देवभूमि उत्तराखंड में क्यों नहीं होता गणपति विसर्जन? जानिए पौराणिक मान्यताओं से जुड़ा अनोखा सच

उत्तराखंड में क्यों नहीं होता गणपति जी का विसर्जन? जानिए उत्तरकाशी के डोडीताल और गौरीकुंड की पौराणिक कथाएं। क्यों उत्तराखंडवासी गणेश जी को मेहमान नहीं बल्कि अपना बेटा और घर का रक्षक मानते हैं।

Post Published By: Tanya Chand
Updated : 18 September 2026, 12:32 PM IST
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New Delhi: देशभर में इन दिनों गणेशोत्सव की जबरदस्त धूम देखने को मिल रही है। भक्त बड़े ही धूमधाम से गणपति बप्पा की स्थापना करते हैं और कुछ दिनों बाद भावुक होकर उन्हें जल में विसर्जित कर देते हैं। हालांकि, इंटरनेट मीडिया से लेकर आम चर्चाओं में एक बड़ा सवाल उठ रहा है कि क्या देवभूमि उत्तराखंड में गणेश विसर्जन की परंपरा नहीं है?

ज्योतिषाचार्यों और स्थानीय परंपराओं के अनुसार, उत्तराखंड में घर-घर में गणपति को पूजा जाता है, लेकिन वहां उन्हें विसर्जित करने की प्रथा उस रूप में नहीं है जैसी अन्य राज्यों में देखने को मिलती है। लेकिन ऐसा क्यों, आइए इस खास विषय पर चर्चा करते हुए आपको बताते हैं कि क्यों उत्तराखंड में गणेश जी को विसर्जित करने की प्रथा नहीं है।

अतिथि नहीं, घर के सदस्य हैं गणपति बप्पा

धार्मिक मान्यताओं और विद्वानों के अनुसार, विसर्जन की परंपरा मुख्य रूप से उन क्षेत्रों में होती है जहां भगवान गणेश को एक अतिथि या मेहमान के रूप में स्थापित किया जाता है। मेहमान आते हैं और पूजा-पाठ के बाद चले जाते हैं। लेकिन उत्तराखंड के लोगों के लिए गणेश जी अतिथि नहीं बल्कि उनके अपने परिवार के सदस्य, इष्टदेव और आराध्य हैं।

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यही कारण है कि वहां मांगलिक कार्यों में गोबर या मिट्टी के प्रतीकात्मक गणेश बनाकर ही पूजा के बाद उनका संक्षिप्त निसर्जन किया जाता है, न कि गाजे-बाजे के साथ बड़ा विसर्जन।

डोडीताल और गौरीकुंड से जुड़ा है प्राकट्य का रहस्य

उत्तराखंड को भगवान गणेश की पवित्र जन्मस्थली माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, उत्तरकाशी जिले में समुद्रतल से 3,310 मीटर की ऊंचाई पर स्थित डोडीताल ही वह स्थान है जहां माता पार्वती ने अपने उबटन से गणेश जी की रचना की थी।

वहीं एक अन्य मान्यता के अनुसार, केदारखंड क्षेत्र में गौरीकुंड के पास विघ्नहर्ता का प्राकट्य हुआ था। जब कोई स्थान किसी देवता का जन्मस्थान होता है, तो वहां से उन्हें विदा करने या विसर्जित करने का भाव भक्तों के मन में नहीं आता।

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उत्तराखंड के घर-घर में स्थायी रूप से विराजते हैं गणेश

देवभूमि में भगवान गणेश को चौखट के रक्षक के रूप में पूजा जाता है। उत्तराखंड के पारंपरिक मकानों के मुख्य दरवाजे (काष्ठ कला) के ठीक ऊपर गणेश जी की प्रतिमा उकेरी जाती है, जो हमेशा घर की रक्षा करती है। स्थानीय लोगों का स्पष्ट मानना है कि जो हमारे अपने घर के रक्षक और बेटे हैं, उन्हें जल में विसर्जित कैसे किया जा सकता है। यही वजह है कि पारंपरिक रूप से उत्तराखंड में गणेश विसर्जन का चलन नहीं रहा है।

Location :  New Delhi

Published :  18 September 2026, 12:32 PM IST

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