंपनियों की वैश्विक संचालन क्षमता को प्रभावित कर सकता है। इसके परिणामस्वरूप, कंपनियां स्थानीय भर्ती बढ़ा सकती हैं और वैश्विक डिलीवरी मॉडल को मजबूत कर सकती हैं।
वैश्विक संचालन लागत में वृद्धि
नए H-1B वीज़ा पर बढ़े हुए शुल्क के कारण भारतीय आईटी कंपनियों के अमेरिका में कर्मचारियों को भेजने की लागत बढ़ जाएगी।
इससे कंपनियों के प्रोजेक्ट्स की कुल लागत में इज़ाफा होगा, खासकर छोटे और मिड-साइज़ कंपनियों के लिए।
अमेरिकी कर्मचारियों की भर्ती में बदलाव
कंपनियां अब अमेरिका में अधिक स्थानीय कर्मचारियों को भर्ती करने पर ध्यान दे सकती हैं।
ऑफ़शोर डिलीवरी मॉडल बढ़ सकता है, यानी काम भारत या अन्य देशों से करना ज्यादा किफायती साबित होगा।
नौकरी अवसरों पर असर
कुछ कर्मचारियों के लिए नौकरी की सुरक्षा पर प्रश्न उठ सकते हैं, क्योंकि कंपनियां महंगे H-1B वीज़ा वाले कर्मचारियों को सीधे अमेरिका में भेजने में संकोच कर सकती हैं।
भारतीय पेशेवरों को वैकल्पिक देशों (कनाडा, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया) में अवसर तलाशने की आवश्यकता बढ़ सकती है।
निरंतरता और परियोजना वितरण पर प्रभाव
अमेरिका में काम कर रहे भारतीय आईटी पेशेवरों की संख्या कम होने से कुछ प्रोजेक्ट्स की समय सीमा और वितरण मॉडल प्रभावित हो सकते हैं।
रणनीतिक बदलाव
भारतीय आईटी कंपनियां अब ऑफ़शोर और नियर-शोर डिलीवरी मॉडल को मजबूत करेंगी।
H-1B पर निर्भरता कम करके कंपनियां अमेरिकी नीतियों के जोखिम से खुद को बचाने की कोशिश करेंगी।
अमेरिका में कार्यरत भारतीय पेशेवरों के लिए यह वृद्धि एक चुनौतीपूर्ण स्थिति उत्पन्न कर सकती है। कुछ कंपनियां इस बढ़े हुए शुल्क को वहन करने में सक्षम नहीं होंगी, जिससे नौकरी की सुरक्षा पर संकट आ सकता है।
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भारतीय आईटी कंपनियां जैसे TCS, इंफोसिस, और विप्रो ने H-1B वीज़ा पर अपनी निर्भरता को 50% से कम कर दिया है। इस रणनीति के तहत, कंपनियां ऑफ़शोर और नियर-शोर डिलीवरी मॉडल को बढ़ावा दे रही हैं, जिससे अमेरिकी नीतियों के प्रभाव को कम किया जा सके।
इस निर्णय से वैश्विक स्तर पर भी प्रतिक्रिया हुई है। अमिताभ कांत, पूर्व NITI आयोग के सीईओ, ने कहा कि यह कदम अमेरिकी नवाचार को बाधित करेगा और भारतीय तकनीकी केंद्रों जैसे बेंगलुरु और हैदराबाद में नवाचार को बढ़ावा देगा
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H-1B वीज़ा शुल्क में वृद्धि अमेरिकी नीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य घरेलू रोजगार को बढ़ावा देना है। हालांकि, इसका भारतीय आईटी उद्योग और पेशेवरों पर प्रभाव पड़ सकता है। भारत की कंपनियाँ अपनी रणनीतियों में बदलाव कर रही हैं, और पेशेवरों के लिए अन्य देशों में अवसरों की तलाश बढ़ रही है।
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